मंगलवार, 27 जनवरी 2015

‘पीले पत्ते’

“हेलो ऋतु ! मैं पार्क में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ, तुम आ रही हो ना ?”
“आ रही हूँ ! माय फुट ! मैं तो तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती !”
“इतनी नाराज़गी ! “देखो, हम लिव इन रिलेशनशिप तो रख ही सकते हैं, और अब तो इसका चलन भी है।”
“लिव इन रिलेशनशिप ! शिशिर, तुमने मुझे धोखा दिया, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं, अब मेरी जिंदगी के पीले पत्ते गिर चुके हैं, मैं वसंत से शादी करने जा रही हूँ, और खबरदार ! जो अब मुझे कॉल किया तो !”



7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.01.2015) को ""कन्या भ्रूण हत्या" (चर्चा अंक-1873)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. बहुत संवेदनशील..... मन के सच्चे भावों की प्रस्तुति.....

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  3. पेम और मौसम ... क्या आज की दास्ताँ कह रहा है ...

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