सोमवार, 10 अप्रैल 2017

अपने-अपने सुख : लघुकथा

अलसुबह गुमटी पर चाय-बिस्कुट खाते महेश जी को उनके दो मित्रों ने देख लिया।
“भाई, ये महेश सुबह-सुबह गुमटी पर चाय पी रहा है, आखिर मामला क्या है?” एक मित्र ने कहा।
“अरे यही नहीं एक दिन बंदे को सट्टी से सत्तू खरीदते हुए भी देखा था, पूछने पर बोला, भाई रिटायर्मेंट के मजे ले रहा हूँ।” दूसरे मित्र बोले।
“सही कहा...मैं भी देख रहा हूँ कि जब से वह रिटायर हुआ है, सुबह पोते-पोतियों को स्कूल छोड़ने की ड्यूटी बजा रहा है।”
“और दिखाता ऐसे है जैसे कहीं की गवर्नरी
मिल गई हो।”
“हुँह...बेटे-बहुओं के राज में कैसी गवर्नरी?”
“चलो चलकर हाल-चाल लेते हैं।” दोनों मित्र गुमटी की ओर बढ़ चले।
“अरे, तुम दोनों इतनी सुबह यहाँ कैसे?” महेश जी ने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा।
“लो कर लो बात...हम भी यही पूछना चाहते हैं कि आजकल यहाँ चाय क्यों...?”
“ओहोहोहो... भई गुमटी की चाय की लत तो मुझे कॉलेज के ज़माने से थी...नौकरी की भाग-दौड़ में न जाने कब छूट गई...सुबह सैर-सपाटे पर निकलता हूँ तो पुराने दिन दोबारा जी लेता हूँ...” महेश जी बोले।
“यार, हमसे क्या छिपाना...आदमी रिटायरर्ड हो और घर में बेटे-बहू का राज हो तो चाय गुमटी पर ही पीनी पड़ती है।”
“और ऐसे में सत्तू केवल मज़े लेने के लिए कोई नहीं खाता।” 

महेश जी गंभीर मुद्रा में आ गए और बारी-बारी से दोनों का मुँह ताकने लगे। फिर अचानक ठट्ठा मारकर हँस पड़े। दोनों मित्र एक-दूसरे का चेहरा ताकने लगे, “भाई...भले ही तुम हमारी बात को हँसी में उड़ा लो लेकिन तुम्हारी पीड़ा हम भली-भांति समझ रहे हैं।”

“हाँ-हाँ...भाई चोर-चोर मौसरे भाई! आप लोग नहीं समझोगे मेरी पीड़ा तो कौन समझेगा।” ऐसा कहते हुए महेश जी की हँसी व्‍यंग्‍यात्‍मक हो गई। तभी ट्रैक सूट में उनकी बहू वहाँ आ गयी।

“डैडी जी, आज घर नहीं चलना क्या?”

“हाँ-हाँ...चलना है।” कहते हुए महेश जी मुस्कुराए। और बोले, “आज हमारे साथ ये दोनों भी चलेंगे...इन्‍हें तुम्‍हारे हाथ की चाय भी पीनी है और सत्तू भी खाना है।“

01/04/2017

                                                                 (चित्र गूगल से साभार)


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