शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

कछुआ : लघुकथा

"डैड से बोला था कि तुझे किसी प्राइवेट डॉक्टर को दिखा लेते हैं पर नहीं...कहते हैं यहाँ के डॉक्टर अच्छे हैं!” रजिस्ट्रेशन-विंडो की कतार में लगी प्रिया खीझ उठी।

“बस रजिस्ट्रेशन हो जाए, फिर आगे के लिए डैड ने तो बात की ही है ना!” उसके निकट खड़ी नेहा ने आश्वस्त किया।

कतार में प्रिया के आगे एक औरत थी, जिसकी गोद में एक बच्चा ठुनक रहा था।
“फ़ार्म भरकर लाओ!” क्लर्क ने औरत को झिड़का। औरत विंडो छोड़कर किनारे हो गई। प्रिया ने अपना पर्चा क्लर्क की ओर सरका दिया।

“अय बच्ची, हमार फरमवा भरि देतिउ!” इतना कह वह जर्जर इमारत सी फ़र्श पर बैठ गई।
“पेन नहीं है!” प्रिया ने मोबाइल कान से सटाते हुए कहा।

रजिस्ट्रेशन करा वे दोनों ओपीडी में पहुँचीं तो डिजिटल स्क्रीन पर आठ अंक चमक रहा था।

इतने में प्रिया के मोबाइल ने ’रेस इज़ ऑन माई माइंड’...की ध्वनि बजा दी, “हाँss डैड! हम वहीं हैं, ओके डैड...ओके बाय!”
मोबाइल कान से हटाते हुए उसने नेहा को अँगूठे से इशारा किया। फिर दोनों नवनिर्वाचित सांसद सी ओपीडी के रिसेप्शन की ओर लपकीं।

इतने में वह औरत भी हाँफते-खाँसते वहाँ आ पहुँची। उसका बच्चा अभी भी ठुनक रहा था। उसको संभालने में हाथ से परचा सरककर वहाँ बैठे एक बुजुर्ग के निकट आ गिरा। उसने पर्चा उठाकर औरत की ओर देखा, स्थिति भाँप वह ओपीडी के रिसेप्शन पर परचा जमा कर आया।

बच्चा बुक्का फाड़कर रोने लगा था। वह उसे चुप कराने की कोशिश में कभी आँचल के नीचे घुसाती तो कभी कंधे पर चिपका लेती।

सहसा नर्सिंग असिस्टेंट ने नाम पुकारा, “श्याम नारायण!”

“मैं हूँ!” बुज़ुर्ग ने कहा और उठकर चिकित्सक-कक्ष में दाखिल हो गया परंतु जल्द ही विजित मुस्कान के साथ बाहर निकला।

उसके पीछे नर्सिंग असिस्टेंट भी बाहर निकला, “शांतिदेवी कौन हैं!”

“हाँआँ...हम हई!" औरत अचकचाकर उसे देखने लगी।

“जल्दी आओ, तुम्हारा नंबर है!”

नेहा और प्रिया, जिन्होंने चिकित्सक तक शीघ्र पहुँचने के लिए अब तक तमाम अस्त्र-शस्त्र प्रयोग कर डाले थे, वे दीदे फाड़-फाड़कर उक्त बुज़ुर्ग को ऐसे देखने लगीं जैसे वह कोई पुरस्कार लौटा आया हो। 

बुज़ुर्ग अब पत्रिका पलटने में बुद्ध हो चुका था।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

तख्त पलट : लघुकथा

जगन, छगन, गगन। मध्यावकाश की घंटी बजी नहीं कि इनकी गेंद तड़ी चालू।

"जगन हमें दे! जगन हमें दे!"

चूँकि गेंद जगन की है तो वह जिसको चाहता पहली चाल उसी की होती। ऐसे में छगन नंबर मार जाता। यह कमाल उसकी जेब का है। जो कभी अंबियों, तो कभी जामुनों से फूली रहती है। 

"ओ छगन, एक अंबी दे ना!" 

भाव तय था। एक अंबी या तीन जामुनों पर एक चाल।

कुछ गेंद की आस में तो खड़े रहते लेकिन जामुन देखकर स्वाद हावी हो जाता। इस तरह से वे अपनी चाल भी छगन को दे देते। 

"छगन हमें भी! छगन हमें भी!"

कभी-कभी तो लगता है कि गेंद का मालिक जगन नहीं छगन है। 

और गगन,  जिसे न अंबियों की चाहत है न जामुन की। वह तो बस अपनी चाल की प्रतीक्षा में गेंद को टुकुर-टुकुर देखता रहता है। कभी चाल मिलती भी है तो मध्यावकाश समाप्त की घंटी बज जाती है। 

अधिकांशतः वह सूखी टहनियों से अकेले ही खेलता रहता है।

आज मौसम बदला-बदला दिख रहा है और आठवाँ आश्चर्य भी दिखा। आज मध्यावकाश में गेंद तड़ी नहीं खेली जा रही है! जगन गुमसुम-सा दिख रहा है। छगन की जेब भी पोपट-सी दिख रही है। अब हर मौसम में अंबियाँ और जामुन तो फलने से रहे। 

बल्कि आज तो गगन रानी मधुमक्खी बना बच्चों से घिरा हुआ दिख रहा है। 

"कैसे बनाई, हमें भी बनाना सिखा ना!" ऐसी कई आवाज़ें उसके इर्द-गिर्द से आ रही हैं।

गगन के हाथ में एक गेंद दिख रही है। आखिर बच्चे कहाँ बैठनेवाले। गेंद तड़ी फिर चालू।