रविवार, 29 नवंबर 2015

सज़ा : लघुकथा

घंटी बजे लगभग दस मिनट बीत चुके थे। मैडम सीमा के कक्षा में न पहुँचने पर कक्षा मॉनीटर ने स्टाफ़रूम में झाँक कर देखा तो वह अपने मोबाइल में व्‍यस्त थीं।

“मैम, चलिए, सब बहुत शोर कर रहे हैं।“ मैडम सीमा बिना कुछ जवाब दिए मोबाइल पर उंगलियाँ फेरे जा रहीं थीं।

“मैम.....” मैडम का कोई जवाब न पाकर वह फिर बोला।

“उफ़ ! इस स्कूल में तो ज़रा सा भी चैन नहीं।“ तन्द्रा भंग होने पर वह भुनभुनाते हुए कक्षा की ओर चल पड़ीं।

मैडम को कक्षा में प्रवेश करते देख बच्चे फटाफट अपने-अपने स्थान पर हो लिए। उन सबने एक सुर में उनका अभिवादन किया। उन्‍होंने अभिवादन के बदले में सबको खड़े रहने को कहा।

कक्षा अभी शुरू ही हुई थी कि स्कूल का चपरासी एक नोटिस लेकर आ गया। सभी बच्चों की नोटबुक प्रिंसीपल ऑफिस में मँगवाई गईं थीं। मैडम सीमा ने तुरंत सभी बच्चों को उनकी नोटबुक जमा करने का आदेश दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी नोटबुक मेज पर लाकर जमा कर दीं। मैडम नामों की सूची से नोटबुक को मिलाने लगीं।

आयुष की नोटबुक न पाकर उन्‍होंने पूछा, “आयुष ! तुम्हारी कॉपी कहाँ है ?”

“मैम, मेरी कॉपी मानस ले गया है।”

“अच्‍छा ! मानस तो कई दिनों से स्कूल नहीं आया, कब ले गया तुम्हारी कॉपी ?” मैडम सीमा ने सख़्त आवाज़ में पूछा।

“मैम, उस दिन जब मैंने सबसे पहले काम कर लिया था तो आपने कहा था कि मैं अपनी कॉपी मानस को काम पूरा करने के लिए दे दूँ।” आयुष ने सफ़ाई दी।

“नो, ये तुम्हारा काम पूरा न करने का बहाना है, बस।”

यह सुनकर आयुष की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, फिर भी डरते-डरते उसने याद दिलाया, “वो...वो...मैम, उस दिन जब मैं स्टाफ़रूम में आया था न, तब आपने देने को कहा था।”

“चुप ! एक तो कामचोरी, ऊपर से झूठ !” मैडम की बात सुनकर आयुष सहम गया।

मध्यान्ह अवकाश की घंटी बज गई। मैडम सीमा उसे भोजन न करने की सज़ा दे स्वयं स्टाफ़रूम में आ गईं। आयुष पूरे मध्यान्ह अवकाश भर कक्षा के एक कोने में खड़ा रहा।

अवकाश के बाद दूसरी कक्षा शुरू हो गई। आयुष बिना भोजन किए चुपचाप अपनी जगह बैठ गया।

मैडम सीमा अपनी अगली कक्षा के लिए निकल ही रही थीं कि साथी अध्‍यापिका ने उन्‍हें एक नोटबुक देते हुए कहा कि ये किसी बच्चे के अभिभावक ने भिजवाई है। नोटबुक देखकर वह सकते में आ गईं। उस पर आयुष का नाम लिखा था। वह नोटबुक लेकर आयुष की कक्षा की ओर भागीं।

कक्षा चल रही थी। उन्‍होंने देखा, आयुष आँखों में आँसू लिए अपनी सीट पर बैठा था। मैडम सीमा की आँखें भी भर आईं। वे उसको नोटबुक दिखाते हुए बोलीं, “आयुष तुम सच कह रहे थे कि तुमने अपनी कॉपी मानस को दी है, लेकिन मैम ने तुम्हारी बात नहीं सुनी, मैम बहुत गन्दी हैं न।“ यह कहते-कहते उन्‍होंने झुककर आयुष को गले लगा लिया।

आयुष ना में सिर हिलाते हुए सीमा से लिपट गया। उधर कक्षा ले रहीं दूसरी अध्‍यापिका यह सब देखकर हतप्रभ थीं, लेकिन बच्‍चे तालियाँ बजा रहे थे।
चित्र गूगल से साभार 

3 टिप्‍पणियां:

  1. देर से ही सही सीमा मैम को गलती का अहसास तो हुआ ... बच्चों की बातों पर विश्वास करना चाहिए ... अच्छी लघु कथ .

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  2. जय मां हाटेशवरी....
    आप ने लिखा...
    कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
    हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
    दिनांक 01/12/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की जा रही है...
    इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
    टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    कुलदीप ठाकुर...

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