मंगलवार, 10 सितंबर 2019

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

 "आपने एडमीशन फार्म में बच्चे का धर्म नहीं लिखा?"

"जी, नहीं है।"

"क्यों, आपका कोई धर्म नहीं है क्या?"

"है, बिलकुल है। मैं सिख हूँ, पत्नी ईसाई है।"

"हाँ तो आप इस काॅलम में सिख भरिए!"

"बिलकुल नहीं!"

"क्यों?"

"क्योंकि बच्चे को धर्म के बारे में अभी कुछ पता नहीं।"

"वह बताना तो आपका फ़र्ज है।"

"जी, लेकिन एक समस्या है कि हम केवल दो ही धर्मों के बारे में उसे बता पाएँगे...बाकी के.."

"अरे भाई, बच्चे का तो वही धर्म होता है जो पिता का होता है, ऐसा ही होता आया है।"

"किन्तु मेरे पिता का धर्म सिख नहीं था।"

"ओहहो, तो क्या था?"

"पता नहीं, कभी पूछा नहीं।"

"तो वे अनाथालय से थे क्या?"

"नहीं, उनके माता-पिता पिता थे।"

"अच्छा जी, तो उनका नाम क्या था?"

"अज़रा और अमन!"

"अ बब देखिए आपको इस धर्म वाले काॅलम में कोई तो धर्म भरना ही होगा!"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि यह काॅलम यूँ ही छोड़ दिया जाए?"

"नहीं सर, बिना धर्म के हमारा कम्प्यूटर एडमीशन फार्म एक्सेप्ट ही नहीं करेगा।"

"तो उस काॅलम में 'मानवता' भर दीजिए।"

"लेकिन कंप्यूटर में धर्म के काॅलम में ऐसा कोई ऑप्शन नहीं है।"

"ओह, तब तो ऐसे कम्प्यूटर को बदला जाना चाहिए!"

"सर, यह तो नामुमकिन है!  मतलब ऐसा कहाँ होता है? "

".........?"

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