रविवार, 23 अगस्त 2015

‘हम-परवाज़’ : लघुकथा

आज दोनों पहली बार रेस्ट्रॉ में मिल रहे थे । खाना ख़त्म करने के बाद लड़के ने इधर-उधर देखा फिर लड़की से कुछ कहा और उठकर कहीं चला गया । थोड़ी देर बाद वह कोल्ड ड्रिंक लेकर आया । देते समय थोड़ी सी कोल्ड ड्रिंक लड़की के कपड़ों पर छलक गई । लड़के ने फ़ौरन अपना रुमाल निकाल कर उसकी ओर बढ़ाया । लड़की ने कपड़ों पर छलकी कोल्ड ड्रिंक साफ़ की । थोड़ी देर बाद दोनों उठकर रेस्ट्रॉ के बाहर आ गए । थोड़ी दूर चलने के बाद लड़की ने लड़के से कुछ कहा फिर उसे वहीँ रोककर वापस रेस्ट्रॉ के अन्दर चली गई। शायद वह कुछ भूल गई थी। लड़का थोड़ी देर बाहर खड़ा रहा, फिर वह भी रेस्ट्रॉ के अंदर जाने लगा तभी लड़की वापस आ गई ।

"क्या हुआ ? वापस क्यों चली गई थी तुम ?" लड़के ने एकबार उसकी तरफ, एकबार रेस्ट्रॉ के दरवाज़े की तरफ देखते हुए पूछा ।

लड़की ने बिना कुछ कहे अपने पर्स से एक सिम निकालकर लड़के के हाथ में थमा दिया और जरा गुस्‍से में बोली, “यह क्‍यों दिया तुमने मुझे? ”

“ये तुम्हारे पास कैसे....” शब्द जैसे लड़के के कंठ में अटक के रह गए ।

“जब तुमने मुझे रुमाल दिया था तो यह उसमें था।” लड़की के होठों पर शरारत भरी मुस्कराहट तैर रही थी।

लड़का अभी संभल भी नहीं पाया था कि लड़की ने अपने पर्स से एक मोबाईल भी निकाल कर लड़के के हाथ में थमा दिया। लड़का मोबाईल देख कर हक्का-बक्का रह गया ।

"यह वही मोबाईल है न, जिसको तुमने रेस्ट्रॉ के बिल के पैसे कम पड़ने पर, बदले में दिया था?" लड़की ने रोष भरे अंदाज़ में पूछा ।

"वो, वो तो..." अब तक लड़का एकदम पानी-पानी हो चुका था।

“क्या हमारे प्यार का पंछी एक पंख से उड़ेगा ?” लड़की की आँखों में बेइन्तहा प्यार उमड़ आया था।

1 टिप्पणी:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, 'छोटे' से 'बड़े' - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं