रविवार, 24 मई 2015

‘मरीचिका’

“क्या, तुम्हारी माँ मिस------रह चुकी हैं !!!"

लोगों के मुंह से ये शब्द सुनकर स्नेह को अपनी माँ पर बहुत गर्व होता था । ख़ूबसूरत सेलिब्रिटी माँ की बेटी कहलाना उसे एवरेस्ट पर झंडे गाड़ने जैसा लगता था ।

ईर्ष्या में अक्सर उसकी सहेलियां उसे छेड़तीं रहती थीं -

"स्नेह, कहीं ऐसा ना हो कि कोई तुझे देखने आये और माँ को पसंद कर ले ।"

"तो उससे हाथ जोड़कर कहूँगी कि मुझे भी माँ के साथ बेटी बनाकर लेता चले ।" कहते हुए स्नेह जोर से खिलखिला उठती ।

माँ और उसका प्यार आदित्य बस यही उसकी छोटी सी दुनिया थी । अभी तक उसने आदित्य को माँ से नहीं मिलवाया था इसलिए माँ के बाहर जाने पर उसने आदित्य के साथ घूमने का प्लान बना लिया था । उसके इंतज़ार में वह यूँ ही पगडंडियों पर टहलते-टहलते घर से दूर निकल आई । अचानक एक कार में दो सायों को देख वह उछल पड़ी ।

“नहीं !!! ऐसा नहीं हो सकता !!!”

उसने कांपते हाथों से आदित्य को फोन लगाया, कई बार रिंग जाने पर फोन उठा –

“हेलो, हाँ मैं...हाँ मैं अभी बिज़ी हूँ !!!” कहकर आदित्य ने बिना जवाब सुने फोन काट दिया ।

उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कार के अन्दर आपस में लिपटे दोनों साए आदित्य और माँ के थे किन्तु आदित्य के इस तरह से फोन काटने पर उसका विश्वास दृढ़ हो गया था । आज उसे अपनी सहेलियों की बातें याद आ रहीं थीं ।

"तो क्या वाकई में सुंदर माँओं की बेटियां अभागी होतीं हैं !!!" उसकी आँखें छलछला आयीं ।

तभी उसने अपनी हथेलियों पर गर्म कसाव का अनुभव किया। वह चौंक पड़ी ।

"आ..आ...आदित्य तुम !!!"

"क्यों, मुझे नहीं होना चाहिए था ?"

"लेकिन...तुम तो कार में...माँ....।" उसके मुंह में शब्द लड़खड़ाने लगे ।

"हाँ, आज मुझ अनाथ को भी माँ मिल गई ।"

उसने हैरत से पास आ रही माँ को देखा ।

"हाँ स्नेह, आदित्य मेरी सहेली शुभी की खोई हुई निशानी है, जो आज बेटे के रूप में मुझे मिल गई । चल, घर चल कर सारी बातें बताती हूँ ।"

उसने देखा माँ की आँखों से स्नेह के मोती झर रहे थे ।