शनिवार, 27 जून 2020

नमकीन दिन

वह खाली रिक्शा लिए तिराहे तक जाता फिर वहाँ से वापस लौटता। सिर पर अंगोछा लपेटे। जिसका एक सिरा नाक-मुँह से होता हुआ कान तक जाकर गायब हो गया था। कुछ भी नाम हो सकता है उसका किन्तु चेहरे के नाम पर दो गड्ढे थे जिनमें उभरी आँखें सड़क पर सर्राटे से आती-जाती गाड़ियों को टुकुर-टुकुर ताक रही थीं।

उसके सामने से जाते बैटरीरिक्शे टाई-कोट पहने साहब से प्रतीत हो रहे थे। सड़क पर जो भी सवारियाँ आती थीं सरसराती हुई साँप की भांति उसमें घुस जाती थीं, मानो बैटरीरिक्शा न हो कोई बिल हो।

रिज़वान उनको निरीह सा देखता रह जाता। हाँ, ‘रिज़वान’ रिक्शे के पीछे यही नाम पेंट था।
रिक्शे और उसमें यह तुलना करना कठिन था कि दोनों में से कौन अधिक पुराना है।

एक युवती वहाँ अवतरित हुई। उसका चेहरा भी काले चश्मे और दुपट्टे से चाकचौबंद था। उसकी गर्दन का इधर-उधर हिलना बता रहा था कि वह कुछ तलाश रही है।

“बिटिया किधर जाएँगी?” रिज़वान ने अंगोछा मुँह से सरकाते हुए पूछा।

“दादा मुझे ईरिक्शा से जाना है।“ दुपट्टे के बंधन से युवती का मुख हिला।

रिज़वान रिक्शा लेकर निकट आ गया। उसने रिक्शे के पीछे खोंसी एक बोतल को खोलकर पानीनुमा द्रव एक कपड़े पर उलीच लिया और शीघ्रता से रिक्शे की गद्दी पोछने लगा।

“बिटिया हमने सब सनेट कर दिया है देखिए।“

“सेनेटाइज़!” युवती ने सुधारा।

“हाँ हाँ बिटिया जी वही।“

“लेकिन ये तो सेनेटाइज़र नहीं लग रहा है?”

“बिटिया, हम पूछे रहे मेडिकल में, सौ रुपिया का रहा, उधार देवै के तइयार नहीं हुए।“

“तो ये पानी है?”

“हह हाँ बिटिया पानी तो है लेकिन हम नमक डाले हैं इसमें। हमरी नतिनी कहीं सुन के आई थीं, वही बताईं कि पानी में नमक डालने से सब सनेट हो जाता है।“

“अरे दादा, सेनेटाइज़ बोलिए!”

“हाँ बिटिया जी वही, सब कर दिया है, आइए बैठिए।“

“लेकिन दादा, इससे सेनेटाइज़ नहीं होता है।“

“अ अ बिटिया जी...” रिज़वान की थकी आवाज़ घिघियाने सी लगी।

उसी क्षण चील की भांति एक बैटरीरिक्शा युवती के निकट आया।
बैटरीरिक्शेवाले ने रिक्शे की गद्दी और आजू-बाजू पर फर्र-फर्र स्प्रे की फुहार की। युवती ने पर्स से एक शीशी निकाली। उसमें से द्रव की बूँदें हथेलियों पर गिराईं। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए बैटरीरिक्शे में समा गई।

रिज़वान अपने हाथ में पकड़ी बोतल में झाँक रहा था। मानो वह अपने चेहरे के गोलों से टपकने वाली बूँदों से उसे भर रहा हो।

शनिवार, 23 मई 2020

बेगाने

बाग़ के मालिक ने ढेला उठा कर वृक्ष की टहनियों पर दे मारा। चह-चह करते पंछी उड़ चले।

फुटपाथ पर बैठा नजफ़ भावशून्य आँखों से आसमान में उन्हें दूर तक जाते हुए देखता रहा।

“कहाँ गए होंगे? अपने-अपने बसेरों पर शायद?” नजफ़ की होठों की सूखी पपड़ाई पत्तियाँ थरथरा उठीं।

“न...जाएँगे कहाँ, बसेरे तो यहीं हैं उनके भी।“ साथ बैठा बिशनू मुँह पर अंगोछा फेरते हुए बोल पड़ा।

“पर लौटकर आएँगे क्या?...मालिक के ढेलों का भय...शायद न भी आएँ। और क्या पता कि उनके बसेरे यहाँ पर हों ही न।“ नजफ़ अभी भी आसमान को निहारे जा रहा था।

“पंछियों का क्या है, जहाँ चुगने को मिल जाए बसेरे वहीँ बना लेते हैं।“

“ठीक कहते हो बिशनू बिना दानों के बसेरों का भी क्या अर्थ।“ कहते हुए कहीं खो गया नजफ़।

“वो देखो इमारतों के बारजों से कितने हाथ निकल आए हैं इनको चुगाने के लिए।“ कहते हुए बिशनू पानी की मुड़ी-तुड़ी बोतल का ढक्कन खोलने लगा।

“चलो..कम से कम ये हाथ तो ढेले नहीं मारेंगे ना!” नजफ़ के पपड़ाए होठों के फैलने से खून रिस आया।

“क्या पता...अभी तो सेवा भाव दिख रहा है इनमें।“ बोतल से बचे पानी की बूँदें मुँह में झारते हुए बिशनू बोला।

”अभी तो का क्या मतलब?...तो क्या ये हाथ भी...?”

“नरेसा बता रहा था कि मालिक दोबारा बुलाए हैं सबको, कहते हैं कि घर जाओगे तो...!” आगे के शब्द गले में ही घुट गए बिशनू के। उसने दाँतों के बीच दोनों होठों को जोर से दबा लिया। 

“तो...रुकोगे क्या, पता नहीं यह बेमारी कब तक...?”

नजफ़ की बात का जवाब दिए बिना बिशनू उठा और एक ढेला लेकर पूरी ताकत से उछाल दिया बारजों की ओर।

पंछी चह-चह कर उड़ चले...दूर...



शनिवार, 28 सितंबर 2019

पहचान : लघु कहानी

मुझे बहुत अच्छे लगते हैं प्रशांत भैया।
जब भी सोनी बुआ के आने की खबर लगती तो मैं पूरे घर में फिरकी सी नाचने लगती। जुबान यह पूछ-पूछ कर हलकान कर लेती कि
"बुआ की ट्रेन कब आएगी।"
"ये बुआ हमेशा हमारे स्कूल जाने के बाद ही क्यों आती हैं?"

सुबह साढ़े छह बजे स्कूल वैन यमदूत की तरह द्वार पर आ धमकती। स्कूल में तो समय जैसे रुक ही जाता था। दिनभर ख्याल घर पर टंगा रहता।

घर आने पर नज़रें प्रशांत भैया को खोजतीं। साथ मन में धुक-धुकी भी लगी रहती कि कहीं ऐसा न हो कि भैया आए ही न हों पर जैसे ही भैया दिखते मेरी आँखें फुलझड़ी हो जातीं। हम दोनों साथ-साथ खूब घर-घरौंदा खेलते।

इस बार न जाने क्यों बुआ बहुत उदास थीं।
पिता जी उनको समझा रहे थे। "अब ज़माना बदल गया है छोटी, चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा! प्रशांत को यहीं छोड़ जा!"

यह सुनते ही मुझे ऐसा लगा जैसे चालीस चोरों का खजाना हाथ लग गया हो। बुआ जाते समय प्रशांत भैया को कुछ समझा रही थीं। वे सिर हिलाते हुए उनकी साड़ी के पल्लू से खेल रहे थे।

बुआ चली गईं। उनके जाने के बाद मुझे जितनी खुशी हुई उससे कहीं अधिक सिर पर चिंता सवार थी। मैं पिता जी से बार-बार पूछती।
"प्रशांत भैया अब हमेशा हमारे साथ रहेंगे ना?" "अगर बुआ लेने आ गयीं तो?"
"अगर आ गईं तो अबकी तुझे भेज देंगे उनके साथ!" चश्में के ऊपर से झाँकती उनकी शरारती आँखें देख मैं ठुनकने लगती तो वे जोर से हँसते। फिर संजीदगी से कहते, "जा प्रशांत को अपने साथ ले जा खेलने!"

यूँ तो मंदिर जाना, पूजा करना मुझे कभी भी भाता नहीं था लेकिन प्रशांत भैया के लिए स्कूल वैन में आते-जाते हर छोटे-बड़े मंदिर को देख बुदबुदाती जाती, "हे भगवान, बुआ कभी भैया को न ले जाएँ! भैया हमारे साथ रहें!"

घर में एक मास्टर जी आने लगे थे। भैया को पढ़ाने के लिए। वे मुझे ज़रा भी अच्छे नहीं लगते थे। वे भैया को जाने क्या-क्या कहते थे। उस समय मैं उन्हें समझ नहीं पायी थी। शायद भैया समझते थे। तभी तो उनकी गोल-गोल आँखें डूबते सूरज सी हो जाती थीं। पर उनको रोते नहीं देखा था। वे हमेशा चुप रहते थे।

कुछ दिन बाद पिता जी ने मास्टर जी को हटा दिया। भैया मेरे साथ स्कूल जाने लगे। अब वे काफी खुश दिखने लगे थे।

वे सबसे अधिक खुश तब होते थे जब वे जीने पर बैठ कर अपनी ड्राइंग की काॅपी में कुछ बनाया करते थे। मैंने कई बार देखने का प्रयास किया लेकिन वे उसे झट से बंद कर देते थे।

उस दिन भी भैया जीने पर बैठे अपनी ड्राइंग की काॅपी में कुछ बना रहे थे। लेकिन इस बार मुझे आता देख उन्होंने अपनी काॅपी बंद नहीं की बल्कि वे मेरी ओर देख कर मुस्कुराए भी। मैं भी उनके करीब जाकर जीने पर बैठ गयी।
उन्होंने अपनी काॅपी मेरी ओर बढ़ा दी। मेरी जिज्ञासा कुलाँचे मारने लगी। मैं पन्ने उलट-पलट कर उनके बनाए चित्रों को देखे जा रही थी। हर चित्र भैया के नये रूप का परिचय करवा रहा था।

मैं उनके चित्रों को देख रही थी और भैया मेरे चेहरे को पढ़ रहे थे। पहली बार उनका अबोला टूटा था।

"अनु मेरे चित्र कैसे लगे?"
पहली बार भैया की आवाज़ सुन रही थी। उनकी आवाज़ ने मेरे अंदर उमड़ रहे बहुत से प्रश्नों का जवाब दे दिया था साथ ही बुआ जी की उदासी का सबब भी समझ आ गया। उस दिन लगा जैसे मैं भैया को अच्छी तरह से जान गयी हूँ।

धीरे-धीरे समय भी उनको तवज्जो देने लगा था।
भैया ने एक टेस्ट दिया था जिसका परिणाम आने पर वे बहुत खुश थे। वे दिल्ली चले गए।
पढ़ाई खत्म कर मैं भी विद्यालय में पढ़ाने लगी।

आज प्रशांत भैया का एक ईमेल आया है। उन्होंने लिखा है कि अगले हफ़्ते उनकी डिज़ाइन की हुई फीमेल ड्रेसेज़ का फैशन शो है। ईमेल में भैया की अपनी कुछ तस्वीरें भी हैं। जिसमें स्त्रियों की भिन्न-भिन्न वेशभूषा में प्रशांत भैया बहुत आत्मविश्वास से भरे, खिले-खिले दिख रहे थे, जैसे उस दिन उनकी ड्राइंग की काॅपी में बने चित्रों में एक लड़का ऐसी ही भिन्न-भिन्न वेशभूषा में नज़र आ रहा था...बिंदास!... बेमिसाल!... जिसने अब अपनी पहचान बना ली थी।

रविवार, 15 सितंबर 2019

गुब्बारा

चूहा इधर से गया कि उधर से। पारिवारिक नोकझोंक के लिए किसी मुद्दे की आवश्यकता होती है क्या? और फिर बात तेरी-मेरी के खाल उधेड़ तक कब पहुँच जाती है पता भी नहीं चलता। आज जब बात हद से गुजरने लगी तो हम झनकते-पटकते घर से निकल आए। अनमने से कॉलोनी के पार्क की ओर चल दिए।

पार्क में प्रवेश करते ही दायीं ओर एक बेंच दिखी। सोचा वहीँ चलकर ग़म गलत करते हैं। बेंच के निकट पहुँचे तो देखा बेंच के नीचे भैरव जी के वाहन विष्णु मुद्रा में शयनागत थे। हमें देखते ही उन्होंने डोंट डिस्टर्ब वाला नाद किया। खतरा भाँप हम फ़ौरन पार्क के वाम ओर पलट गए।

हम अगले किसी सुखासन की खोज में आगे बढ़े तो एक दूसरी बेंच पर महिलामंडल विराजमान था। टहलने वाली पट्टी पर चलते हुए हम उनके सामने से गुजरे।

“सब्जी पका कर आटा लगा दिया है, जब लेडीज़ स्पेशल सीरियल शुरू होता है तब डिनर करते हैं!’’

“हमने तो नेट फ्लिक्स ले लिया है, टीवी पर तो ये ही चिपके रहते हैं...जब देखो न्यूज़ चैनल!’’

सुनते हुए हम आगे बढ़ आए थे। वहाँ हल्का सा अँधेरा था और एक बेंच भी थी। पास पहुँचे तो देखा कि उसके बगल वाली बेंच पर आधुनिक उर्वशी और पुरुरवा आसन जमाए एक-दूसरे को पकौड़े खिला रहे हैं। हम एकांत चाहते थे इसलिए वहाँ बैठने का विचार त्याग आगे बढ़ गए।

“कोई ठरकी है...आँखें सेंकने का इरादा होगा।’’
यह पुरुरवा का उवाच था। उसमें ताल देती उर्वशी की हुहूहू करती पकौड़ा ठुँसी हँसी सुनाई दी।

पार्क का एक चक्कर पूरा हो चुका था। हम दोबारा भैरव महाराज के वाहन के निकट पहुँच चुके थे। अब उनके साथ उनकी प्रियतमा भी विहार कर रही थीं। वे हमें दोबारा वार्निंग देते उससे पहले हम वापस पलट आए। अब हम अपनी बाँहों को हिलाते हुए तेज-तेज चलने लगे ताकि लगे कि हम व्यायाम करने आए हैं।

उर्वशी और पुरुरवा का पकौड़ा कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। मोबाइल पर कोई गीत बज रहा था। वे दोनों एक-दूसरे में खोये से बैठे थे। हम दोबारा महिलाओं वाली बेंच के निकट पहुँचने वाले थे।

“शनिवार की शाम को हम अक्सर बाहर ही खाते हैं।’’ एक महिला ने उद्घाटित किया।

“और हमारे वाले तो कहते हैं कि एक दिन तो आराम कर लेने दो...सन्डे तो कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।’’ लंबी उसाँस छोड़ते हुए दूसरी महिला बोली।

हमें दूसरी वाली की बात ज्यादा जँची। अब हमारे चलने की रफ़्तार बढ़ गई थी। सामने एक बेंच खाली दिखी लेकिन अब हम पूर्ण रूप से घूमने के मूड में आ चुके थे। पार्क के लगभग सात-आठ चक्कर लगाने के बाद हमने अपनी चाल मंद कर दी। चेहरे को छूती मंद-मंद पुरवाई भली लग रही थी। हम पार्क में थोड़ी देर सुस्ताना चाहते थे लेकिन अब मन जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहता था। हम पार्क से बाहर निकलने का उपक्रम करने लगे।

और हाँ, घर से जो गुबार लेकर आए थे वह इस समय गुब्बारा बन कहीं और उड़ चला था। आपको दिखे तो पकड़िएगा मत...!

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

नो ऑप्शन

 "आपने एडमीशन फार्म में बच्चे का धर्म नहीं लिखा?"

"जी, नहीं है।"

"क्यों, आपका कोई धर्म नहीं है क्या?"

"है, बिलकुल है। मैं सिख हूँ, पत्नी ईसाई है।"

"हाँ तो आप इस काॅलम में सिख भरिए!"

"बिलकुल नहीं!"

"क्यों?"

"क्योंकि बच्चे को धर्म के बारे में अभी कुछ पता नहीं।"

"वह बताना तो आपका फ़र्ज है।"

"जी, लेकिन एक समस्या है कि हम केवल दो ही धर्मों के बारे में उसे बता पाएँगे...बाकी के.."

"अरे भाई, बच्चे का तो वही धर्म होता है जो पिता का होता है, ऐसा ही होता आया है।"

"किन्तु मेरे पिता का धर्म सिख नहीं था।"

"ओहहो, तो क्या था?"

"पता नहीं, कभी पूछा नहीं।"

"तो वे अनाथालय से थे क्या?"

"नहीं, उनके माता-पिता पिता थे।"

"अच्छा जी, तो उनका नाम क्या था?"

"अज़रा और अमन!"

"अ बब देखिए आपको इस धर्म वाले काॅलम में कोई तो धर्म भरना ही होगा!"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि यह काॅलम यूँ ही छोड़ दिया जाए?"

"नहीं सर, बिना धर्म के हमारा कम्प्यूटर एडमीशन फार्म एक्सेप्ट ही नहीं करेगा।"

"तो उस काॅलम में 'मानवता' भर दीजिए।"

"लेकिन कंप्यूटर में धर्म के काॅलम में ऐसा कोई ऑप्शन नहीं है।"

"ओह, तब तो ऐसे कम्प्यूटर को बदला जाना चाहिए!"

"सर, यह तो नामुमकिन है!  मतलब ऐसा कहाँ होता है? "

".........?"

रविवार, 8 सितंबर 2019

मोनालिसा

फ़ोटोग्राफ़ी और कहानी लिखना सोनाक्षी का सबसे पसंदीदा शौक था। यह शौक उसकी रोजी-रोटी का सहारा भी था। अक्सर उसकी निगाहें सड़कों पर कुछ तलाशती चलतीं। शायद कोई कहानी। कोई ऐसी कहानी, जो मास्टरपीस बन जाए। मोनालिसा की तरह।

कल भी वह इसी धुन में चली जा रही थी। ओवर ब्रिज के नीचे लगे नल पर कुछ बच्चे नहा रहे थे। उनकी किलकारियों ने सोनाक्षी का ध्यान आकर्षित किया। उसने अपनी एक्टिवा रोक दी। वह उनकी जल क्रीड़ाओं का आनंद लेने लगी। फिर बैग से कैमरा निकालकर वह उस दृश्य को शूट करने लगी।

शूट करते हुए उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के हाथ-पैर झाँवे से रगड़ रही थी। उसके कपड़े पानी से सराबोर थे और बदन पर चिपके जा रहे थे। उसके साँवले चेहरे पर भीगी लटें बहुत मोहक लग रही थीं। वह हाथों से बार-बार उन्हें पीछे कर देती थी। सोनाक्षी ने लेंस का फ़ोकस ज़ूम कर दिया। अब लड़की के हाव-भाव कैमरे में शूट होने लगे।

फ़िल्म शूट करने की धुन में सोनाक्षी उनके निकट पहुँच गई थी। अचानक लड़की की निगाह सोनाक्षी पर पड़ी। वह थोड़ी असहज हो उठी। यह देख सोनाक्षी ने कैमरा हटा लिया।

“मोना दीदी! जल्दी आवो न... !” तभी ओवर ब्रिज के नीचे से किसी बच्‍चे ने पुकार लगाई।

“आ....रहे हैं !’’ लड़की ने जवाब दिया। और बच्चों को साथ लेकर वह ओवर ब्रिज के नीचे बनी झोपड़ियों की ओर चल दी।

थोड़ी देर सोनाक्षी उसे जाता हुआ देखती रही। प‍हले उसने सोचा उसके पीछे जाए, फिर कुछ देर पहले की घटना को याद कर एक अजीब से अपराधबोध से भर उठी।

हौले-हौले वह अपनी एक्टिवा की ओर बढ़ी और वापस चल दी।

सोनाक्षी पूरे समय उस लड़की के बारे में, उसकी असहजता के बारे में ही सोचती रही। रात भी उसने करवट बदलते काटी। जब उसने मन ही मन तय किया कि कल जाकर वह उस लड़की से माफी माँगेगी, तभी उसे नींद आई। आज दोपहर होते-होते वह फिर से ओवर ब्रिज के नीचे थी।

उसने देखा दस-बारह बच्चे ज़मीन पर बैठकर अपनी-अपनी कॉपी में कुछ लिख रहे थे। एक लड़की ओवर ब्रिज के पिलर पर कुछ लिख रही थी। जब वह पलटी तो उसका चेहरा देखकर सोनाक्षी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यह तो वही लड़की है जो बच्चों को नहला रही थी।

“तुम...!”

“हाँ, हम।“ सोनाक्षी की बात पूरी होने से पहले लड़की ने जवाब दिया।

“यह सब...?” सोनाक्षी ने आश्चर्य प्रकट किया।

“हमारे बाबा सब्जी बेचते थे। बीमारी ने उनकी जान ले ली। उस समय हम आठ में पढ़ते थे। हमारी पढ़ाई छूट गई।“

“और माँ?”

“वो भी सब्जी बेचती हैं, लेकिन आजकल बीमार हैं।”

“ओह, तो फिर...?”

“दीदी, हम एक स्कूल में नर्सरी के बच्चों की कॉपी पर होमवर्क देने का काम करते हैं, और...।“

“...और फिर इन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो।”

“न ना...ट्यूशन नहीं, इनको पढ़ना-लिखना सिखाती हूँ बस यूँ ही।’’ कहते हुए लड़की का चेहरा आत्मविश्वास से चमक उठा।

आदतन सोनाक्षी का हाथ अपने कैमरे पर चला गया।

“रुको दीदी..., एक फ़ोटो बच्चों को पढ़ाते हुए।” कहकर वह खिलखिला पड़ी।

सोनाक्षी उसकी फुलझड़ी जैसी खिलखिलाहट को अपने कैमरे में कैद करते हुए बोली, "वाह! मेरी मोनालिसा..."

#विश्व_साक्षरता_दिवस

गुरुवार, 15 अगस्त 2019

फुहारें

मैं सुबह जल्दी-जल्दी स्नान कर राखी बंधवाने के लिए बैठक में आ कर छोटी बहन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। हमेशा राखी बाँधने के बाद उपहार के लिए उसका आँखों को नाच-नचा कर तकरार करना मुझे बड़ा भाता था, इसीलिए मैं हमेशा उपहार छिपा देता था। आज भी उसके मनपसंद उपहार को मेज के नीचे छिपा दिया। जब काफ़ी देर हो गई और वह राखी लेकर नहीं आई तो मैंने उसे आवाज़ दी।

“छोटी !”

“भैया, छोटी तो मझले भैया के यहाँ गई है, राखी बांधने ।” छोटा भाई तैयार होते हुए बोला।

टाई बांधते हुए छोटे की कलाई पर बंधी राखी देख मुझे थोड़ी मायूसी हुई।

“ओह, हमेशा सबसे पहले मुझे राखी बांधती थी ना इसलिए मैने सोचा कि उसे आवाज़ दे दूँ ।” मैंने अपने को संयत करते हुए कहा।

“बेटा, छोटे और मझले को ऑफिस जाना है न।” माँ समझाते हुए बोली।

माँ के ये शब्द सुनकर मुझे थोड़ा आघात सा लगा। मुझे याद आया कि हां सही बात है मुझे कौन सा ऑफिस जाना है। बेरोजगारी का ख्याल आ गया। मैं अपनी सूनी कलाई को देख होठों पर फीकी सी मुस्कान लाते हुए मन ही मन बुदबुदाया

 "कुछ दिन पहले तक मुझे भी ऑफिस जाने की जल्दी रहती थी।"

मैं वापस बैठक में आकर मेज के नीचे छिपाए उपहार को उठाने के लिए झुका ही था कि तभी -

“भैया !” पीछे से छोटी की पुकार ने मुझे चौंका दिया ।

छोटी सामने खड़ी खिलखिला रही थी। मैं हक्का-बक्का मामला समझने की कोशिश करने लगा। वह अपनी गोल-गोल आँखों को नचाते हुए बोली –

“भैया, हमेशा मैं सबसे पहले आपको राखी बांधती थी न, इस बार मैंने सोचा क्यों न उलटा किया जाए। पहले छोटे भैया, फिर मंझले और फिर मेरे प्यारे बड़े भैया।’’

उसी समय माँ, मझले और छोटे भी बैठक में आ गए। छोटा बोला -
“भैया इस छोटी की बच्ची के ड्रामे ने इस बार हम सब को भी चक्कर में डाल दिया। यह मानी ही नहीं।’’

‘’लाओ अब जल्दी से अपनी कलाई आगे करो।’’ छोटी ने अपनी आंखे नचाते हुए कहा।

बैठक में गूंज रहे ठहाकों के बीच मैंने अपनी संकीर्ण सोच को जैसे-तैसे छिपाते हुए छोटी की नाक पकड़ कर जोर से हिला दिया।