शनिवार, 27 जून 2020

नमकीन दिन

वह खाली रिक्शा लिए तिराहे तक जाता फिर वहाँ से वापस लौटता। सिर पर अंगोछा लपेटे। जिसका एक सिरा नाक-मुँह से होता हुआ कान तक जाकर गायब हो गया था। कुछ भी नाम हो सकता है उसका किन्तु चेहरे के नाम पर दो गड्ढे थे जिनमें उभरी आँखें सड़क पर सर्राटे से आती-जाती गाड़ियों को टुकुर-टुकुर ताक रही थीं।

उसके सामने से जाते बैटरीरिक्शे टाई-कोट पहने साहब से प्रतीत हो रहे थे। सड़क पर जो भी सवारियाँ आती थीं सरसराती हुई साँप की भांति उसमें घुस जाती थीं, मानो बैटरीरिक्शा न हो कोई बिल हो।

रिज़वान उनको निरीह सा देखता रह जाता। हाँ, ‘रिज़वान’ रिक्शे के पीछे यही नाम पेंट था।
रिक्शे और उसमें यह तुलना करना कठिन था कि दोनों में से कौन अधिक पुराना है।

एक युवती वहाँ अवतरित हुई। उसका चेहरा भी काले चश्मे और दुपट्टे से चाकचौबंद था। उसकी गर्दन का इधर-उधर हिलना बता रहा था कि वह कुछ तलाश रही है।

“बिटिया किधर जाएँगी?” रिज़वान ने अंगोछा मुँह से सरकाते हुए पूछा।

“दादा मुझे ईरिक्शा से जाना है।“ दुपट्टे के बंधन से युवती का मुख हिला।

रिज़वान रिक्शा लेकर निकट आ गया। उसने रिक्शे के पीछे खोंसी एक बोतल को खोलकर पानीनुमा द्रव एक कपड़े पर उलीच लिया और शीघ्रता से रिक्शे की गद्दी पोछने लगा।

“बिटिया हमने सब सनेट कर दिया है देखिए।“

“सेनेटाइज़!” युवती ने सुधारा।

“हाँ हाँ बिटिया जी वही।“

“लेकिन ये तो सेनेटाइज़र नहीं लग रहा है?”

“बिटिया, हम पूछे रहे मेडिकल में, सौ रुपिया का रहा, उधार देवै के तइयार नहीं हुए।“

“तो ये पानी है?”

“हह हाँ बिटिया पानी तो है लेकिन हम नमक डाले हैं इसमें। हमरी नतिनी कहीं सुन के आई थीं, वही बताईं कि पानी में नमक डालने से सब सनेट हो जाता है।“

“अरे दादा, सेनेटाइज़ बोलिए!”

“हाँ बिटिया जी वही, सब कर दिया है, आइए बैठिए।“

“लेकिन दादा, इससे सेनेटाइज़ नहीं होता है।“

“अ अ बिटिया जी...” रिज़वान की थकी आवाज़ घिघियाने सी लगी।

उसी क्षण चील की भांति एक बैटरीरिक्शा युवती के निकट आया।
बैटरीरिक्शेवाले ने रिक्शे की गद्दी और आजू-बाजू पर फर्र-फर्र स्प्रे की फुहार की। युवती ने पर्स से एक शीशी निकाली। उसमें से द्रव की बूँदें हथेलियों पर गिराईं। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए बैटरीरिक्शे में समा गई।

रिज़वान अपने हाथ में पकड़ी बोतल में झाँक रहा था। मानो वह अपने चेहरे के गोलों से टपकने वाली बूँदों से उसे भर रहा हो।