मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

‘छवि’ :लघुकथा

सोनाली ने कंपार्टमेंट के अंदर प्रवेश किया। चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए वह खिड़की के पास वाली अपनी सीट पर जा बैठी। उसी सीट पर दो और महिलाएँ बैठी थीं। उनकी उम्र साठ-पैंसठ के आसपास रही होगी। वे पैर ऊपर मोड़े बैठी बातें कर रही थीं। उनमें से एक रह-रहकर अपने दोनों घुटनों को दबा रही थी। उनकी बातचीत और वेशभूषा आदि से लग रहा था कि शायद वे किसी तीर्थ यात्रा पर जा रही हैं। एक गहरी साँस लेते हुए उसने पानी की बोतल को मुँह से लगाया एक-दो घूँट गटकने के बाद खिड़की से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने लगी । थोड़ी देर बाद वे दोनों हाथ में एक पुस्तिका लेकर कोई मंत्र आदि बुदबुदाने लगीं।

सोनाली ने बुरा सा मुँह बनाया और मन ही मन सोचने लगी, “उफ़ ! अब रात भर इनकी बड़बड़ झेलनी होगी।” उसने ऑंखें बंदकर खिड़की पर सिर टिका दिया। बाहर की ठंडी हवा और थकान से सोनाली की झपकी लग गई। अचानक खटके से उसकी नींद खुली तो देखा सामने की सीट वाले यात्री सोने की तैयारी कर रहे हैं। उसको जागा हुआ देख उसकी सीट पर बाजू में बैठी एक महिला उसकी ओर मुख़ातिब हुई, “बेटा, ऊपर वाली बर्थ मेरी है, मेरे घुटने में गठिया है, यदि आपको कोई दिक्क़त न हो तो ये नीचे वाली अपनी बर्थ मुझे दे दो।“

सोनाली मन ही मन झुंझलाई। फिर उनकी अवस्था देख बिना कोई जवाब दिए वह मान गई। ‘इन सठियाई औरतों को कुछ काम-धाम तो होता नहीं, जि़ंदगी भर पति की कमाई पर ऐश किया होगा और अब तीर्थयात्रा के बहाने सैर-सपाटा, हुंह ! घुटने में तकलीफ है तो घर में बैठकर पोता-पोती संभालें।’ सोनाली मन ही मन बड़बड़ाई। वह चढ़कर ऊपर की बर्थ पर चली गई। दोनों महिलाएँ भी सोने की तैयारी करने लगीं।

तभी उसे याद आया कि उसका लेपटॉप बैग तो नीचे ही रह गया है।

“माँ जी, मेरा बैग नीचे रह गया है ज़रा पकड़ाना।” वह नीचे झाँकते हुए बोली। उस महिला ने जैसे ही उसका बैग उठाया, वह थोड़ा तेज़ आवाज़ में बोली, “अरे, उसमें लैपटॉप है, कोई पोथी-पत्रा नहीं, ज़रा संभाल कर उठाइये।” महिला ने मुस्कुराते हुए उसका बैग पकड़ा दिया।

सुबह हो गई थी। दोनों महिलाएँ नीचे वाली सीट पर बैठी बतिया रही थीं। सोनाली भी नीचे उतर आई। बैग से तौलिया आदि लेकर मुंह धोने चली गई। वापस आकर बैग से आइना निकालकर मेकप करने लगी। गठिया वाली महिला उसे देखकर मुस्कुराते हुए बोली, “शुक्रिया, बेटा।”

बदले में न चाहते हुए भी वह मुस्कुरा दी। वह महिला बोली, “बेटा, आप कहाँ जा रही हो?”

“यूनिवर्सिटी में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हूँ, एक सेमीनार में जा रही हूँ।” सोनाली व्यंगात्मक अंदाज़ में ठसक भरी आवाज़ में बोली। जैसे उन महिलाओं को जताना चाह रही हो कि वह उनकी तरह फालतू में सैर नहीं कर रही है। वह महिला फिर मुस्कुरा दी।

“आप लोग तो शायद किसी तीर्थयात्रा पर जा रही हैं न ?” सोनाली से रहा नहीं गया। उसने आखिर पूछ ही लिया। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखने लगीं।

फिर गठिये वाली महिला बोली, “हाँ बेटा, ऐसा ही समझ लो।”

सोनाली उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगी, जैसे कह रही हो, ’समझ लो का क्‍या मतलब!’ तभी दूसरी महिला ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, “दरअसल मैं अपनी पोती के दीक्षांत समारोह में जा रही हूँ, और ये मेरी सखी उसी समारोह में मुख्य अतिथि हैं। ये वहाँ की भूतपूर्व कुलपति हैं।”

सोनाली ने चौंककर कुछ इस तरह उनको देखा जैसे पहली बार देख रही हो।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2130 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. बहुत सुंदर ...नई पीढ़ी को सीख ... जो जितना ऊपर होता है वह उतना है सहज और विनम्र ...सरल शब्दों में मन को अच्छा सन्देश देती रचना ...बधाई !

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  3. बहुत ही अच्‍छी कहानी प्रस्‍तुत की है आपने। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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