शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

कछुआ : लघुकथा

"डैड से बोला था कि तुझे किसी प्राइवेट डॉक्टर को दिखा लेते हैं पर नहीं...कहते हैं यहाँ के डॉक्टर अच्छे हैं!” रजिस्ट्रेशन-विंडो की कतार में लगी प्रिया खीझ उठी।

“बस रजिस्ट्रेशन हो जाए, फिर आगे के लिए डैड ने तो बात की ही है ना!” उसके निकट खड़ी नेहा ने आश्वस्त किया।

कतार में प्रिया के आगे एक औरत थी, जिसकी गोद में एक बच्चा ठुनक रहा था।
“फ़ार्म भरकर लाओ!” क्लर्क ने औरत को झिड़का। औरत विंडो छोड़कर किनारे हो गई। प्रिया ने अपना पर्चा क्लर्क की ओर सरका दिया।

“अय बच्ची, हमार फरमवा भरि देतिउ!” इतना कह वह जर्जर इमारत सी फ़र्श पर बैठ गई।
“पेन नहीं है!” प्रिया ने मोबाइल कान से सटाते हुए कहा।

रजिस्ट्रेशन करा वे दोनों ओपीडी में पहुँचीं तो डिजिटल स्क्रीन पर आठ अंक चमक रहा था।

इतने में प्रिया के मोबाइल ने ’रेस इज़ ऑन माई माइंड’...की ध्वनि बजा दी, “हाँss डैड! हम वहीं हैं, ओके डैड...ओके बाय!”
मोबाइल कान से हटाते हुए उसने नेहा को अँगूठे से इशारा किया। फिर दोनों नवनिर्वाचित सांसद सी ओपीडी के रिसेप्शन की ओर लपकीं।

इतने में वह औरत भी हाँफते-खाँसते वहाँ आ पहुँची। उसका बच्चा अभी भी ठुनक रहा था। उसको संभालने में हाथ से परचा सरककर वहाँ बैठे एक बुजुर्ग के निकट आ गिरा। उसने पर्चा उठाकर औरत की ओर देखा, स्थिति भाँप वह ओपीडी के रिसेप्शन पर परचा जमा कर आया।

बच्चा बुक्का फाड़कर रोने लगा था। वह उसे चुप कराने की कोशिश में कभी आँचल के नीचे घुसाती तो कभी कंधे पर चिपका लेती।

सहसा नर्सिंग असिस्टेंट ने नाम पुकारा, “श्याम नारायण!”

“मैं हूँ!” बुज़ुर्ग ने कहा और उठकर चिकित्सक-कक्ष में दाखिल हो गया परंतु जल्द ही विजित मुस्कान के साथ बाहर निकला।

उसके पीछे नर्सिंग असिस्टेंट भी बाहर निकला, “शांतिदेवी कौन हैं!”

“हाँआँ...हम हई!" औरत अचकचाकर उसे देखने लगी।

“जल्दी आओ, तुम्हारा नंबर है!”

नेहा और प्रिया, जिन्होंने चिकित्सक तक शीघ्र पहुँचने के लिए अब तक तमाम अस्त्र-शस्त्र प्रयोग कर डाले थे, वे दीदे फाड़-फाड़कर उक्त बुज़ुर्ग को ऐसे देखने लगीं जैसे वह कोई पुरस्कार लौटा आया हो। 

बुज़ुर्ग अब पत्रिका पलटने में बुद्ध हो चुका था।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

तख्त पलट : लघुकथा

जगन, छगन, गगन। मध्यावकाश की घंटी बजी नहीं कि इनकी गेंद तड़ी चालू।

"जगन हमें दे! जगन हमें दे!"

चूँकि गेंद जगन की है तो वह जिसको चाहता पहली चाल उसी की होती। ऐसे में छगन नंबर मार जाता। यह कमाल उसकी जेब का है। जो कभी अंबियों, तो कभी जामुनों से फूली रहती है। 

"ओ छगन, एक अंबी दे ना!" 

भाव तय था। एक अंबी या तीन जामुनों पर एक चाल।

कुछ गेंद की आस में तो खड़े रहते लेकिन जामुन देखकर स्वाद हावी हो जाता। इस तरह से वे अपनी चाल भी छगन को दे देते। 

"छगन हमें भी! छगन हमें भी!"

कभी-कभी तो लगता है कि गेंद का मालिक जगन नहीं छगन है। 

और गगन,  जिसे न अंबियों की चाहत है न जामुन की। वह तो बस अपनी चाल की प्रतीक्षा में गेंद को टुकुर-टुकुर देखता रहता है। कभी चाल मिलती भी है तो मध्यावकाश समाप्त की घंटी बज जाती है। 

अधिकांशतः वह सूखी टहनियों से अकेले ही खेलता रहता है।

आज मौसम बदला-बदला दिख रहा है और आठवाँ आश्चर्य भी दिखा। आज मध्यावकाश में गेंद तड़ी नहीं खेली जा रही है! जगन गुमसुम-सा दिख रहा है। छगन की जेब भी पोपट-सी दिख रही है। अब हर मौसम में अंबियाँ और जामुन तो फलने से रहे। 

बल्कि आज तो गगन रानी मधुमक्खी बना बच्चों से घिरा हुआ दिख रहा है। 

"कैसे बनाई, हमें भी बनाना सिखा ना!" ऐसी कई आवाज़ें उसके इर्द-गिर्द से आ रही हैं।

गगन के हाथ में एक गेंद दिख रही है। आखिर बच्चे कहाँ बैठनेवाले। गेंद तड़ी फिर चालू।

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मिन्नी की बात :

सुनो! पता नहीं, क्या हो गया है सबको! कोई किसी से बात ही नहीं करता। सब मोबाइल में लगे हैं। मम्मी-पापा-दीदी, सब के सब।
जानती हो, आज तो मुझे भी मोबाइल पर पढ़ाया गया। बहुत मज़ा आया। अरे, तुमको तो पता ही नहीं, वाट्सएप पर मेरी कक्षा का ग्रुप बना है। मैडम की आवाज़ सुनी, दोस्तों की भी आवाज़ सुनी। पर मैं अपनी आवाज़ उनको नहीं सुना सकी, वो दीदी ने मोबाइल ले लिया, उनकी बड़ी कक्षा है ना।
दीदी मम्मी पर गुस्सा कर रही थी, उनका मोबाइल मम्मी ने ले लिया था। मम्मी को पढ़ाना होता है ना। मम्मी का मोबाइल अटक गया है।
पापा अपना मोबाइल मम्मी को दे गए हैं। इसलिए आज थोड़ी देर के लिए मुझे भी अपनी मैडम की आवाज़ सुनने को मिली। मैडम ने काम दिया था, पहले शायद। पर मुझे दिखा नहीं। इतने सारे मैसेज में पता ही नहीं चलता कि काम कब मिला?
दीदी बहुत उदास है। आज उनका टेस्ट छूट गया। मोबाइल का डेटा खतम हो गया था ना। पापा रात देर से आए। मम्मी बच्चों का टेस्ट ले रही थीं। जब उन्होंने दीदी को अपना मोबाइल दिया तबतक टेस्ट खतम हो गया था। ग्रुप पर दीदी का नाम टेस्ट न देने वाले बच्चों के साथ लिखा था। पापा ने कहा जाने दो, लेकिन दीदी ने खाना नहीं खाया।
मम्मी परेशान हैं। उनको पढ़ाना जो है। उनका वीडियो अपलोड नहीं हो रहा है। पापा ने खाना बनाया है। दाल में नमक जादा हो गया। दीदी ने थोड़ी देर के लिए मुझे अपना मोबाइल दिया था। मेरा नाम मैडम ने लिया था। मुझे अच्छा लगा। लेकिन वे टेस्ट में मेरा नंबर काट लेंगी। पर मैं तो किताब पढ़ती हूँ?
पापा को बुखार है। वे काम पर गए हैं। मम्मी वीडियो रिकॉर्ड कर रही हैं। उनकी आवाज़ बार-बार अटक जा रही है। शायद उनको रोना आ रहा है। दीदी ने मैगी बनाई है। मैंने उनसे मोबाइल माँगा लेकिन उनको शाम तक काम करके भेजना है। नहीं तो मैडम उनका नाम ग्रुप में फिर लिख देंगी। पिछले साल दीदी फस्ट आई थी। उसको स्कूल में इनाम मिला था।
दीदी को बुखार है। रात देर तक काम करके भेज रही थी। पापा उनका नया चश्मा ले आए। थोड़ी देर के लिए मुझे उनका मोबाइल मिल गया था। मैंने अपनी नई पेंटिंग ग्रुप में भेजी थी। कुछ बच्चों ने मेरे नाम के साथ लूज़र वाला स्माइली लगा दिया था। मैडम ने काम जमा न करने वाले बच्चों के नाम लिखे थे। मेरा नाम भी लिखा था। लेकिन उन्होंने मेरी पेंटिंग नहीं देखी।
स्कूल से मैसेज आया है। मम्मी ने कहा कि इस साल केवल दीदी पढ़ेगी। उनका बोर्ड है। मेरा नाम कट गया है। अब मुझे अपना ग्रुप भी नहीं दिख रहा है। दीदी रो रही है। उसकी होमवर्क की फ़ाइल फोन में नहीं मिल रही है। आज मैडम ने माँगा है। पापा भी ढूँढ़ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि फोन की मेमोरी कम है।
डायरी तुम अच्छी हो। मैंने तुम्हारी पेंटिंग बनाई है। तुम देखोगी ना?
-अर्चना तिवारी
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शनिवार, 27 जून 2020

खारे दिन

वह तिराहे के एक किनारे खड़ा था। सिर पर अंगोछा लपेटे। जिसका एक सिरा नाक-मुँह से होता हुआ कान तक जाकर गायब हो गया था। कुछ भी नाम हो सकता है उसका किन्तु चेहरे के नाम पर एक जोड़ी आँखें थीं, जो सड़क पर सर्राटे से जाती गाड़ियों को टुकुर-टुकुर ताक रही थीं। पास में एक रिक्शा खड़ा था। रिक्शे और उसमें यह तुलना करना कठिन था कि दोनों में से कौन अधिक जर्जर है।

उसके सामने से जाते ई-रिक्शे टाई-कोट पहने साहब से प्रतीत हो रहे थे। सड़क पर जो भी सवारियाँ आती थीं सरसराती हुई साँप की भांति उसमें घुस जाती थीं, जैसे कि कोई बिल हो।

रिज़वान उनको निरीह सा देखता रह जाता। हाँ, ‘रिज़वान’ रिक्शे के पीछे यही नाम पेंट था।

एक युवती वहाँ अवतरित हुई। उसका चेहरा भी काले चश्में और दुपट्टे से चाकचौबंद था। उसकी गर्दन का इधर-उधर हिलना बता रहा था कि वह कुछ तलाश रही है।

“बिटिया किधर जाएँगी?” रिज़वान ने अंगोछा मुँह से सरकाते हुए पूछा।

“दादा मुझे ई-रिक्शे से जाना है।“ दुपट्टे के बंधन से युवती का मुख हिला।

रिज़वान रिक्शा लेकर निकट आ गया। उसने रिक्शे के पीछे खोंसी एक बोतल को खोलकर पानीनुमा द्रव एक कपड़े पर उलीच लिया और शीघ्रता से रिक्शे की गद्दी पोछने लगा।

“बिटिया हमने सब सनेट कर दिया है देखिए।“

“सेनेटाइज़!” युवती ने सुधारा।

“हाँ हाँ बिटिया जी वही।“

“लेकिन ये तो सेनेटाइज़र नहीं लग रहा है?”

“बिटिया, हम पूछे रहे मेडिकल में, सौ रुपिया का रहा, उधार देवै के तइयार नहीं हुए।“

“तो ये पानी है?”

“हह हाँ बिटिया पानी तो है लेकिन हम नमक डाले हैं इसमें। हमरी नतिनी कहीं सुन के आई थीं, वही बताईं कि पानी में नमक डालने से सब सनेट हो जाता है।“

“अरे दादा, सेनेटाइज़ बोलिए!”

“हाँ बिटिया जी वही, सब कर दिया है, आइए बैठिए।“

“लेकिन दादा, इससे सेनेटाइज़ नहीं होता है।“

“अ अ बिटिया जी...” रिज़वान की आवाज़ घिघियाने लगी।

उसी क्षण चील की भांति एक ई-रिक्शा युवती के निकट आया।

ई-रिक्शेवाले ने रिक्शे की गद्दी और आजू-बाजू पर फर्र-फर्र स्प्रे की फुहार की। युवती ने पर्स से एक शीशी निकाली। उसमें से द्रव की बूँदें हथेलियों पर गिराईं। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए ई-रिक्शे में समा गई।

रिज़वान दूर तक ई-रिक्शे को जाता देखता रहा। उसके चेहरे के दो गोलों से कुछ बूँदें टपक कर जाने कहाँ गुम हो गईं।

शनिवार, 23 मई 2020

बेगाने

बाग़ के मालिक ने ढेला उठा कर वृक्ष की टहनियों पर दे मारा। चह-चह करते पंछी उड़ चले।

फुटपाथ पर बैठा नजफ़ भावशून्य आँखों से आसमान में उन्हें दूर तक जाते हुए देखता रहा।

“कहाँ गए होंगे? अपने-अपने बसेरों पर शायद?” नजफ़ की होठों की सूखी पपड़ाई पत्तियाँ थरथरा उठीं।

“न...जाएँगे कहाँ, बसेरे तो यहीं हैं उनके भी।“ साथ बैठा बिशनू मुँह पर अंगोछा फेरते हुए बोल पड़ा।

“पर लौटकर आएँगे क्या?...मालिक के ढेलों का भय...शायद न भी आएँ। और क्या पता कि उनके बसेरे यहाँ पर हों ही न।“ नजफ़ अभी भी आसमान को निहारे जा रहा था।

“पंछियों का क्या है, जहाँ चुगने को मिल जाए बसेरे वहीँ बना लेते हैं।“

“ठीक कहते हो बिशनू बिना दानों के बसेरों का भी क्या अर्थ।“ कहते हुए कहीं खो गया नजफ़।

“वो देखो इमारतों के बारजों से कितने हाथ निकल आए हैं इनको चुगाने के लिए।“ कहते हुए बिशनू पानी की मुड़ी-तुड़ी बोतल का ढक्कन खोलने लगा।

“चलो..कम से कम ये हाथ तो ढेले नहीं मारेंगे ना!” नजफ़ के पपड़ाए होठों के फैलने से खून रिस आया।

“क्या पता...अभी तो सेवा भाव दिख रहा है इनमें।“ बोतल से बचे पानी की बूँदें मुँह में झारते हुए बिशनू बोला।

”अभी तो का क्या मतलब?...तो क्या ये हाथ भी...?”

“नरेसा बता रहा था कि मालिक दोबारा बुलाए हैं सबको, कहते हैं कि घर जाओगे तो...!” आगे के शब्द गले में ही घुट गए बिशनू के। उसने दाँतों के बीच दोनों होठों को जोर से दबा लिया। 

“तो...रुकोगे क्या, पता नहीं यह बेमारी कब तक...?”

नजफ़ की बात का जवाब दिए बिना बिशनू उठा और एक ढेला लेकर पूरी ताकत से उछाल दिया बारजों की ओर।

पंछी चह-चह कर उड़ चले...दूर...



शनिवार, 28 सितंबर 2019

पहचान : लघु कहानी

मुझे बहुत अच्छे लगते हैं प्रशांत भैया।
जब भी सोनी बुआ के आने की खबर लगती तो मैं पूरे घर में फिरकी सी नाचने लगती। जुबान यह पूछ-पूछ कर हलकान कर लेती कि
"बुआ की ट्रेन कब आएगी।"
"ये बुआ हमेशा हमारे स्कूल जाने के बाद ही क्यों आती हैं?"

सुबह साढ़े छह बजे स्कूल वैन यमदूत की तरह द्वार पर आ धमकती। स्कूल में तो समय जैसे रुक ही जाता था। दिनभर ख्याल घर पर टंगा रहता।

घर आने पर नज़रें प्रशांत भैया को खोजतीं। साथ मन में धुक-धुकी भी लगी रहती कि कहीं ऐसा न हो कि भैया आए ही न हों पर जैसे ही भैया दिखते मेरी आँखें फुलझड़ी हो जातीं। हम दोनों साथ-साथ खूब घर-घरौंदा खेलते।

इस बार न जाने क्यों बुआ बहुत उदास थीं।
पिता जी उनको समझा रहे थे। "अब ज़माना बदल गया है छोटी, चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा! प्रशांत को यहीं छोड़ जा!"

यह सुनते ही मुझे ऐसा लगा जैसे चालीस चोरों का खजाना हाथ लग गया हो। बुआ जाते समय प्रशांत भैया को कुछ समझा रही थीं। वे सिर हिलाते हुए उनकी साड़ी के पल्लू से खेल रहे थे।

बुआ चली गईं। उनके जाने के बाद मुझे जितनी खुशी हुई उससे कहीं अधिक सिर पर चिंता सवार थी। मैं पिता जी से बार-बार पूछती।
"प्रशांत भैया अब हमेशा हमारे साथ रहेंगे ना?" "अगर बुआ लेने आ गयीं तो?"
"अगर आ गईं तो अबकी तुझे भेज देंगे उनके साथ!" चश्में के ऊपर से झाँकती उनकी शरारती आँखें देख मैं ठुनकने लगती तो वे जोर से हँसते। फिर संजीदगी से कहते, "जा प्रशांत को अपने साथ ले जा खेलने!"

यूँ तो मंदिर जाना, पूजा करना मुझे कभी भी भाता नहीं था लेकिन प्रशांत भैया के लिए स्कूल वैन में आते-जाते हर छोटे-बड़े मंदिर को देख बुदबुदाती जाती, "हे भगवान, बुआ कभी भैया को न ले जाएँ! भैया हमारे साथ रहें!"

घर में एक मास्टर जी आने लगे थे। भैया को पढ़ाने के लिए। वे मुझे ज़रा भी अच्छे नहीं लगते थे। वे भैया को जाने क्या-क्या कहते थे। उस समय मैं उन्हें समझ नहीं पायी थी। शायद भैया समझते थे। तभी तो उनकी गोल-गोल आँखें डूबते सूरज सी हो जाती थीं। पर उनको रोते नहीं देखा था। वे हमेशा चुप रहते थे।

कुछ दिन बाद पिता जी ने मास्टर जी को हटा दिया। भैया मेरे साथ स्कूल जाने लगे। अब वे काफी खुश दिखने लगे थे।

वे सबसे अधिक खुश तब होते थे जब वे जीने पर बैठ कर अपनी ड्राइंग की काॅपी में कुछ बनाया करते थे। मैंने कई बार देखने का प्रयास किया लेकिन वे उसे झट से बंद कर देते थे।

उस दिन भी भैया जीने पर बैठे अपनी ड्राइंग की काॅपी में कुछ बना रहे थे। लेकिन इस बार मुझे आता देख उन्होंने अपनी काॅपी बंद नहीं की बल्कि वे मेरी ओर देख कर मुस्कुराए भी। मैं भी उनके करीब जाकर जीने पर बैठ गयी।
उन्होंने अपनी काॅपी मेरी ओर बढ़ा दी। मेरी जिज्ञासा कुलाँचे मारने लगी। मैं पन्ने उलट-पलट कर उनके बनाए चित्रों को देखे जा रही थी। हर चित्र भैया के नये रूप का परिचय करवा रहा था।

मैं उनके चित्रों को देख रही थी और भैया मेरे चेहरे को पढ़ रहे थे। पहली बार उनका अबोला टूटा था।

"अनु मेरे चित्र कैसे लगे?"
पहली बार भैया की आवाज़ सुन रही थी। उनकी आवाज़ ने मेरे अंदर उमड़ रहे बहुत से प्रश्नों का जवाब दे दिया था साथ ही बुआ जी की उदासी का सबब भी समझ आ गया। उस दिन लगा जैसे मैं भैया को अच्छी तरह से जान गयी हूँ।

धीरे-धीरे समय भी उनको तवज्जो देने लगा था।
भैया ने एक टेस्ट दिया था जिसका परिणाम आने पर वे बहुत खुश थे। वे दिल्ली चले गए।
पढ़ाई खत्म कर मैं भी विद्यालय में पढ़ाने लगी।

आज प्रशांत भैया का एक ईमेल आया है। उन्होंने लिखा है कि अगले हफ़्ते उनकी डिज़ाइन की हुई फीमेल ड्रेसेज़ का फैशन शो है। ईमेल में भैया की अपनी कुछ तस्वीरें भी हैं। जिसमें स्त्रियों की भिन्न-भिन्न वेशभूषा में प्रशांत भैया बहुत आत्मविश्वास से भरे, खिले-खिले दिख रहे थे, जैसे उस दिन उनकी ड्राइंग की काॅपी में बने चित्रों में एक लड़का ऐसी ही भिन्न-भिन्न वेशभूषा में नज़र आ रहा था...बिंदास!... बेमिसाल!... जिसने अब अपनी पहचान बना ली थी।

रविवार, 15 सितंबर 2019

गुब्बारा

चूहा इधर से गया कि उधर से। पारिवारिक नोकझोंक के लिए किसी मुद्दे की आवश्यकता होती है क्या? और फिर बात तेरी-मेरी के खाल उधेड़ तक कब पहुँच जाती है पता भी नहीं चलता। आज जब बात हद से गुजरने लगी तो हम झनकते-पटकते घर से निकल आए। अनमने से कॉलोनी के पार्क की ओर चल दिए।

पार्क में प्रवेश करते ही दायीं ओर एक बेंच दिखी। सोचा वहीँ चलकर ग़म गलत करते हैं। बेंच के निकट पहुँचे तो देखा बेंच के नीचे भैरव जी के वाहन विष्णु मुद्रा में शयनागत थे। हमें देखते ही उन्होंने डोंट डिस्टर्ब वाला नाद किया। खतरा भाँप हम फ़ौरन पार्क के वाम ओर पलट गए।

हम अगले किसी सुखासन की खोज में आगे बढ़े तो एक दूसरी बेंच पर महिलामंडल विराजमान था। टहलने वाली पट्टी पर चलते हुए हम उनके सामने से गुजरे।

“सब्जी पका कर आटा लगा दिया है, जब लेडीज़ स्पेशल सीरियल शुरू होता है तब डिनर करते हैं!’’

“हमने तो नेट फ्लिक्स ले लिया है, टीवी पर तो ये ही चिपके रहते हैं...जब देखो न्यूज़ चैनल!’’

सुनते हुए हम आगे बढ़ आए थे। वहाँ हल्का सा अँधेरा था और एक बेंच भी थी। पास पहुँचे तो देखा कि उसके बगल वाली बेंच पर आधुनिक उर्वशी और पुरुरवा आसन जमाए एक-दूसरे को पकौड़े खिला रहे हैं। हम एकांत चाहते थे इसलिए वहाँ बैठने का विचार त्याग आगे बढ़ गए।

“कोई ठरकी है...आँखें सेंकने का इरादा होगा।’’
यह पुरुरवा का उवाच था। उसमें ताल देती उर्वशी की हुहूहू करती पकौड़ा ठुँसी हँसी सुनाई दी।

पार्क का एक चक्कर पूरा हो चुका था। हम दोबारा भैरव महाराज के वाहन के निकट पहुँच चुके थे। अब उनके साथ उनकी प्रियतमा भी विहार कर रही थीं। वे हमें दोबारा वार्निंग देते उससे पहले हम वापस पलट आए। अब हम अपनी बाँहों को हिलाते हुए तेज-तेज चलने लगे ताकि लगे कि हम व्यायाम करने आए हैं।

उर्वशी और पुरुरवा का पकौड़ा कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। मोबाइल पर कोई गीत बज रहा था। वे दोनों एक-दूसरे में खोये से बैठे थे। हम दोबारा महिलाओं वाली बेंच के निकट पहुँचने वाले थे।

“शनिवार की शाम को हम अक्सर बाहर ही खाते हैं।’’ एक महिला ने उद्घाटित किया।

“और हमारे वाले तो कहते हैं कि एक दिन तो आराम कर लेने दो...सन्डे तो कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।’’ लंबी उसाँस छोड़ते हुए दूसरी महिला बोली।

हमें दूसरी वाली की बात ज्यादा जँची। अब हमारे चलने की रफ़्तार बढ़ गई थी। सामने एक बेंच खाली दिखी लेकिन अब हम पूर्ण रूप से घूमने के मूड में आ चुके थे। पार्क के लगभग सात-आठ चक्कर लगाने के बाद हमने अपनी चाल मंद कर दी। चेहरे को छूती मंद-मंद पुरवाई भली लग रही थी। हम पार्क में थोड़ी देर सुस्ताना चाहते थे लेकिन अब मन जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहता था। हम पार्क से बाहर निकलने का उपक्रम करने लगे।

और हाँ, घर से जो गुबार लेकर आए थे वह इस समय गुब्बारा बन कहीं और उड़ चला था। आपको दिखे तो पकड़िएगा मत...!