रविवार, 17 जुलाई 2016

खुली आँखों से : लघुकथा

उत्तर पुस्तिका में अंग्रेज़ी के कम अंक देखकर रत्ना परेशान हो उठी थी। उसने रोहन की अंग्रेज़ी सुधारने के लिए क्या कुछ नहीं किया। दो-दो ट्यूशन। यहाँ तक कि घर में अंग्रेज़ी का माहौल बना रहे इसलिए उसने हिंदी बोलने, पढ़ने और टीवी पर हिंदी कार्यक्रम देखने पर भी कर्फ्यू लगा रखा था।

आज वार्षिक परीक्षा का रिपोर्टकार्ड मिलना था। वह पति के साथ भारी क़दमों से विद्यालय के ऑडिटोरियम में दाखिल हुई। उसने देखा तमाम अभिभावकों के चेहरे खिले हुए थे।

“काश ! रोहन के भी अंग्रेज़ी में अच्छे अंक आये होते तो हम भी इसी तरह से ख़ुश होते।” रत्ना ने फुसफुसा कर पति से कहा।

“ह्म्म्म '' पति ने मोबाईल पर उंगलियाँ फिराते हुए हामी भरी।

रोहन बगल में सिमटा बैठा था। शायद वह माँ की मनःस्थिति भांप गया था। इसलिए सिर झुकाए कनखियों से अपने साथियों को इधर-उधर भागते देख लेता था। उनके साथ जाकर खेलने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहा था।

समारोह आरम्भ हुआ। सबसे पहले प्रथम, द्वितीय, तृतीय आये विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। उसके बाद विभिन्न विषयों में विशिष्ट योग्यता वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाने लगा।
मंच पर नाम पुकारने का सिलसिला चल रहा था।

“अब एक नाम। जिसने प्रदेश स्‍तरीय हिन्दी कहानी लेखन और चित्र प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करके न केवल विद्यालय का, बल्कि हमारे शहर का भी नाम रोशन किया है।”

पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

“वह नाम है, हर्ष कपूर !”

नाम सुनते ही रत्ना के बगल में बैठे अभिभावक ख़ुशी से उछल पड़े। हर्ष उन्हीं का बेटा था। माँ ने बेटे का माथा चूमा,पिता ने पीठ थपथपाई और पुरस्कार लेने के लिए मंच पर भेज दिया।

रत्ना ने धीरे से उनसे पूछा, ''हर्ष की इंग्लिश कैसी है ?”

“अच्छी है।” हर्ष की माँ ने जवाब दिया।

“उसके मार्क्स...आई मीन अच्छे ही होंगे ?” रत्ना ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा।

“उम्म, एवरेज हैं, लेकिन हिंदी और आर्ट में फ़ुल आये हैं।” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।

“आप इससे सेटिसफाइड हैं ! जबकि ज़माना इंग्लिश का है !” रत्ना ने आश्चर्य व्यक्त किया।

“बिल्कुल, आख़िर इसमें बच्चे का इन्ट्रेस्ट है, हुनर है।” इस बार हर्ष की माँ ने रत्ना की ओर देखते हुए बड़े सहज भाव से जवाब दिया।

“इन्ट्रेस्ट तो रोहन का भी हिंदी राइटिंग में है, लेकिन हमने ही...।” कहते हुए रत्ना की ज़बान बीच में ही लड़खड़ा गई। वह अपराधी सी पति की ओर देखने लगी।

तभी मंच से प्रस्तुत कर्ता की आवाज़ गूँजी।

“और विद्यालय के ही एक और होनहार छात्र ने इसी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार जीता है!...वह है रोहन कुमार !”

नाम सुनते ही रत्ना सन्न रह गई। उसे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था। अनचित्ते ही उसने रोहन को खींचकर सीने से लगा लिया।

रत्ना की आँखें बरबस छलक आईं। उसने मिसेज़ कपूर की ओर देखा, पर कुछ बोल नहीं पाई। मिसेज कपूर ने मन की बात समझते हुए रत्ना का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

तालियों की गड़गड़ाहट फिर गूँज उठी।

1 टिप्पणी:

  1. बच्चों से हम ही लोग कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर बैठते हैं। .
    प्रेरक प्रस्तुति

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