सोमवार, 8 अगस्त 2016

फ्रंट पेज : लघुकथा

इधर तीन-चार रोज़ से अखबार का फ्रंट पेज गायब रहता था। समझ नहीं आ रहा था कि आखिर माज़रा क्या है ? इत्तेफ़ाक से अखबारवाला बिल लेकर आ गया। उसे देखते ही मेरा पारा हाई हो गया।

“क्या बात है, तीन-चार रोज़ से तुम आधा अखबार डाल रहे हो?” मैने उसे हड़काया।

“आधा अखबार ! ऐसा कैसे हो सकता है बाबूजी !”

“लेकिन हो तो यही रहा है ! बिना फ्रंट पेज के अखबार डाल रहे हो!” मैं झल्लाया।

“लेकिन बाबूजी, मैं बिना फ्रंट पेज के अखबार क्यों डालूँगा?”

मैंने उसे चेतावनी देते हुए कहा, “देखो, अगर कल पूरा अखबार नहीं डाला तो मैं किसी और को लगा लूँगा !”

दूसरे दिन फिर वही हुआ। मैंने तुरंत निर्णय लिया कि कल इसकी छुट्टी कर किसी दूसरे अखबारवाले को लगा लूँगा।

मैं भोर में ही उठकर बरामदे में बैठ गया, ताकि किसी नए अखबार वाले को तलाशा जा सके। थोड़ी देर बाद गेट खोलकर बाहर आ गया। सड़क पर सन्नाटा पसरा था। मैं चहलकदमी करते हुए नुक्कड़ तक जाकर वापस लौटने लगा। दूर से देखा एक छोटा बच्‍चा मेरे घर का गेट खोल अंदर दाखिल हो रहा है।

“ये बच्चा इतनी सुबह यहाँ क्या कर रहा है? ” मैंने अपने कदम तेज कर लिए।

मैं गेट के पास पहुँचा। देखा वह बच्चा अखबार उठा कर उसकी तह निकाल रहा है। मैंने बच्चे का कन्धा पकड़ कर अपनी ओर घुमाया। वह एक छोटी बच्ची थी। मुझे उसका चेहरा जाना पहचाना सा लगा।

मैंने उससे थोड़ा सख्त अंदाज़ में पूछा, “तो तुम रोज़ अखबार का पेज निकाल लेती हो, क्‍यों ?”

पहले तो वह सकपकाई फिर बिना डरे बोली, “मेरी दोस्त सोनम है ना, उसके लिए।”
“क्यों ?”
“क्योंकि सोनम स्‍कूल नहीं जाती।”
“क्यों नहीं जाती ?”
“क्‍योंकि उसके पास स्कूल की ड्रेस नहीं है।“
“तो अखबार ले जाकर क्या करती हो ?”
“सोनम की मम्मी अखबार से लिफाफे बनाती हैं। वो खूब सारे लिफाफे बना लेंगी तो सोनम की ड्रेस आ जाएगी।”

“ह्म्म्म, तो ये बात है।” मुझे उसकी बात दिलचस्प लगी।

“हूँम्म।” उसने सिर हिलाते हुए हामी भरी।

“तो फिर तुम अखबार का बाक़ी हिस्सा क्यों छोड़ देती हो?”

मेरे प्रश्न को सुनकर वह मेरी ओर देखने लगी। वह चुप थी। शायद उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। उसके बालमन में क्या था, नहीं पता। लेकिन आज इस वाकये ने मुझे सोच में डाल दिया है और मैं अब भी उसी में उलझा हुआ हूँ।

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(चित्र गूगल से साभार)