शनिवार, 26 दिसंबर 2015

'गुड मॉर्निंग' : लघुकथा

कोई भी मौसम हो, भोर के ठीक 5:00 बजे नहीं कि रमानाथ जी के योगासन की चटाई पार्क में बिछ जाती। मजाल है जो कभी घड़ी की सुई एक सेंकेड भी आगे गई हो। फिर पूरे घंटे भर तक उनका योग कार्यक्रम चलता। उसके बाद वे पार्क के कोने में बनी बेंचों पर विराजमान हमउम्र साथियों के साथ पंद्रह मिनट हाहा-हुहू करते। और फिर खरामां-खरामां घर की ओर रवाना हो जाते थे।

कॉलोनी में दो रमानाथ थे और दोनों के उपनाम भी एक ही थे। इसीलिए इन महाशय को सब ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ कहकर पुकारने लगे। समय ने अपने कदम आगे बढ़ाए ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ सेवानिवृत हो गए। लगभग दो-तीन साल तक उनकी पाँच बजे की योगासन वाली प्रक्रिया निर्बाध चली, फिर धीरे-धीरे उनका पार्क में आना कम होता गया। और इधर तो वे साल भर से पार्क में दिखाई ही नहीं दिए।

आज सुबह-सुबह उनके घर से आवाज़ सुनाई दी, “माघ उतरने को है, और एक आप हैं कि अभी भी रजाई में पड़े हुए हैं।“ पत्नी ने ताना कसा।

“तो अब एक रिटायर्ड आदमी इस उम्र में और क्या करे, क्या रंगबिरंगी शर्ट पहन सड़कों पर सीटी बजाए?“ रमानाथ जी ने भी पलटवार किया।

“अरे, तो पहले की तरह कम से कम थोड़ी देर पार्क में ही चले जाया करो, शरीर को थोड़ी हरकत तो मिल जाएगी।“ पत्नी ने कहा।

“नहीं-नहीं...बहुत ठण्ड है !” रमानाथ जी ने रजाई में दुबकते हुए जवाब दिया।
“तो गर्मी में ही कौन-सा जा रहे थे।“ पत्नी ने उलाहना दिया।

हारकर रमानाथ जी मुर्दनी आवाज़ में बोले, “अच्छा...तुम कहती हो तो चले जाते हैं, लाओ छड़ी, टोपी, मफ़लर दो।’’ इस तरह आज रमानाथ जी स्वेटर के ऊपर लम्बा कोट डाले, हाथों में दस्ताने, सिर पर मंकी कैप, उसके ऊपर मफ़लर लपेटे, पैरों में ऊनी ज़ुराबें चढ़ाए, छड़ी ठुक-ठुकाते हुए पार्क के लिए रवाना हुए।

अच्छी धूप खिली थी। सर्दी भी कुछ ख़ास नहीं थी। रविवार होने से पार्क में चहल-पहल भी कुछ अधिक थी। रमानाथ जी एक बेंच पर जा बैठे। उनकी नजरें पार्क के चारो कोनों को टटोलती हुई सामने खेल रहे बच्चों पर टिक गईं।

थोड़ी देर बाद एक युवती जॉगिंग करते हुए आई और उनकी बगल वाली बेंच पर बैठ गई। रमानाथ जी ने कनखियों से उसे देखा। युवती ने अपने जूते-मोज़े उतारकर किनारे रख दिए और बेंच पर पाँव मोड़कर ध्यान की मुद्रा में बैठ गई। थोड़ी देर बाद रमानाथ जी की नज़र उस पर फिर पड़ी तो उन्होंने भी अपने जूते उतार दिए और पाँव मोड़कर बैठ गए।

लगभग दस मिनट ध्यान करने के बाद युवती ने अपनी आँखें खोलीं। अपने पैरों को सीधा कर पंजे हिलाते हुए उसने रमानाथ जी की ओर देखा। उन्होंने भी दस्तानें और ऊनी ज़ुराबें उतार दीं और पैरों को सीधाकर पंजों को हिलाने लगे। अब युवती अपना जैकेट उतारकर अपनी दोनों बाहें सामने करके कलाई घुमा रही थी। उसने रमानाथ जी को देखा और मुस्कुरा दी।

धूप तेज होने लगी थी। उन्होंने अपने मफ़लर को सिर से उतारकर गर्दन में लपेट लिया। उनकी नजर उस युवती की तरफ गई। वह उनकी ओर देखते हुए अब भी मुस्कुरा रही थी। यह देख रमानाथ जी भी थोड़ा मुस्कुरा दिए। उसने रमानाथ जी के सिर की ओर इशारा कर टोपी उतारने को कहा। रमानाथ जी पहले तो अचकचाए फिर उन्होंने टोपी उतार दी, लेकिन मफ़लर को सिर से कान तक लपेट लिया। युवती ने मुँह बनाते हुए मफ़लर भी उतारने के लिए इशारा किया। रमानाथ जी ने जैसे उसके इशारे को अनदेखा करते हुए अपनी गर्दन दूसरी ओर फेर ली। फिर न जाने क्या सोच उन्होंने मफ़लर उतारा और कनखियों से युवती की ओर देखा। युवती ने अपने अंगूठे और तर्जनी को मिलाते हुए गोला बनाकर इशारा किया और एक आँख दबाते हुए मुस्कुरा दी। रमानाथ जी पहले तो कुछ असहज हुए लेकिन फिर जोर से हो-हो कर हँस दिए।

युवती उठी, अपना जैकेट कंधे पर डाला और उनके निकट आकर बोली, “खुल्ली हवा और हँसी हेल्थ विच गुड होंदीये, होर आप तो इन्ने हेण्डसम हो, बुड्ढों जैसे कपड़े क्यों पेने ओ?” युवती ने उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और खिलखिलाती हुई पार्क से निकल गई।

रमानाथ जी उसे जाता देखते रहे, जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गई। फिर वे झटके से खड़े हुए, छड़ी एक ओर फेंकी, कोट उतारकर बेंच पर रखा और पार्क में टहलने लगे। धीरे-धीरे उनकी गति बढ़ने लगी।
तभी बच्चों का समवेत स्वर गूँजा, “गुड मॉर्निंग अंकल !” रमानाथ जी हाथ हिलाते हुए तेज़ी से उस ओर बढ़ गए।
अब पिछले कुछ दिनों से बच्चों द्वारा दिया गया उनका नया नाम ‘गुड मॉर्निंग अंकल’ भी पहले वाले नाम की तरह ही लोकप्रिय हो गया है।

चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 13 दिसंबर 2015

चीयरअप : लघुकथा

हर शाम स्कूटर पर ऑफ़िस से घर लौटती अदिति के होठों पर कोई मधुर गीत होता। आँखें फ़्लाईओवर से नज़र आती दूर तक फैली बसाहट और आसमान के मिलन के अद्भुत नज़ारे के आनंद में डूबी होतीं। कभी कोई अनोखा दृश्य देख वह एक पल के लिए ठिठक जाती। फिर उससे मिलने वाली आनंदानुभूति अपने जेहन में भरकर जैसे दिन भर के तनाव से मुक्त हो जाती।

आज भी वह ऐसे ही आनंद के आगोश में थी कि एक साइकिल सवार उसे पीछे छोड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गया। अक्सर जब भी कोई स्कूटर या मोटरसाइकिल अदिति को पीछे छोड़ते हुए आगे निकलती है तो वह अपने स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर उसे पीछे छोड़ देती है। पर आज न जाने क्यों उसने स्कूटर आगे न बढ़ाकर उस साइकिल सवार के पीछे लगा दिया। साइकिल सवार ने जैकेट पहन रखी थी। जैकेट के हुड से उसका सिर ढका था। उसके चौड़े कंधे साइकिल पर पैडल मारने की जद्दोजहद में हलके से दाएँ-बाएँ झुककर अपना आकर्षण और बढ़ा रहे थे। कुछ देर बाद जब फ़्लाईओवर की सीधी चढ़ाई शुरू हुई तो अदिति स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर आगे निकल गई। साइकिल सवार स्कूटर के साइड मिरर में नज़र आ रहा था। अदिति स्कूटर की रफ्तार धीमी कर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगी।

उसने देखा साइकिल सवार साइकिल रोककर फ़्लाईओवर के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत से साइकिल के पीछे इशारा करते हुए कुछ कह रहा है। बूढ़ी औरत के साथ एक सात-आठ साल का बच्चा और एक बड़ा झोला भी था। कुछ क्षणों बाद उसने देखा बूढ़ी औरत साइकिल के पीछे बैठ गई। उसने झोले को साइकिल के हेंडल में फँसा दिया। बच्चे को आगे के डंडे पर बिठाया और खुद पैदल साइकिल खींचते हुए फ़्लाईओवर चढ़ने लगा। अदिति ने स्कूटर रोक दिया।

ऑफ़िस आते-जाते रास्ते में बस या ऑटोरिक्शा की प्रतीक्षा में खड़े लोगों को उनके गंतव्‍य तक छोड़ना तो अदिति की आदत में शुमार है। कई बार तो वह बस के इंतज़ार में खड़े स्कूल के बच्चों को उनके स्कूल तक छोड़ने चली जाती है। ऐसे में उसको ऑफ़िस के लिए देर भी हो जाया करती है। पर आज न जाने कैसे वह इस बूढ़ी औरत को देखने से चूक गई। असल में उसका सारा ध्यान साइकिल सवार पर था। शायद इसीलिए उसने उस बूढ़ी औरत को नहीं देखा। बहरहाल अब बड़ी बेताबी से वह साइकिल सवार और उस बूढ़ी औरत की प्रतीक्षा कर रही थी।

उसने पलटकर देखा। वह निकट आ गया था। अदिति साइकिल सवार को देखकर अवाक़ रह गई। वह उसकी कल्पना के विपरीत कोई साठ-पैंसठ साल का एक बुज़ुर्ग था। अदिति अपलक उसे देखे जा रही थी। साइकिल खींचने से उसका चेहरा लाल हो आया था। ढलते सूरज की किरणों में उसके माथे पर उभरी पसीने की बूँदें सुनहरे मोतियों सी चमक रहीं थीं। उसने अपना सिर बाईं ओर घुमाकर अदिति की ओर देखा। अदिति ने अपना हेलमेट उतार दिया और बरबस उसका दायाँ हाथ सलाम की मुद्रा में उठ गया। फिर वह अँगूठे से चीयरअप करती हुई मुस्करा दी। साइकिल सवार भी चीयरअप करता मुस्करा दिया।

अदिति उससे कुछ कहती इसके पहले ही वह सावधानी से साइकिल पर चढ़ा और पैडल मारते हुए फ़्लाईओवर की ढलान पर उतर गया। मदद करने का ख्‍़याल अदिति के मन में ही रह गया। वह रोमांचित लेकिन ठगी-सी उसे देखे जा रही थी। साइकिल सवार को छूकर आ रहे शीतल हवा के झोंके अदिति को एक अजीब-सा सुकून दे रहे थे।

चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 29 नवंबर 2015

सज़ा : लघुकथा

घंटी बजे लगभग दस मिनट बीत चुके थे। मैडम सीमा के कक्षा में न पहुँचने पर कक्षा मॉनीटर ने स्टाफ़रूम में झाँक कर देखा तो वह अपने मोबाइल में व्‍यस्त थीं।

“मैम, चलिए, सब बहुत शोर कर रहे हैं।“ मैडम सीमा बिना कुछ जवाब दिए मोबाइल पर उंगलियाँ फेरे जा रहीं थीं।

“मैम.....” मैडम का कोई जवाब न पाकर वह फिर बोला।

“उफ़ ! इस स्कूल में तो ज़रा सा भी चैन नहीं।“ तन्द्रा भंग होने पर वह भुनभुनाते हुए कक्षा की ओर चल पड़ीं।

मैडम को कक्षा में प्रवेश करते देख बच्चे फटाफट अपने-अपने स्थान पर हो लिए। उन सबने एक सुर में उनका अभिवादन किया। उन्‍होंने अभिवादन के बदले में सबको खड़े रहने को कहा।

कक्षा अभी शुरू ही हुई थी कि स्कूल का चपरासी एक नोटिस लेकर आ गया। सभी बच्चों की नोटबुक प्रिंसीपल ऑफिस में मँगवाई गईं थीं। मैडम सीमा ने तुरंत सभी बच्चों को उनकी नोटबुक जमा करने का आदेश दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी नोटबुक मेज पर लाकर जमा कर दीं। मैडम नामों की सूची से नोटबुक को मिलाने लगीं।

आयुष की नोटबुक न पाकर उन्‍होंने पूछा, “आयुष ! तुम्हारी कॉपी कहाँ है ?”

“मैम, मेरी कॉपी मानस ले गया है।”

“अच्‍छा ! मानस तो कई दिनों से स्कूल नहीं आया, कब ले गया तुम्हारी कॉपी ?” मैडम सीमा ने सख़्त आवाज़ में पूछा।

“मैम, उस दिन जब मैंने सबसे पहले काम कर लिया था तो आपने कहा था कि मैं अपनी कॉपी मानस को काम पूरा करने के लिए दे दूँ।” आयुष ने सफ़ाई दी।

“नो, ये तुम्हारा काम पूरा न करने का बहाना है, बस।”

यह सुनकर आयुष की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, फिर भी डरते-डरते उसने याद दिलाया, “वो...वो...मैम, उस दिन जब मैं स्टाफ़रूम में आया था न, तब आपने देने को कहा था।”

“चुप ! एक तो कामचोरी, ऊपर से झूठ !” मैडम की बात सुनकर आयुष सहम गया।

मध्यान्ह अवकाश की घंटी बज गई। मैडम सीमा उसे भोजन न करने की सज़ा दे स्वयं स्टाफ़रूम में आ गईं। आयुष पूरे मध्यान्ह अवकाश भर कक्षा के एक कोने में खड़ा रहा।

अवकाश के बाद दूसरी कक्षा शुरू हो गई। आयुष बिना भोजन किए चुपचाप अपनी जगह बैठ गया।

मैडम सीमा अपनी अगली कक्षा के लिए निकल ही रही थीं कि साथी अध्‍यापिका ने उन्‍हें एक नोटबुक देते हुए कहा कि ये किसी बच्चे के अभिभावक ने भिजवाई है। नोटबुक देखकर वह सकते में आ गईं। उस पर आयुष का नाम लिखा था। वह नोटबुक लेकर आयुष की कक्षा की ओर भागीं।

कक्षा चल रही थी। उन्‍होंने देखा, आयुष आँखों में आँसू लिए अपनी सीट पर बैठा था। मैडम सीमा की आँखें भी भर आईं। वे उसको नोटबुक दिखाते हुए बोलीं, “आयुष तुम सच कह रहे थे कि तुमने अपनी कॉपी मानस को दी है, लेकिन मैम ने तुम्हारी बात नहीं सुनी, मैम बहुत गन्दी हैं न।“ यह कहते-कहते उन्‍होंने झुककर आयुष को गले लगा लिया।

आयुष ना में सिर हिलाते हुए सीमा से लिपट गया। उधर कक्षा ले रहीं दूसरी अध्‍यापिका यह सब देखकर हतप्रभ थीं, लेकिन बच्‍चे तालियाँ बजा रहे थे।
चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

विस्‍फोट : लघुकथा

आज काव्या मिलने आने वाली थी। मैं घर के बाहर बरामदे में विचारों के उधेड़-बुन में फंसी चहलकदमी करते हुए न जाने कब अतीत में चली गई।

कई दिनों से मैं देख रही थी कि समीर हम सब से कटा-कटा सा रहता है। बार-बार पूछने पर उसने एक दिन शरमाते हुए काव्या से अपने लगाव के बारे में बताया था। वह उससे विवाह करना चाहता था। यह खबर हमारे लिए आश्‍चर्य मिश्रित खुशी लेकर आई थी। क्योंकि अब तक तो विवाह के नाम से दूर भागता रहा था वह । रिश्‍ते आते थे, पर वो बिना बात किए ही मना कर देता था। लेकिन यकायक उसके इस विस्फोट ने जैसे सूखे चूने पर पानी डाल दिया था। हमें कोई आपत्ति नहीं थी। बस काव्या के बारे में जानकर हम सब असमंजस में आ गए थे। कहाँ हमारा ग्रामीण परिवेश का मध्यम वर्गीय परिवार और कहाँ वह दिल्ली जैसी महानगरीय संस्कृति के वातावरण में पली-बढ़ी, उच्च व्यावसायिक वर्गीय घराने की कन्या।

“क्या ऐसे परिवार की लड़की हमारे परिवार के साथ सामंजस्य बिठा पाएगी?“ मैंने समीर से चिंता जताते हुए पूछा था।

“दीदी हम बंगलौर जा रहे हैं।“ समीर ने दूसरा विस्‍फोट किया था।

“बंगलौर क्‍यों ?“ मैं अवाक थी।

“हम दोनों ने जॉब के लिए अप्लाई किया था, वहां से बुलावा आ गया है।“ यह सूचना खुशी वाली थी, पर थोड़ी उदास करने वाली भी।

“ओह, तो बात यहाँ तक पहुँच गई है?” मैंने ताना देते हुए पूछा तो वह बिना कुछ जवाब दिए बाहर चला गया था।

उस दिन हम सभी भाई-बहन गाँव जा रहे थे। समीर कार चला रहा था। बीच-बीच में काव्या का फ़ोन आ रहा था। हमने समीर से कहा कि वह काव्या से गाँव पहुँच कर बात करले, अभी कार चलाने पर ध्‍यान दे। किन्तु उसने बात अनसुनी कर दी। अब तो ऐसा लगने लगा था जैसे काव्या हम भाई-बहनों के बीच दूरी बढ़ाती जा रही थी। फिर भी समीर की ख़ुशी हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण थी।

हमने काव्या को घर बुलाने की योजना बनाई। औपचारिकता वश ही सही लेकिन इसके पीछे एक कारण यह भी था कि वह भी हमारे घर-परिवार, रहन-सहन को देख-भाल ले। हमारी माँ थीं नहीं और अभी पिता जी को इस बारे में बताना उचित नहीं लग रहा था, इसलिए जो करना था हम बहनों को ही करना था।

कार के हार्न ने मुझे वर्तमान में लौटा लिया। मैंने गेट से झाँक कर देखा तो समीर और काव्या कार से उतर रहे थे। काव्या ने साड़ी पहन रखी थी। बाल लम्बे और खुले हुए थे। चेहरे पर हल्का मेकअप था। मैंने बढ़कर गेट खोल दिया। सामने आकर वह थोड़ा झिझकी फिर मुस्कुराते हुए वह मेरे गले लग गई। उसने अपनी बाँहों में मुझे भींच लिया, फिर अलग होते हुए कहा, ‘आप लोगों से मिलने का बड़ा मन था।’

मैं उसे बैठक में ले गई। बाकी बहनों से भी वह उसी गर्मजोशी से गले मिली। काफ़ी देर तक हम बातें करते रहे। उस दौरान मैंने ये महसूस किया कि हमने काव्या को लेकर जो छवि बनाई थी वह सही नहीं थी। काव्‍या अपनी बातों और व्यवहार से बड़ी सहज लगी।

हम भोजन करने बैठे तो काव्या का लाया हुआ भोजन भी साथ में परोसा। उसकी बनाई सब्‍जी के साथ पहला कौर खाते ही सबके मुँह से एक साथ निकला, “अरे इसमें तो एकदम माँ के हाथों बनी सब्‍जी का स्‍वाद है।”

“ये तुमने बनाई है काव्या !” मैंने आश्चर्य से पूछा, तो उसने शरमाते हुए हौले से हामी भरी।

“हम्म, तो समीर बंगलौर में तुम्‍हारे मजे रहेंगे।” खाते हुए मैंने चुटकी ली।

“ऐसी हमारी कि़स्‍मत कहाँ! ” समीर आह भरते हुए बोला।

“क्‍यों, क्‍या हुआ? ” हम सब बहनें एक साथ बोलीं। हमारी आवाज में घबराहट भी थी।

“नहीं दीदी, घबराइए मत। असल में हमें आप लोगों का साथ और स्‍नेह भी चाहिए। इसलिए.... बंगलौर जाना कैन्सिल।” कहा तो यह काव्‍या ने था, पर समीर हम सबको तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्‍करा रहा था।

यह तीसरा विस्‍फोट था, पर इस बार ख़ालिस ख़ुशी का। फिर तो हर बीतते दिन के साथ काव्या हम सबके दिलों में उतरती चली गई। और हाँ इसमें अब पिता जी भी शामिल थे।




(चित्र गूगल से साभार )

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

दीये : लघुकथा

करीम फुटपाथ के किनारे अपने दीये सजाए, ग्राहकों की आस में हर आने-जाने वालों को टुकर-टुकर देखे जा रहा था। कोई ग्राहक उसकी ओर आता दिखता तो उसकी आँखों में थोड़ी चमक आ जाती थी लेकिन अगले ही पल वह गायब भी हो जाती। ग्राहक चीनी बल्बों, झालरों से सजी गुमटियों की ओर बढ़ जाते थे। एक गुमटी उसके साथी रघु के बेटे सूरज की भी थी। रघु भी उसके साथ मिट्टी के दीये बनाता था।

‘यदि ये दीये, सचमुच न बिके तो?’ मन ही मन सोचते हुए करीम को सूरज की कही बात याद आ गई। वह अतीत में खो गया।
**
“चचा, अब ई बिजिनस पुरान होइ गवा, तबही हम दुई साल पहिलहीं चैनीज झालर के बिजिनस कर लिए रहेन।’’

“मती मारी गई है तुमरी ? ’’ करीम चाक ठीक करते हुए बोला।

“चचा, तुम तो फिर भी झण्डी, ताजिया, कंदील बनावो, उ बिजिनस में कम से कम पइसा तो है, ई माटी के काम में सरीर माटी होई जाएगी लेकिन पइसा...।’’ सूरज ने ठेंगा दिखाते हुए कहा।

“बचवा, अब हम तो ई पुरखन के काम न छोड़ब। पइसा न सही हमरे दीयन से देवारी मा लोगन के घर रोसनी तो होत है।’’ यह कहते हुए करीम पोखर से मिट्टी लाने के लिए चल पड़ा।

पोखर से लोडर ट्रकों में मिट्टी भर रहे थे। ठेकेदार उनको निर्देश दे रहा था। करीम कुछ देर तक देखता रहा, फिर हिम्मत करके ठेकेदार के पास जा पहुँचा।

“बाऊ !” करीम थोड़ा झिझकते हुए बोला ।

“क्या है !” ठेकेदार ने बिना उसकी ओर देखे लापरवाही से पूछा।

“बाऊ, हमका थोड़ी माटी चाहत रहा।” करीम ने याचना की।

“मिट्टी नहीं है यहाँ ।” ठेकेदार पान मसाला मुँह में डालते हुए बोला।

“बाऊ, दिवारी आवे वाली है, थोड़ी माटी मिल जात तो...” उसकी बात पूरी होने से पहले ही ठेकेदार बिफर पड़ा।

“तुमको पता है कि मिट्टी कितनी महँगी हो गई है? मिट्टी चाहिए, हुंह ।”

“बाऊ, हमसे इ पोखर के मालिक गमला के बदले में माटी देत रहेन।”

“इस पोखर के मालिक? ये पोखर तो सरकारी है।” ठेकेदार जोर से हँसा।

करीम को कुछ समझ नहीं आया, वह थोड़ा सिटपिटाया, फिर बोला, “आपहू लय लेना गमला और दीया, उ सामने हमार झोपड़ा है।”

“हमें नहीं चाहिए दीया-फिया, भागो यहाँ से।” ठेकेदार ने झिड़की दी।

“बाऊ, एक ठेलिया माटी कत्ते की पड़ेगी?” थोड़ी देर बाद करीम ने एक बार फिर हिम्मत जुटाते हुए पूछा।

ठेकेदार ने दाँतों के बीच से पीक निकाली और मसाला चबाते हुए उसको ऊपर से नीचे तक देखा, फिर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए बोला, “हज़ार की।”

करीम के होश उड़ गए। उसकी गाँठ में कुल पाँच सौ रुपये थे। लकड़ीवाले का कर्जा पहले ही चढ़ा था और अभी इन दीयों को पकाने के लिए भी लकड़ियाँ चाहिए थीं। क्या करे, क्या न करे थोड़ी देर इसी उहापोह में पड़ा रहा, गाँठ से रुपये निकालते हुए वह ठेकेदार के आगे गिड़गिड़ाया, “बाऊ, कुल जमा पूँजी पाँच सौ है हमरे पास, एतने की माटी दय दो हमका।”

ठेकेदार ने किच्च से पीक थूकी, करीम से रूपये लेकर मिट्टी की ओर इशारा किया। “चलो जल्दी से लादो, और सुनो, दर्जन भर गमले तैयार करके रखना।” ठेकेदार ने चेताया।

“ठीक बा बाऊ ।” करीम का चेहरा खिल उठा, उसको ऐसा लगा जैसे दौलत मिल गई हो। वह जल्दी-जल्दी ढेर से मिट्टी उठाकर ठेलिया में डालने लगा।
**
“मम्मा, दीये नहीं लोगी?” इस आवाज़ से करीम की तन्द्रा टूटी। उसने देखा एक छोटी सी बच्ची हाथों में दिए पकड़े बैठी है।

“बेटा, हमने चाइनीज़ झालर ले ली है।”

“लेकिन मम्मा, दीवाली में तो दीये जलाते हैं न ?” उसने हाथ में पकड़े दीयों को हसरत से देखते हुए पूछा।

“हाँ बेटा, लेकिन दीयों के तेल से दीवारें खराब हो जाती हैं, चलो छोड़ो इन्हें।” माँ ने बच्ची के हाथ से दीए छीनकर रख दिये और उसको चलने के लिए खींचा।

“नहीं मम्मा, मुझे तो दीये ही चाहिए।” बच्ची रूआँसी हो उठी थी और जमकर वहीं बैठ गई।

“चलो बाबा, दे दो बीस दीये।“ माँ हारकर बोली। करीम ने बीस दीयों के साथ एक बड़ा लाल दीया अलग से देते हुए कहा, “ई हमरी तरफ़ से बिटिया को देवारी का उपहार... ।” बच्ची दीया लेकर चहकने लगी।

“पापा, मुझे भी दीये चाहिए, मेरी मैम ने कहा था कि दीवाली में दीये जलाए जाते हैं।” तभी पास खड़े एक और बच्चे की आवाज़ आई।

फिर तो धीरे-धीरे करीम के दीयों के लिए लोगों की आमद होती गई। दीये अब करीम की आँखों में भी जल उठे थे।

(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

‘छवि’ :लघुकथा

सोनाली ने कंपार्टमेंट के अंदर प्रवेश किया। चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए वह खिड़की के पास वाली अपनी सीट पर जा बैठी। उसी सीट पर दो और महिलाएँ बैठी थीं। उनकी उम्र साठ-पैंसठ के आसपास रही होगी। वे पैर ऊपर मोड़े बैठी बातें कर रही थीं। उनमें से एक रह-रहकर अपने दोनों घुटनों को दबा रही थी। उनकी बातचीत और वेशभूषा आदि से लग रहा था कि शायद वे किसी तीर्थ यात्रा पर जा रही हैं। एक गहरी साँस लेते हुए उसने पानी की बोतल को मुँह से लगाया एक-दो घूँट गटकने के बाद खिड़की से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने लगी । थोड़ी देर बाद वे दोनों हाथ में एक पुस्तिका लेकर कोई मंत्र आदि बुदबुदाने लगीं।

सोनाली ने बुरा सा मुँह बनाया और मन ही मन सोचने लगी, “उफ़ ! अब रात भर इनकी बड़बड़ झेलनी होगी।” उसने ऑंखें बंदकर खिड़की पर सिर टिका दिया। बाहर की ठंडी हवा और थकान से सोनाली की झपकी लग गई। अचानक खटके से उसकी नींद खुली तो देखा सामने की सीट वाले यात्री सोने की तैयारी कर रहे हैं। उसको जागा हुआ देख उसकी सीट पर बाजू में बैठी एक महिला उसकी ओर मुख़ातिब हुई, “बेटा, ऊपर वाली बर्थ मेरी है, मेरे घुटने में गठिया है, यदि आपको कोई दिक्क़त न हो तो ये नीचे वाली अपनी बर्थ मुझे दे दो।“

सोनाली मन ही मन झुंझलाई। फिर उनकी अवस्था देख बिना कोई जवाब दिए वह मान गई। ‘इन सठियाई औरतों को कुछ काम-धाम तो होता नहीं, जि़ंदगी भर पति की कमाई पर ऐश किया होगा और अब तीर्थयात्रा के बहाने सैर-सपाटा, हुंह ! घुटने में तकलीफ है तो घर में बैठकर पोता-पोती संभालें।’ सोनाली मन ही मन बड़बड़ाई। वह चढ़कर ऊपर की बर्थ पर चली गई। दोनों महिलाएँ भी सोने की तैयारी करने लगीं।

तभी उसे याद आया कि उसका लेपटॉप बैग तो नीचे ही रह गया है।

“माँ जी, मेरा बैग नीचे रह गया है ज़रा पकड़ाना।” वह नीचे झाँकते हुए बोली। उस महिला ने जैसे ही उसका बैग उठाया, वह थोड़ा तेज़ आवाज़ में बोली, “अरे, उसमें लैपटॉप है, कोई पोथी-पत्रा नहीं, ज़रा संभाल कर उठाइये।” महिला ने मुस्कुराते हुए उसका बैग पकड़ा दिया।

सुबह हो गई थी। दोनों महिलाएँ नीचे वाली सीट पर बैठी बतिया रही थीं। सोनाली भी नीचे उतर आई। बैग से तौलिया आदि लेकर मुंह धोने चली गई। वापस आकर बैग से आइना निकालकर मेकप करने लगी। गठिया वाली महिला उसे देखकर मुस्कुराते हुए बोली, “शुक्रिया, बेटा।”

बदले में न चाहते हुए भी वह मुस्कुरा दी। वह महिला बोली, “बेटा, आप कहाँ जा रही हो?”

“यूनिवर्सिटी में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हूँ, एक सेमीनार में जा रही हूँ।” सोनाली व्यंगात्मक अंदाज़ में ठसक भरी आवाज़ में बोली। जैसे उन महिलाओं को जताना चाह रही हो कि वह उनकी तरह फालतू में सैर नहीं कर रही है। वह महिला फिर मुस्कुरा दी।

“आप लोग तो शायद किसी तीर्थयात्रा पर जा रही हैं न ?” सोनाली से रहा नहीं गया। उसने आखिर पूछ ही लिया। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखने लगीं।

फिर गठिये वाली महिला बोली, “हाँ बेटा, ऐसा ही समझ लो।”

सोनाली उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगी, जैसे कह रही हो, ’समझ लो का क्‍या मतलब!’ तभी दूसरी महिला ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, “दरअसल मैं अपनी पोती के दीक्षांत समारोह में जा रही हूँ, और ये मेरी सखी उसी समारोह में मुख्य अतिथि हैं। ये वहाँ की भूतपूर्व कुलपति हैं।”

सोनाली ने चौंककर कुछ इस तरह उनको देखा जैसे पहली बार देख रही हो।

शनिवार, 26 सितंबर 2015

'बौरा' :लघुकथा

बौरा, हां इसी नाम से तो पुकारते थे सब उसे वह एक कंधे पर पुरानी शाल डाले और दूसरे कंधे पर झोला लटकाए ऑटो स्टैंड के किनारे बने चबूतरे पर हमेशा बैठा दिखता था। वहां बैठे-बैठे वह हर आने-जाने वाले का मुस्कुराकर अंग्रेजी में अभिवादन करता। वह कौन है ? क्या करता है ? कहां रहता है ? इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था। न ही कोई जानता था। लेकिन जब वह नहीं दिखता तो लोगों की नजरें उसे खोजती थीं।

दोपहर में जब सवारियों का आना-जाना कम हो जाता तो बौरा, ऑटो वालों और आसपास की गुमटी वालों के मनोरंजन और समय बिताने का साधन बन जाता। मौसम चाहे जो भी हो, लेकिन उसके कंधे से शाल कभी नहीं हटती थी। अक्सर दोपहर में जब वह बैठे-बैठे ऊंघने लगता तो कोई ऑटो वाला धीरे से आकर उसकी शाल खींचकर भाग जाता और बौरा उसको लेने के लिए बदहवास, परेशान सा उसके पीछे-पीछे भागने लगता। उस शाल को वापस पाने के लिए वह उन सबकी हर ऊल-जलूल फरमाइश पूरी करता। वे उससे जैसा करने को कहते वह वैसा ही करता। उसकी यह स्थिति देख लोग तालियां पीट, हंस-हंसकर लोट-पोट हो जाते। अंत में शाल पा लेने पर वह फिर से उसी चबूतरे पर विराजमान हो ऐसे मुस्कराने लगता जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आज सुबह से बौरा पता नहीं कहां चला गया था। दोपहर भी बीतने लगी थी, लेकिन आज लोगों की नज़रें उसको नहीं खोज रहीं थीं। आज उस चबूतरे पर कहीं से एक औरत आकर लेट गई थी। उसके तन पर लिपटे मैले कपड़े में कपड़ा कम छोटे-बड़े झरोखे ज्यादा दिखाई दे रहे थे। ये झरोखे आज सड़क पर हर आने-जाने वालों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वहां से गुजरते लोगों की नजरें उन झरोखों में अटक-अटक जा रही थीं। कुछ नजरें ऐसी भी थीं जो चुपके से उधर जातीं और फिर अनदेखा कर ऐसे आगे बढ़ जातीं जैसे कि कुछ देखा ही न हो। कुछ हिकारत भरीं कोसतीं, बड़बड़ातीं हुई आगे बढ़ जातीं। लेकिन कई नजरें तो चबूतरे के चारों ओर परिक्रमा लगाती हुईं उसे हर कोण से देख लेने के भरसक प्रयास में लगी थीं। जैसे दुनिया का आठवां अजूबा यहीं अवतरित हो गया हो।

तभी अचानक न जाने कहां से बौरा प्रकट हुआ। जब वह चबूतरे की ओर बढ़ने लगा तो पीछे से सीटी बजने और तालियां पीटकर हंसने की आवाजें आने लगीं। लेकिन वह चबूतरे के पास दो पल के लिए ठिठका और फिर आगे बढ़ गया।

उस औरत के तन पर लिपटे कपड़ेनुमा झरोंखों को बौरा ने अपनी शाल के पट से बंद कर दिया था। आज पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कुराहट के बजाय गंभीरता दिख रही थी और आसपास के तमाम हंसने वाले चेहरे जैसे खुद पर शर्मिन्‍दा थे।
  


(चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 21 सितंबर 2015

उड़न परी : लघुकथा

“ममा, मैं सलवार-कुर्ता नहीं पहनूँगी, मुझे गर्मी लगती है इसमें।” दस साल की आहना ने ठुनककर कहा।

“बेटा ज़िद्द नहीं करते, जल्दी से पहन लो, रमा आंटी के यहाँ पार्टी में चलना है। अगर हम देर से जायेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा।” शिखा ने बेटी को प्यार से समझाया।

“नहीं, मुझे नहीं जाना पार्टी-शार्टी में, मेरी सब फ्रेंड्स फ़्राक, स्कर्ट पहनती हैं, आप मुझे सिर्फ सलवार-कुर्ता पहनने को कहती हो । वे सब पार्क में खेलती हैं, आप मुझे वहाँ भी नहीं जाने देती हो, क्यों?” आज आहना के सब्र का बाँध जैसे टूट पड़ा था।

“क्योंकि तुम सलवार-कुर्ते में इतनी प्यारी लगती हो कि पूछो मत, रमा आंटी ने भी कल मुझसे यही कहा।” बेटी को बहलाते हुए शिखा बोली।

“एकदम झूठ !” आहना ने माँ की बात को समझते हुए, अपनी नाराज़गी को छुपाते हुए कहा।

“एकदम सच्ची।” अपने गले को चुटकी से पकड़ते हुए शिखा ने कहा। फिर दोनों खिलखिला पड़ीं।

लेकिन शिखा के चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसके अंदर भीषण संग्राम छिड़ा हुआ है। शादी के तीसरे साल पति की अचानक मृत्यु और फिर छः साल की आहना के साथ दूर के रिश्तेदार के उस दुर्व्यवहार ने उसे झिंझोड़ डाला था। जैसे-जैसे आहना बड़ी हो रही थी उसके मन का भय दिन-ब-दिन उसे और जकड़ता जा रहा था। वह उसे हर तरह से दुनिया की नजरों से दूर, ढक-मूँदकर रखना चाहती थी। यही सब सोचकर वह आहना के खेलने-कूदने, पहनने-ओढ़ने पर पाबंदियाँ लगाती जा रही थी। अक्सर उसके साथ काम करने वाली सहेलियाँ भी उस पर पिछड़ी, दकियानूसी होने का आरोप लगातीं, किन्तु वह सब हँसी में उड़ा देती थी। हालाँकि कभी-कभी तो उसे स्वयं लगता कि वह अपने हाथों से अपनी मासूम बच्ची का गला घोंट रही है।

अचानक शिखा की तन्द्रा टूटी। वे पार्टी में पहुँच गए थे। वहाँ बड़ी रौनक थी। खुले वातावरण में मधुर संगीत और बेला की सुगंध, मन, मस्तिष्क दोनों को ताज़गी प्रदान कर रहे थे। रमा ने आहना और शिखा का स्वागत किया। अपनी बेटी वैष्णवी से मिलवाया। आधुनिक लिबास में वैष्णवी एक परी जैसी लग रही थी। उसे देख शिखा जैसे मन्त्रमुग्ध सी हो गई। वह वैष्णवी के रूप में आहना की कल्पना करने लगी और फिर अचानक ही उस भयावह हादसे की याद से सिहर उठी।

तभी मंच पर पार्टी आरम्भ होने की घोषणा के साथ रमा और वैष्णवी से केक काटने का अनुरोध किया गया। दोनों ने मिलकर केक काटा, सारा लॉन तालियों से गूँज उठा।

रमा ने माइक पर कहा, “देवियों और सज्जनों, मैं आप सभी का अभिवादन करती हूँ। मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मेरी बेटी वैष्णवी ने आई. पी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। वह अपने जीवन में इसी तरह सफल होती रहे, आप उसे आशीर्वाद प्रदान करें।”

तभी आगे बढ़कर वैष्णवी ने माँ के हाथ से माइक ले लिया और बोली, “लेकिन मैं आज जिस मुकाम पर हूँ, उस तक पहुँचाने के लिए मेरी माँ ने बहुत कष्ट सहे। बाधाओं और समाज की तमाम वर्जनाओं से मुकाबला करते हुए मेरी हर ख्वाहिश पूरी की। आज मैं आप सबको बताना चाहती हूँ कि जब मैं आठ बरस की थी तब एक ऐसे हादसे का शिकार हुई जिसे हमारा समाज किसी लड़की के जीवन को समाप्त करने के लिए पर्याप्त मानता है। लेकिन मेरी माँ ने मुझे उस अन्धकार से निकाला, कैसे, यह मैं अब भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।....माफ करना माँ, मैंने आपकी डायरी पढ़ ली है...... ।’’ कहते हुए उसका गला रुँध गया।

पार्टी में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया, और अगले ही क्षण तालियाँ गड़गड़ा उठीं। वैष्णवी अपनी माँ से लिपट गई। वहां मौजूद लगभग सभी की आँखें भीग गईं। और शिखा तो जैसे सुन्न ही पड़ गई। लेकिन अगले ही पल जैसे उसने कोई प्रण कर लिया था। वह आहना को गले लगाते हुए बोली, “कल हम अपनी आहना के लिए ढेर सारी फ़्राक और स्कर्ट्स लेने चलेंगे।”

“सच्ची ममा !” आहना का चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा। वह दुपट्टे को हाथ में फैलाकर ऐसे दौड़ने लगी जैसे वह उड़ान भरने जा रही हो।

(चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 31 अगस्त 2015

फुहारें : लघुकथा

मैं सुबह जल्दी-जल्दी स्नान कर राखी बंधवाने के लिए बैठक में आ कर छोटी बहन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा । हमेशा राखी बाँधने के बाद उपहार के लिए उसका आँखों को नाच-नचा कर तकरार करना मुझे बड़ा भाता था, इसीलिए मैं हमेशा उपहार छिपा देता था। आज भी उसके मनपसंद उपहार को मेज के नीचे छिपा दिया। जब काफ़ी देर हो गई और वह राखी लेकर नहीं आई तो मैंने उसे आवाज़ दी –


“छोटी !”

“भैया, छोटी तो मझले भैया के यहाँ गई है, राखी बांधने ।” छोटा भाई तैयार होते हुए बोला। टाई बांधते हुए छोटे की कलाई पर बंधी राखी देख मुझे थोड़ी मायूसी हुई।

“ओह, हमेशा सबसे पहले मुझे राखी बांधती थी ना इसलिए मैने सोचा कि उसे आवाज़ दे दूँ।” मैंने अपने को संयत करते हुए कहा।

“बेटा, छोटे और मझले को ऑफिस जाना है न ।” माँ समझाते हुए बोली।

माँ के ये शब्द सुनकर मुझे थोड़ा आघात सा लगा। मुझे याद आया कि हां सही बात है मुझे कौन सा ऑफिस जाना है। बेरोजगारी का ख्याल आ गया। मैं अपनी सूनी कलाई को देख होठों पर फीकी सी मुस्कान लाते हुए मन ही मन बुदबुदाया –

"कुछ दिन पहले तक मुझे भी ऑफिस जाने की जल्दी रहती थी।"

मैं वापस बैठक में आकर मेज के नीचे छिपाए उपहार को उठाने के लिए झुका ही था कि तभी -

“भैया !” पीछे से छोटी की पुकार ने मुझे चौंका दिया ।

छोटी सामने खड़ी खिलखिला रही थी। मैं हक्का-बक्का मामला समझने की कोशिश करने लगा। वह अपनी गोल-गोल आँखों को नचाते हुए बोली –

“भैया, हमेशा मैं सबसे पहले आपको राखी बांधती थी न, इस बार मैंने सोचा क्यों न उल्टा किया जाए। पहले छोटे भैया, फिर मंझले और फिर मेरे प्यारे बड़े भैया।’’

उसी समय माँ, मझले और छोटे भी बैठक में आ गए। छोटा बोला -

“भैया इस छोटी की बच्ची के ड्रामे ने इस बार हम सब को भी चक्कर में डाल दिया। यह मानी ही नहीं।’’

‘’लाओ अब जल्दी से अपनी कलाई आगे करो।’’ छोटी ने अपनी आंखे नचाते हुए कहा।

बैठक में गूंज रहे ठहाकों के बीच मैंने अपनी संकीर्ण सोच को जैसे-तैसे छिपाते हुए छोटी की नाक पकड़ कर जोर से हिला दिया।

रविवार, 23 अगस्त 2015

‘हम-परवाज़’ : लघुकथा

आज दोनों पहली बार रेस्ट्रॉ में मिल रहे थे । खाना ख़त्म करने के बाद लड़के ने इधर-उधर देखा फिर लड़की से कुछ कहा और उठकर कहीं चला गया । थोड़ी देर बाद वह कोल्ड ड्रिंक लेकर आया । देते समय थोड़ी सी कोल्ड ड्रिंक लड़की के कपड़ों पर छलक गई । लड़के ने फ़ौरन अपना रुमाल निकाल कर उसकी ओर बढ़ाया । लड़की ने कपड़ों पर छलकी कोल्ड ड्रिंक साफ़ की । थोड़ी देर बाद दोनों उठकर रेस्ट्रॉ के बाहर आ गए । थोड़ी दूर चलने के बाद लड़की ने लड़के से कुछ कहा फिर उसे वहीँ रोककर वापस रेस्ट्रॉ के अन्दर चली गई। शायद वह कुछ भूल गई थी। लड़का थोड़ी देर बाहर खड़ा रहा, फिर वह भी रेस्ट्रॉ के अंदर जाने लगा तभी लड़की वापस आ गई ।

"क्या हुआ ? वापस क्यों चली गई थी तुम ?" लड़के ने एकबार उसकी तरफ, एकबार रेस्ट्रॉ के दरवाज़े की तरफ देखते हुए पूछा ।

लड़की ने बिना कुछ कहे अपने पर्स से एक सिम निकालकर लड़के के हाथ में थमा दिया और जरा गुस्‍से में बोली, “यह क्‍यों दिया तुमने मुझे? ”

“ये तुम्हारे पास कैसे....” शब्द जैसे लड़के के कंठ में अटक के रह गए ।

“जब तुमने मुझे रुमाल दिया था तो यह उसमें था।” लड़की के होठों पर शरारत भरी मुस्कराहट तैर रही थी।

लड़का अभी संभल भी नहीं पाया था कि लड़की ने अपने पर्स से एक मोबाईल भी निकाल कर लड़के के हाथ में थमा दिया। लड़का मोबाईल देख कर हक्का-बक्का रह गया ।

"यह वही मोबाईल है न, जिसको तुमने रेस्ट्रॉ के बिल के पैसे कम पड़ने पर, बदले में दिया था?" लड़की ने रोष भरे अंदाज़ में पूछा ।

"वो, वो तो..." अब तक लड़का एकदम पानी-पानी हो चुका था।

“क्या हमारे प्यार का पंछी एक पंख से उड़ेगा ?” लड़की की आँखों में बेइन्तहा प्यार उमड़ आया था।

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

'गुनगुना एहसास’ : लघुकथा

एक तो रात का समय ऊपर से जनवरी की हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड। साईकिल चलाते हुए हैंडिल पर मेरी उंगलियाँ जमकर काठ हुई जा रहीं थीं। रास्ते में चाय की गुमटी देखकर मैंने सोचा थोड़ी गर्माहट ले ली जाय, सो चाय का ऑर्डर दे वहाँ रखी बेंच पर बैठ गया।

एकाएक मेरी नजर सामने, सड़क के पार, एक मैले-कुचैले मरियल-से कुत्ते पर पड़ी। मैंने उसे ग़ौर से देखा। यह वही कुत्ता था जिसे हमारे मोहल्ले के एक संभ्रांत परिवार ने कुछ माह पहले मंगवाया था। आरम्भ में तो उसे बड़े लाड़-प्यार से रखा गया, लेकिन माह भर बीतते-बीतते डंडे से उसकी धुनाई होने लगी और फिर एक दिन उसे यह कह कर घर से बाहर कर दिया गया कि वह देशी नस्ल का है।

सामने ही, एक व्यक्ति ठेले के चारों ओर बोरे लटका कर अपना आशियाना बनाने की कोशिश कर रहा था । पास में ईंटों से बने चूल्हे पर रखी देगची में कुछ पकाने को रखा हुआ था। वह कुत्ता बदहवास-सा बार-बार उस देगची की ओर जाता और वह व्यक्ति हर बार डंडे को ज़मीन पर पटक कर उसे भगा देता था।

पक जाने के बाद वह व्यक्ति देगची से खिचड़ी निकालकर खाने लगा। कुछ ही दूरी पर डरा-सहमा कुत्ता अपना मुंह ज़मीन पर टिकाए, पूंछ हिलाता हुआ कूं-कूं करता याचक दृष्टि से उसे देखे जा रहा था। खाते-खाते उस व्यक्ति ने अख़बार के एक टुकड़े पर थोड़ी खिचड़ी रखकर उसकी ओर सरका दी । कुत्ता दबे पाँव पूँछ हिलाता हुआ उसके निकट सरक आया और अख़बार पर पड़ी खिचड़ी खाने लगा।

“साहब, चाय।” चाय वाले की आवाज आई।

उसके हाथ से चाय के गिलास को लेकर मैं अपनी दोनों हथेलियों के बीच जकड़कर बैठ गया। गले में उतारने से पहले जरूरी था कि चाय की गर्मी से उँगलियों को सीधा कर लिया जाए। तीन मिनट का गिलास इसलिए पाँच से भी ज्यादा मिनट में खाली हुआ। गिलास को गुमटी पर रख मैंने चाय के पैसे चुकाए और बेंच से खड़ा हो गया।

चलते-चलते मैंने अनायास ही आख़िरी बार अपनी निग़ाह सामने ठेले की ओर डाली। वह व्यक्ति ठेले की ओट में बिछे बोरे पर एक पुरानी चीकट-सी रज़ाई में गठरी बन चुका था। कुत्ता उसके पैरों के पास रज़ाई से बाहर रह गए बोरे पर सिमटा पड़ा था। तभी उस व्यक्ति ने पैर से रज़ाई का कोना कुत्ते की पीठ पर डाल दिया, कुत्ता गोलमोल होकर उसमें दुबक गया।

चित्र गूगल से साभार 

‘जलकुंभी’ लघुकथा

“उफ़्फ़ ! क्या मुसीबत है, लगता है आज का दिन ही मनहूस है !“

मैं झुंझलाते हुए कार से उतरी । सुबह अस्पताल से आई खबर ने मन को पहले ही खिन्न कर रखा था, ऊपर से रास्ते में कार अलग ख़राब हो गई । हाइवे पर आती-जाती गाड़ियों को हाथ दिखाकर रोकने की कोशिश की किन्तु वे सभी सनसनाती हुई निकल गईं । पास में मैकेनिक की एक गुमटी थी, पर वह बंद थी । हाइवे से उतर कर थोड़ी दूर चलने पर एक झोपड़ा दिखाई दिया, मैं उधर चल पड़ी । उसके पास जाने पर ढोलक की थाप और औरतों के गाने की आवाजें सुनाई देने लगीं, शायद कोई उत्सव मनाया जा रहा था । झोपड़े के बाहर खटोले पर एक बूढ़ी बैठी थी ।

मैंने उससे पूछा –

“अम्मा, मेरी कार ख़राब हो गई है, धक्का लगाने के लिए अपने लड़कों को भेज देंगी ?”

“आइये बीबी जी, बड़े संयोग से आपके पाँव हमारे झोपड़े में पड़े हैं, बैठिये ।” चहकते हुए बूढ़ी ने एक छोटी सी चौकी की ओर इशारा किया ।

“अम्मा ! कोई मदद मिल सकती है कि नहीं ?” मेरी झुंझलाहट और बढ़ गई ।

“अरे बीबी जी ! लीजिये पहले मुँह तो मीठा कीजिये !“

अब मुझे उसपर क्रोध आने लगा, मैं वापस हाइवे की ओर जाने के लिए मुड़ने लगी तो
उसने हाथ के इशारे से रोकते हुए आवाज़ दी ।

“ओ संतोषी ! सड़क पर बीबी जी की कार खराब हो गई है, जा जाकर ठीक कर दे और
धक्का मारने के लिए पिंकी, पूजा को भी लेती जाना !“

“अच्छा अम्मा !” झोपड़े के अंदर से आवाज़ आई ।

मैं हतप्रभ सी कभी उसे कभी झोपड़े से निकल कर आती हुई उन तीनों युवतियों को देखने लगी ।

“अरे बीबी जी आप चिंता न करो, ये मेरी बहू बहुत अच्छी मैकेनिक है । ब्याह कर आते ही मैंने बेटे से कहकर इसे भी मैकेनिक का काम सिखवा दिया था, अब ये उससे भी ज्यादा होशियार हो गई है ।“

“अच्छा, ये तो बहुत अच्छी बात है !!!” मैंने आश्चर्य से उसे देखा ।

“आज मेरी पोती का जन्मदिन है इसलिए ये काम पर नहीं गई और पिंकी, पूजा मेरी बेटियाँ हैं जो ससुराल से आई हैं, शाम को पार्टी है ना ।“ उसने पोपले मुंह पर मुस्कराहट बिखेरते हुए कहा ।

न जाने क्या था उसकी मुस्कराहट में जिसने मेरे मन के सरोवर में उग आई जलकुम्भियों को उखाड़ फेंका था । अब मुझे अस्पताल पहुँचने की जल्दी थी, बहू के साथ मिलकर पार्टी का मेन्यू जो तैयार करना था ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

‘प्रतिदान’ : लघुकथा

उमस इतनी थी कि थोड़ी दूर चलते ही मैं पसीने से तर-बतर हो गई । रिक्शे के लिए मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, तभी सामने से एक रिक्शावाला आता दिखा । पास आने पर रुकते हुए उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा ।
“नाके तक जाना है, कितना लोगे ?“
“पचास रुपये ।“
“क्या !!! तीस होते हैं !!!“ कहकर मैं आगे बढ़ने लगी ।
“ठीक है चालीस दे देना ।“ अंगोछे से मुंह का पसीना पोछते हुए वह बोला ।
“न, तीस !!!“
“अच्छा बैठो ।“
रिक्शे पर बैठने पर मैंने राहत की साँस ली । चलते हुए रिक्शे पर मंद-मंद लगने वाली हवा के झोंको का आनंद लेते हुए मैंने आँखें बंद कर लीं । तभी रिक्शेवाले की कमीज़ से पसीने की बदबू का भयंकर भभका मेरे नथुनों से टकराया, मैंने नाक को रूमाल से ढक लिया । अब रिक्शे पर बैठना दूभर हो रहा था, मैं गंतव्य का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी ।
“रात होने लगी तो लगा कि आज कोई सवारी नहीं मिलेगी ।“ पैडल मारते हुए वह बोला।
“लगता है तुम इस शहर में नए हो ?”
“जी हाँ ।”
“हम्म, तभी इस पौश इलाक़े में सवारी ढूंढ रहे हो ?“
“भला हो ऊपर वाले का, जो आपको भेज दिया, वर्ना आज भूख से मर जाता, सुबह से पेट में कुछ नहीं गया है ।“
थोड़ी देर में नाका आ गया । उतर कर मैंने उसकी तरफ पचास रूपए बढ़ाए ।
“बहन जी, टूटे नहीं हैं ?” उसने परेशान होकर पूछा ।
“पूरे रख लो ।“
उसने अचरज से मेरी ओर देखा, फिर रूपये लेकर पहले रिक्शे के हैंडिल से फिर माथे से लगाते हुए पूछा –
“बहन जी, आपको वापस घर भी तो जाना होगा न ?”
“हाँ, पर....क्यों ?” मैं हैरत से उसे देखने लगी ।
“मैं उस सामने वाले ढाबे पर खाना खा रहा हूँ, जब आप लौटेंगी तो आपको वापस घर पहुंचा दूंगा, इसी पैसे में ।”

रविवार, 24 मई 2015

‘मरीचिका’

“क्या, तुम्हारी माँ मिस------रह चुकी हैं !!!"

लोगों के मुंह से ये शब्द सुनकर स्नेह को अपनी माँ पर बहुत गर्व होता था । ख़ूबसूरत सेलिब्रिटी माँ की बेटी कहलाना उसे एवरेस्ट पर झंडे गाड़ने जैसा लगता था ।

ईर्ष्या में अक्सर उसकी सहेलियां उसे छेड़तीं रहती थीं -

"स्नेह, कहीं ऐसा ना हो कि कोई तुझे देखने आये और माँ को पसंद कर ले ।"

"तो उससे हाथ जोड़कर कहूँगी कि मुझे भी माँ के साथ बेटी बनाकर लेता चले ।" कहते हुए स्नेह जोर से खिलखिला उठती ।

माँ और उसका प्यार आदित्य बस यही उसकी छोटी सी दुनिया थी । अभी तक उसने आदित्य को माँ से नहीं मिलवाया था इसलिए माँ के बाहर जाने पर उसने आदित्य के साथ घूमने का प्लान बना लिया था । उसके इंतज़ार में वह यूँ ही पगडंडियों पर टहलते-टहलते घर से दूर निकल आई । अचानक एक कार में दो सायों को देख वह उछल पड़ी ।

“नहीं !!! ऐसा नहीं हो सकता !!!”

उसने कांपते हाथों से आदित्य को फोन लगाया, कई बार रिंग जाने पर फोन उठा –

“हेलो, हाँ मैं...हाँ मैं अभी बिज़ी हूँ !!!” कहकर आदित्य ने बिना जवाब सुने फोन काट दिया ।

उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कार के अन्दर आपस में लिपटे दोनों साए आदित्य और माँ के थे किन्तु आदित्य के इस तरह से फोन काटने पर उसका विश्वास दृढ़ हो गया था । आज उसे अपनी सहेलियों की बातें याद आ रहीं थीं ।

"तो क्या वाकई में सुंदर माँओं की बेटियां अभागी होतीं हैं !!!" उसकी आँखें छलछला आयीं ।

तभी उसने अपनी हथेलियों पर गर्म कसाव का अनुभव किया। वह चौंक पड़ी ।

"आ..आ...आदित्य तुम !!!"

"क्यों, मुझे नहीं होना चाहिए था ?"

"लेकिन...तुम तो कार में...माँ....।" उसके मुंह में शब्द लड़खड़ाने लगे ।

"हाँ, आज मुझ अनाथ को भी माँ मिल गई ।"

उसने हैरत से पास आ रही माँ को देखा ।

"हाँ स्नेह, आदित्य मेरी सहेली शुभी की खोई हुई निशानी है, जो आज बेटे के रूप में मुझे मिल गई । चल, घर चल कर सारी बातें बताती हूँ ।"

उसने देखा माँ की आँखों से स्नेह के मोती झर रहे थे ।

रविवार, 5 अप्रैल 2015

'महत्वाकांक्षा'

बुलंदियों पर पहुँचने के जुनून में, उसके क़दम जल्दी-जल्दी आकाश में लगी सीढ़ी पर बढ़ते जा रहे थे । उसने देखा, मंज़िल और उसके बीच बस एक क़दम की दूरी बची है । जैसे ही उसने अपना पाँव अंतिम सोपान पर रखा, तो देखा मंज़िल अंगारों सी दहक रही थी । वह घबरा गया और वापस उतरने के लिए मुड़ा तो सोपानों को देख उसके मुँह से भयंकर चीख निकल गयी, पाँव फिसला और उसकी आँखें खुल गयीं । वह एक भयानक स्वप्न की गिरफ्त से तो बाहर आ गया था किंतु, सोपानों में उभरे वो रक्तरंजित चेहरे अब भी उसकी रूह को कँपा रहे थे, जिनमें से एक चेहरा उसका खुद का था ।
 

सोमवार, 23 मार्च 2015

‘फ़रिश्ता’

एक तो सड़ी गर्मी ऊपर से जाम में फंसी बस, सामने की सीट पर औरत की गोद में बच्चा दहाड़ें मार रहा था । उसकी बगल में बैठा आदमी बच्चे को गोद में लेकर कभी चुटकी बजा, कभी मोबाईल बजा, तो कभी उछाल कर फुसलाने की भरसक कोशिश कर रहा था । यह प्रक्रिया काफ़ी देर से चल रही थी इसलिए यात्रियों का भी ध्यान केंद्रित किए हुए थी, परेशान होकर उस आदमी ने बाहर झांका और बस से नीचे उतर गया, किसी तरह से वाहनों कूदते-फांदते थोड़ी देर बाद दूध लेकर लौटा ।

धीरे-धीरे जाम छंटने लगा बस ने भी रफ़्तार पकड़ ली थी । थोड़ी देर बाद वह आदमी उठकर गेट पर आया उसकी शर्ट की एक बांह और पैंट गीली थी, उसने इशारे से बस रुकवाई और अपना बैग लेकर नीचे उतर गया बस फिर चल पड़ी, यात्रियों की नज़रें एक दूसरे से टकराईं जिसमें हर्षान्वित आश्चर्य था । बच्चा खिड़की पकड़ खड़ा किलकारी मार रहा था ।


मंगलवार, 27 जनवरी 2015

‘पीले पत्ते’

“हेलो ऋतु ! मैं पार्क में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ, तुम आ रही हो ना ?”
“आ रही हूँ ! माय फुट ! मैं तो तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती !”
“इतनी नाराज़गी ! “देखो, हम लिव इन रिलेशनशिप तो रख ही सकते हैं, और अब तो इसका चलन भी है।”
“लिव इन रिलेशनशिप ! शिशिर, तुमने मुझे धोखा दिया, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं, अब मेरी जिंदगी के पीले पत्ते गिर चुके हैं, मैं वसंत से शादी करने जा रही हूँ, और खबरदार ! जो अब मुझे कॉल किया तो !”