मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

जरीब-करीब (लघुकथा)

“दीपा, हमें कल गाँव जाना होगा, अपने खेतों का हिस्सा-बाँटा करने के लिए।‘’
‘’क्यों ?’’
‘’पता चला है कि बड़े भैया हमारे हिस्से वाले खेतों की मिट्टी ईंट के भठ्ठे वालों को बेच रहे हैं।” मीता आवेश में बोली।
“ये तो गलत बात है, इससे तो हमारे खेत बंजर हो जाएँगे!... सच दीदी, पिताजी ने ताऊजी के परिवार के लिए इतना कुछ किया लेकिन उनके बेटे ने....” यह सुनकर दीपा भी भड़क उठी।
“ऐसा नहीं है दीपा। पिताजी ने बताया था कि ताऊजी ने खेतों में काम करके पिताजी को पढ़ाया। उन्हें कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी।”
“ठीक है, कम से कम उनके बेटे....।”
“…दीपा, वे हमारे बड़े भैय्या हैं...।” मीता ने दीपा को टोका।
“…तो हाँ, दीदी...बड़े भैय्या को यह तो सोचना ही चाहिए था कि खेतों में हमारा भी हिस्सा है।”
“बस, अब हम खेतों को यूँ बर्बाद नहीं होने देंगे। अपना हिस्सा अलग करवा कर किसी और को बटाई पर दे देंगे।”
अलगे दिन कार से मीता और दीपा गाँव के लिए रवाना हो गईं। दोपहर तक वे गाँव पहुँच गईं। बड़े भैय्या ने उन्हें स्थिति समझाने की कोशिश की। लेकिन उन दोनों ने जिद पकड़ ली कि नहीं हमारे खेत अलग कर दिए जाएँ, फिर उन्हें अपने खेतों के साथ जो करना हो वे करें।
थोड़ी देर बाद खेतों की नपाई शुरू हो गई। लेखपाल जरीब से नापकर खेतों में निशान लगवाने लगा। शाम होते-होते खेतों का बँटवारा हो गया।
“दीदी, यहाँ का काम तो हो गया। आगे का क्या प्लान है?”
“वापस चलते हैं। पर बहुत रात हो जाएगी...”
“ठीक है, रास्ते में किसी होटल में स्टे कर लेंगे।”
दोनों कार की तरफ़ बढ़ी ही थीं कि बड़े भैय्या की बेटी ने आकर कहा, “बुआ चलिए खाना खा लीजिये, मम्मी अंदर बुलाईं हैं।”
जब तक दोनों उससे कुछ कहतीं तभी एक और आवाज़ आई।
“राती में लौटब ठीक ना हव बच्ची। बिहाने जाया। तोहार लोगन के कमरा साफ़ करवा देले हई।”
दोनों चौंककर पलटीं। पीछे बड़े भैय्या खड़े थे। दोनों सकपका एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं। वे बड़े भैय्या के इस आग्रह को ठुकरा ना सकीं।
“क्या सोच रही हो दीदी?” रात को बिस्तंर में लेटे-लेटे छत ताकती मीता से दीपा ने पूछा।
“यही कि हमने शायद ठीक नहीं किया।‘’
‘’क्यों?’’
‘’अब देख न खेत तो बँट गए, लेकिन जो दिलों में बसे प्यार को बाँट दे ऐसी कोई जरीब नहीं बनी।”
“सच! एक बात कहूँ दीदी?”
“क्या?”
“यही कि क्यों न हम अपने खेत बड़े भैय्या को ही दे दें बटाई पर?”
मीता ने दीपा की ओर ऐसे देखा जैसे वह यही सुनना चाहती थी। मीता को लगा जैसे उन्होंने दिन में कोई अपराध किया था और अब उसके प्रायश्चित का तरीका मिल गया है।
उसने दीपा के गले में बाँह डाली और बोली,’’ चल सो जा, अब सुबह उठकर भैया से सबसे पहले यही बात करेंगे।‘’

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

परिवेश (लघुकथा)

“देखिये ये बच्चों की तस्वीरों का कोलाज उनके कमरों के लिए बनवाया है!’
“बहुत अच्छा है।”
“और ये हमारी तस्वीरों का कोलाज, अपने बेडरूम के लिए।”
“अरे वाह, ये वाली तब की है ना जब ईशा होने वाली थी?”
“नहीं, ये हमारी शादी की पहली सालगिरह की है।”
“अरे हाँ याद आया, तुम साल भर में एकदम गोला बन गई थीं न...” कहते हुए विशाल ने बाईं आँख दबा दी।
“जनाब, मैं गोला नहीं हुई थी समझे, वो साड़ी ही फूली-फूली थी।” रुठते हुए नीना ने विशाल की बाँह में चिकोटी काटी।
“हा हा हा, नाराज़ हो गई मेरी नीनू।” कहते हुए विशाल उसके नज़दीक सरक आया।
“हटिये, मुझे अभी बहुत काम है।” कहते हुए नीना तस्वीर लेकर बच्चों के कमरे में चली गई।
‘’ईशा, ये तेरी और आशू के बचपन की तस्वीरों का कोलाज है, ज़रा इस दीवार पर टंगवाने में मेरी मदद कर।” नीना बोली।
“लेकिन मम्मा, उस दीवार पर तो मैं कुछ और लगाऊँगी।”
“अरे तो उसके लिए बगल वाली दीवार हैं ना।”
“नहीं, उस दीवार पर तो इसे बिल्कुल भी मत लगाना।” आशू बोल पड़ा।
“क्यों, तुझे इससे क्या तकलीफ़ है?”
“मम्मा, वहाँ मैं अपने फ़ेवरेट फ़ुटबाल प्लेयर्स का पोस्टर लगाऊँगा।”
“और इस दीवार पर मैं अपने फ़ेवरेट मॉडल्स का पोस्टर लगाऊँगी।”
नीना अपने कमरे में आकर निढाल सी बेड पर बैठ गई। मानो उसके उत्साह रूपी गुब्बारे में किसी ने सुई चुभो दी हो। विशाल ने कनखियों से नीना को देखा। नीना के हाथ में तस्वीर देख उसने माज़रा भाँप लिया।
वह बोला, “नीना, वो मैं कह रहा था कि बच्चों की तस्वीरों वाला एक कोलाज अपने बेडरूम में भी होता तो अच्छा रहता।”
“उम्म....हाँ...शायद आप ठीक कह रहे हैं ।” नीना ने पैर के अंगूठे से फ़र्श कुरेदते हुए जवाब दिया।
“क्या हुआ?” विशाल उसके निकट आकर बैठ गया।
“कुछ नहीं।”
“देखो नीना, जब बच्चे बड़े होने लगते हैं तो उनका रहन-सहन, उनका पहनना-ओढ़ना उनके परिवेश के अनुसार ढलने लगता है। और ये होना भी चाहिए।”
“वो तो ठीक है, परन्तु ये तस्वीर उनका क्या बिगाड़ रही थी?”
“नीना, बात तस्वीर की नहीं है। यह पीढि़यों का अंतर है। उनकी पीढ़ी हमारी पीढ़ी से कुछ अलग सोचती है। क्या तुम चाहोगी कि इन छोटी-छोटी बातों को लेकर हमारे और बच्चों के बीच यह पीढि़यों का अंतर और बढ़े?”
“न ना, बिलकुल भी नहीं। मैं चाहती हूँ कि वे भी खुश रहें और हम भी।” नीना के अंदर जैसे चेतना लौट आई।
“ये हुई न बात, तो अब ये बताओ कि इस तस्वीर को कहाँ लगाना है?”
“एकदम हमारी नज़रों के सामने, उस दीवार पर।”
“ओके, योर हाइनेस।” विशाल ने इस अंदाज़ से सिर झुकाया कि नीना की सारी उदासी काफ़ूर हो गई।
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।