रविवार, 15 सितंबर 2019

बे-मतलब

चूहा इधर से गया कि उधर से। पारिवारिक नोकझोंक के लिए किसी मुद्दे की आवश्यकता होती है क्या? और फिर बात तेरी-मेरी के खाल उधेड़ तक कब पहुँच जाती है पता भी नहीं चलता। आज जब बात हद से गुजरने लगी तो हम झनकते-पटकते घर से निकल आए। अनमने से कॉलोनी के पार्क की ओर चल दिए।

पार्क में प्रवेश करते ही दायीं ओर एक बेंच दिखी। सोचा वहीँ चलकर ग़म गलत करते हैं। बेंच के निकट पहुँचे तो देखा बेंच के नीचे भैरव जी के वाहन विष्णु मुद्रा में शयनागत थे। हमें देखते ही उन्होंने डोंट डिस्टर्ब वाला नाद किया। खतरा भाँप हम फ़ौरन पार्क के वाम ओर पलट गए।

हम अगले किसी सुखासन की खोज में आगे बढ़े तो एक दूसरी बेंच पर महिलामंडल विराजमान था। टहलने वाली पट्टी पर चलते हुए हम उनके सामने से गुजरे।

“सब्जी पका कर आटा लगा दिया है, जब लेडीज़ स्पेशल सीरियल शुरू होता है तब डिनर करते हैं!’’

“हमने तो नेट फ्लिक्स ले लिया है, टीवी पर तो ये ही चिपके रहते हैं...जब देखो न्यूज़ चैनल!’’

सुनते हुए हम आगे बढ़ आए थे। वहाँ हल्का सा अँधेरा था और एक बेंच भी थी। पास पहुँचे तो देखा कि उसके बगल वाली बेंच पर आधुनिक उर्वशी और पुरुरवा आसन जमाए एक-दूसरे को पकौड़े खिला रहे हैं। हम एकांत चाहते थे इसलिए वहाँ बैठने का विचार त्याग आगे बढ़ गए।

“कोई ठरकी है...आँखें सेंकने का इरादा होगा।’’
यह पुरुरवा का उवाच था। उसमें ताल देती उर्वशी की हुहूहू करती पकौड़ा ठुँसी हँसी सुनाई दी।

पार्क का एक चक्कर पूरा हो चुका था। हम दोबारा भैरव महाराज के वाहन के निकट पहुँच चुके थे। अब उनके साथ उनकी प्रियतमा भी विहार कर रही थीं। वे हमें दोबारा वार्निंग देते उससे पहले हम वापस पलट आए। अब हम अपनी बाँहों को हिलाते हुए तेज-तेज चलने लगे ताकि लगे कि हम व्यायाम करने आए हैं।

उर्वशी और पुरुरवा का पकौड़ा कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। मोबाइल पर कोई गीत बज रहा था। वे दोनों एक-दूसरे में खोये से बैठे थे। हम दोबारा महिलाओं वाली बेंच के निकट पहुँचने वाले थे।

“शनिवार की शाम को हम अक्सर बाहर ही खाते हैं।’’ एक महिला ने उद्घाटित किया।

“और हमारे वाले तो कहते हैं कि एक दिन तो आराम कर लेने दो...सन्डे तो कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।’’ लंबी उसाँस छोड़ते हुए दूसरी महिला बोली।

हमें दूसरी वाली की बात ज्यादा जँची। अब हमारे चलने की रफ़्तार बढ़ गई थी। सामने एक बेंच खाली दिखी लेकिन अब हम पूर्ण रूप से घूमने के मूड में आ चुके थे। पार्क के लगभग सात-आठ चक्कर लगाने के बाद हमने अपनी चाल मंद कर दी। चेहरे को छूती मंद-मंद पुरवाई भली लग रही थी। हम पार्क में थोड़ी देर सुस्ताना चाहते थे लेकिन अब मन जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहता था। हम पार्क से बाहर निकलने का उपक्रम करने लगे। 

और हाँ, घर से जो गुबार लेकर आए थे वह इस समय गुब्बारा बन कहीं और उड़ चला था। आपको दिखे तो पकड़िएगा मत...!

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर और रोचक पोस्ट।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

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  2. मजेदार और रोचक। किसी दिन मिलेंगी आप एक बेचैन आत्मा से।

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " सोमवार 16 सितम्बर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. वाह बहुत सुंदर जैसे कोई चलचित्र या आपबीती सा दृश्य प्रस्तुत करता सुंदर लेख ।

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