रविवार, 28 सितंबर 2014

प्रतिमा

रघु का सारा शरीर ज्वर से तप रहा था | किसी तरह हिम्मत करके वह पोखर से मिट्टी तो ले आया पर अभी तक वह देवी की प्रतिमा नहीं बना पाया था | त्योहारों में प्रतिमाएँ बना कर उसे चार पैसे मिल जाते थे | मजदूरी करते हुए एक दुर्घटना में उसके बेटे और बहू की मृत्यु हो गई थी तब से रघु के बूढ़े कन्धों पर उसके दोनों पोते-पोती के पालन का बोझ आन पड़ा था |

रात काफी बीत गई थी | प्रतिमा बनाने के लिए किसी तरह से घिसटते हुए रघु अहाते में आ गया जहाँ उसने मिट्टी भिगो रखी थी | अचानक वहाँ एक सुन्दर सी लड़की को खड़ी देखकर वह सन्न रह गया | वह काफी भयभीत लग रही थी | उसने लड़की से पूछा कि इतनी रात में वह यहाँ क्या कर रही है तो वह बोली – “बाबा ! मेरे पीछे कुछ बदमाश पड़े हैं, वे मुझे पकड़ना चाहते हैं, मुझे कहीं छिपा दो |” तभी अचानक उन बदमाशों की गाड़ी अहाते के सामने आ कर रुकी | रघु के शरीर में न जाने कहाँ से बिजली सी फुर्ती आ गई उसने गीली मिट्टी उठा कर उस लड़की के ऊपर उड़ेल दिया और जल्दी-जल्दी मिट्टी लेपने लगा फिर ब्रश लेकर उसको आकार देने लगा | थोड़ी देर इधर-उधर देखने के बाद बदमाश वापस चले गए |

वह किसी उद्द्योगपति की बेटी थी | उसने अपना नाम प्रतिमा बताया और घर का पता दिया | सुबह रघु द्वारा सूचना देने पर लड़की के पिता आए | वे बेटी को सुरक्षित देखकर बहुत खुश हुए | उन्होंने रघु के दोनों बच्चों की जिम्मेदारी लेने और उसे अपने फार्म हाउस पर रहने का आग्रह किया | सूर्य की किरणों में प्रतिमा दिव्य लग रही थी | रघु भावविह्वल हो उसे देखे जा रहा था और सोच रहा था कि आज उसकी गढ़ी इस प्रतिमा में साक्षात् ‘माँ’ के दर्शन हो गए |



3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-09-2014) को "आओ करें आराधना" (चर्चा मंच 1751) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    शारदेय नवरात्रों की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुंदर रचना, सकारात्मकता से परिपूर्ण!

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