रविवार, 17 जुलाई 2016

खुली आँखों से : लघुकथा

उत्तर पुस्तिका में अंग्रेज़ी के कम अंक देखकर रत्ना परेशान हो उठी थी। उसने रोहन की अंग्रेज़ी सुधारने के लिए क्या कुछ नहीं किया। दो-दो ट्यूशन। यहाँ तक कि घर में अंग्रेज़ी का माहौल बना रहे इसलिए उसने हिंदी बोलने, पढ़ने और टीवी पर हिंदी कार्यक्रम देखने पर भी कर्फ्यू लगा रखा था।

आज वार्षिक परीक्षा का रिपोर्टकार्ड मिलना था। वह पति के साथ भारी क़दमों से विद्यालय के ऑडिटोरियम में दाखिल हुई। उसने देखा तमाम अभिभावकों के चेहरे खिले हुए थे।

“काश ! रोहन के भी अंग्रेज़ी में अच्छे अंक आये होते तो हम भी इसी तरह से ख़ुश होते।” रत्ना ने फुसफुसा कर पति से कहा।

“ह्म्म्म '' पति ने मोबाईल पर उंगलियाँ फिराते हुए हामी भरी।

रोहन बगल में सिमटा बैठा था। शायद वह माँ की मनःस्थिति भांप गया था। इसलिए सिर झुकाए कनखियों से अपने साथियों को इधर-उधर भागते देख लेता था। उनके साथ जाकर खेलने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहा था।

समारोह आरम्भ हुआ। सबसे पहले प्रथम, द्वितीय, तृतीय आये विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। उसके बाद विभिन्न विषयों में विशिष्ट योग्यता वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाने लगा।
मंच पर नाम पुकारने का सिलसिला चल रहा था।

“अब एक नाम। जिसने प्रदेश स्‍तरीय हिन्दी कहानी लेखन और चित्र प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करके न केवल विद्यालय का, बल्कि हमारे शहर का भी नाम रोशन किया है।”

पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

“वह नाम है, हर्ष कपूर !”

नाम सुनते ही रत्ना के बगल में बैठे अभिभावक ख़ुशी से उछल पड़े। हर्ष उन्हीं का बेटा था। माँ ने बेटे का माथा चूमा,पिता ने पीठ थपथपाई और पुरस्कार लेने के लिए मंच पर भेज दिया।

रत्ना ने धीरे से उनसे पूछा, ''हर्ष की इंग्लिश कैसी है ?”

“अच्छी है।” हर्ष की माँ ने जवाब दिया।

“उसके मार्क्स...आई मीन अच्छे ही होंगे ?” रत्ना ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा।

“उम्म, एवरेज हैं, लेकिन हिंदी और आर्ट में फ़ुल आये हैं।” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।

“आप इससे सेटिसफाइड हैं ! जबकि ज़माना इंग्लिश का है !” रत्ना ने आश्चर्य व्यक्त किया।

“बिल्कुल, आख़िर इसमें बच्चे का इन्ट्रेस्ट है, हुनर है।” इस बार हर्ष की माँ ने रत्ना की ओर देखते हुए बड़े सहज भाव से जवाब दिया।

“इन्ट्रेस्ट तो रोहन का भी हिंदी राइटिंग में है, लेकिन हमने ही...।” कहते हुए रत्ना की ज़बान बीच में ही लड़खड़ा गई। वह अपराधी सी पति की ओर देखने लगी।

तभी मंच से प्रस्तुत कर्ता की आवाज़ गूँजी।

“और विद्यालय के ही एक और होनहार छात्र ने इसी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार जीता है!...वह है रोहन कुमार !”

नाम सुनते ही रत्ना सन्न रह गई। उसे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था। अनचित्ते ही उसने रोहन को खींचकर सीने से लगा लिया।

रत्ना की आँखें बरबस छलक आईं। उसने मिसेज़ कपूर की ओर देखा, पर कुछ बोल नहीं पाई। मिसेज कपूर ने मन की बात समझते हुए रत्ना का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

तालियों की गड़गड़ाहट फिर गूँज उठी।

मंगलवार, 28 जून 2016

भूख का ईमान

चिलचिलाती धूप। पारा सैंतालिस पार कर चुका था। लगभग नौ-दस साल का एक लड़का थर्मोकोल के बक्से में पानी की थैलियाँ रखकर बेच रहा था। जब भी कोई ऑटो या बस बाईपास पर रूकती तो वह हाथों में थैलियाँ लिए ‘पानी ! पानी !’ की आवाज़ लगाता हुआ उनकी ओर दौड़ पड़ता। लोग पानी की थैलियों के बदले उसकी हथेली पर सिक्का रख देते। वह चहकता हुआ उन सिक्कों को एक डिब्बे में डाल देता। उस समय उसके चेहरे पर अपार संतोष दिखाई देता।

पास में एक छोटा सा मन्दिर था। जहाँ भिखारियों और साधुओं का मजमा लगा था। कुछ लोग उन्‍हें भोजन के पैकेट बाँट रहे थे। कुछ ऑटोवाले, रिक्शेवाले भी उन पैकेटों को लेने के लिए खड़े थे। एक रिक्शेवाला लड़के के पास बैठकर पैकेट से पूरियाँ निकाल कर खा रहा था। वातावरण में ताज़ी पूरियों की सुगंध फैल गई थी। लड़का रिक्शेवाले को एक टक देखे जा रहा था।

“जा के तुमहू लय लेव पाकिट !” रिक्शेवाले ने उसे घुड़का।

“नाह ! अम्मा घरे से रोटी लय के आवत होइहै।” लड़के ने इन्कार करते हुए बताया।

“ढेर सेखी न बघार, अबहिये चुक जाई त मुँह तकिहौ !” रिक्शेवाले ने चेताया।

लड़का उसको अनसुना कर सड़क से नीचे जाती पगडण्डी की ओर उचक-उचक कर देखने लगा। शायद माँ की राह देख रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था कि उससे अब भूख बर्दाश्त नहीं हो रही है। वह रह-रह कर सूखे होठों पर अपनी ज़ुबान फेर लेता था।

तभी एक व्यक्ति पैकेट बाँटते-बाँटते उस लड़के के पास आ गया। उसने लड़के की ओर पैकेट बढ़ाते हुए कहा, “लो बेटा !” बच्चे ने एक क्षण उस पैकेट को देखा। फिर धीरे से इन्कार में सिर हिला दिया।

“ले लो बच्चे, सबने लिया, तुम भी ले लो !” उस व्यक्ति ने प्यार से कहा। पैकेट से आती खाने की सुगंध और भूख से कुलबुलाती आँतों के आगे लड़के ने आखिरकार हार मान ली। लड़के ने हिचकते हुए पैकेट थाम लिया।

वह व्यक्ति लड़के को पैकेट थमा कर धीरे-धीरे अपनी कार की ओर वापस लौट रहा था। लड़के की निगाह उसके पीछे ही लगी थी। अचानक उसने पीछे से पुकारा, “बाउजी !” और बिजली की गति से नीचे झुका। व्‍यक्ति ने देखा थर्मोकोल के बक्से से पानी की दो थैलियाँ निकाल कर लड़का उसकी ओर दौड़ा आ रहा है।



रविवार, 19 जून 2016

कन्धों पर सपने और जोड़-तोड़ के कुछ किस्से, किस्से हर पिता के

उस दिन आँगन में किलकारी गूँजते ही तुम्हें अपने विशाल कन्धों का पहली बार एहसास हुआ था। जब तुमने एक कपड़े में लिपटे नन्हे धड़कते दिल को अपने सीने से पहली बार लगाया था। बरबस ही उसका माथा चूमते हुए तुमने उससे दुनिया की हर ख़ुशी देने का वादा किया था।

शाम को काम से लौटते समय प्यास से हलकान गले को तर करना चाहते थे। लेकिन उस खिलौने की दूकान की तरफ़ तुम्हारे कदम बढ़ गए। जिसे बचपन में कई बार दूर से देखा था तुमने। लेकिन उनको पाना शायद सपनों में ही हुआ था। वो लाल रंग की मोटर, ताली बजाने वाला गुड्डा और ना जाने कितने सपने। लेकिन आज तुम उन सपनों को साकार करना चाहते थे। तुमने अपनी जेब टटोली फिर मुस्कुराते हुए बढ़ गए उन सपनों को लेने।

एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में थैला पकड़े पसीने से लथपथ थे। रिक्शे वाले ने सामने से आवाज़ दी, “कहाँ चलना है बाबूजी !” तुम उसपर बैठना चाहते थे लेकिन तुम्हारी निगाह छोटी साईकिल की दुकान पर पड़ी। तुमने मुस्कुराकर रिक्शेवाले को मना कर दिया। क्योंकि अभी और जोड़ने थे कुछ पैसे उस छोटी साईकिल के सपने को सच करने के लिए।

चलते-चलते कई बार तुम्हारी सैंडल का पट्टा उखड़ जाता था। तुम हर बार उसपर एक कील ठुकवा लेते थे। तुम्हारी सैंडल पर कीलों और सिलाइयों की संख्या बढ़ती जा रही थी। लेकिन तुम खुश थे। आज तुमने अपने बगल में पकड़ रखी थी एक छोटी सी लाल साईकिल और नन्हें स्पोर्ट्स शूज़।

दर्जी से अपनी शर्ट का घिसा कॉलर पलटवा लिया था। स्वेटर की उधड़ी बुनाई ठीक करवा ली थी। तुम बहुत खुश थे क्योंकि तुमने समय से भर दी थी उस स्कूल की फ़ीस। जिसको तुमने बचपन में कई बार बाहर से देखा था। लेकिन अंदर जाना एक सपना था।

तुमने कुछ बहाना बनाकर बंद करवा दिया था रात का दूध। जिसको पिए बिना तुम सो नहीं पाते थे। लेकिन उसके बाद तुम्हारी नींद पहले से और गहरी हो गई थी। क्योंकि तुमने हॉस्टल और कॉलेज के चार्जेज़ का आख़िरी इंस्टालमेंट भर दिया था।

आज तुमको अपने कंधे कुछ हलके लग रहे होंगे। क्योंकि आज तुम महसूस कर रहे हो अपने अंदर के पिता को, अपने पिता को। लेकिन अभी भी तुम सोते-सोते चौंक कर उठ जाते हो। फिर सोचने लगते हो कि कोई ख़ुशी बाकी तो नहीं रह गई। जो उस नन्हें धड़कते दिल को चाहिए।

चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 10 जून 2016

सज़ा :लघुकथा

विद्यालय में वार्षिक परीक्षाएँ चल रहीं थीं। मैं स्टाफ़ रूम में उत्तर पुस्तिकायें जाँच रही थी। कुछ समय बाद पास के कक्ष से सहकर्मी सुमन की ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाज़ आयी। मै सुनने की कोशिश करने लगी किन्तु कुछ स्पष्ट नहीं हुआ। मैं स्टाफ़ रूम से बाहर आ गई। मैंने देखा कि सुमन एक बच्चे का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए प्रधानाचार्य के कार्यालय की ओर जा रही थी। वह बच्चा रोते हुए कुछ कह रहा था। मैने परीक्षा कक्ष में ड्यूटी कर रही एक अन्‍य अध्यापिका से पूछा, “क्या हुआ सीमा ?”

“अरे, वह बच्चा नोटबुक लेकर नक़ल कर रहा था।” मैं थोड़ा परेशान हो उठी। अचानक मेरे कदम प्रधानाचार्य के कार्यालय की ओर बढ़ने लगे। साँसों की रफ़्तार तेज़ होने लगी थी। पचास मीटर का फ़ासला पचास किलोमीटर लगने लगा था।

मस्तिष्क में, कक्षा छह की वार्षिक परीक्षा की घटना चलचित्र की भांति चलने लगी। विज्ञान की परीक्षा थी। मुझे एक चित्र के भागों के नाम नहीं याद हुए थे। मैंने नक़ल के इरादे से अपनी नोट बुक डेस्‍क में रख ली थी। लेकिन उसे देखने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे जो आता था, उसके आधार पर ही प्रश्‍नपत्र हल करती रही। लेकिन किसी लड़की ने नोटबुक रखते देख लिया था। उसने अध्यापिका से शिकायत कर दी। अध्यापिका ने मेरी उत्तर पुस्तिका छीन ली। मुझे सबके सामने बहुत अपमानित किया। मैं चुप थी। क्योंकि खुद को निर्दोष साबित करने का मेरे पास कोई प्रमाण नहीं था। उस अपमान ने मुझे बुरी तरह झिंझोड़ दिया था। उससे उबरने में मुझे खासा समय लगा था।

“क्या एक छोटी सी ग़लती की सज़ा ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी का आत्मविश्वास ही खो जाये। नहीं, अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगी !” मैं लगभग चीख़ उठी।

मैं बिना इजाज़त लिए प्रधानाचार्य के कक्ष के भीतर चली गई। मैंने देखा प्रधानाचार्य उस बच्चे को अपनी बांहों में लेकर बड़े प्यार से समझा रहे थे, “बेटा आपको जो भी, जैसा भी याद आये आप अपनी उत्तर पुस्तिका में लिख दीजिये। हमें वही उत्तर चाहिए जो आप लिखेंगे।''

बच्चे ने हामीं में सिर हिला दिया।

उसकी ही नहीं, मेरी पलकें भी अभी नम थीं, लेकिन हम दोनों के होठों पर मुस्कान खिल आई थी।




रविवार, 29 मई 2016

एक पाती विद्यार्थियों के नाम


प्यारे बच्चों,


**

ये पत्र उन सभी बच्चों के नाम है जो मेरे विद्यार्थी हैं और रहे हैं। ये पत्र उन बच्चों के भी नाम है, जिन्होंने मुझसे पढ़ा तो नहीं किन्तु वे किसी न किसी विद्यालय के विद्यार्थी हैं।


बोर्ड के परीक्षा परिणाम घोषित किये जा रहे हैं। कुछ के घोषित हो गए हैं और कुछ के अभी होने बाक़ी हैं। सबसे पहले जो बच्चे परीक्षा में सम्मिलित हुए उन सभी को ढेर सारी शुभकामनाएँ।


शुभकामनाएँ इसलिए क्योंकि मेरा मानना है कि किसी भी परीक्षा में सम्मिलित होना भी अपने आप में एक तरह का सीखना है। कुछ भी अच्छा सीखना अच्छी बात होती है। और हर अच्छी बात के लिए शुभकामनाएँ तो दी ही जाती हैं ना।


परीक्षा का फ़ार्म भरने से लेकर परीक्षा कक्ष में बैठकर परीक्षा देने तक अनेकों बातें सीखने को मिलती हैं। तुमने महसूस किया होगा कि जितनी भी बातें परीक्षा देने के दौरान सीखीं उनमें से कोई भी बात, न किसी कक्षा में बताई गई और न ही किसी पुस्तक में पढ़ाई गई। वहाँ जो कुछ भी तुमने सीखा अपने अनुभवों से सीखा।


वास्तव में इन्हीं अनुभवों द्वारा सीखने को ही वास्तविक ज्ञान कहते हैं। मैं ये नहीं कह रही कि विद्यालयों मे दी जाने वाली शिक्षाओं से ज्ञान प्राप्त नहीं होता। वहाँ से भी ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन सम्पूर्ण नहीं। जो शिक्षा तुम विद्यालय में प्राप्त कर रहे हो वो औपचारिक शिक्षा है। वहाँ किसी विषय विशेष की ही शिक्षा प्राप्त की जा सकती है जिसका जीवन में योगदान मात्र बीस प्रतिशत (20%) बल्कि उससे भी कम ही है। बाक़ी की अस्सी प्रतिशत (80%) शिक्षा हम अपने रोज़ाना के अनुभवों से प्राप्त करते हैं।


याद रखो, यही अस्सी प्रतिशत वाली शिक्षा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो जीवन में सबसे अधिक काम आती है। जिसके लिए न किसी विद्यालय में जाना होता है, न कोई पुस्तक पढ़नी होती है और न ही इसका कोई परीक्षा परिणाम घोषित होता है।


तो बच्चों, जब वो 80% वाली शिक्षा, जिसका हमारे जीवन में सबसे अधिक महत्व है उसे पाकर ख़ुश होना चाहिए ना। बाक़ी की 20% प्रतिशत वाली शिक्षा के परीक्षा परिणाम चाहे जो भी आये, उसके लिए निराश क्यों होना। अंक कम हों या अधिक कुछ समय बाद याद भी नहीं रहते। वे केवल रिपोर्ट कार्ड में ही चिपके रह जाते हैं। इनका जीवन में कोई महत्व नहीं।


मैं स्वयं जो भी हूँ अपने अनुभव और प्रयास से हूँ न कि विद्यालयी शिक्षा से। तुम्हें बताऊं कक्षा 3 के बाद मेरे कभी अच्छे अंक नहीं आये। रिपोर्ट कार्ड लाल निशानों से भरा रहता था। 12 वीं और ग्रेजुएशन में एक-एक बार असफल भी रही। लेकिन इन सबके बावजूद जो भी हूँ तुमने मुझसे पढ़ते हुए देखा-सुना ही है।

बच्चों, याद रखो, महत्व उस शिक्षा का है जिसे तुम अपने अनुभव से प्राप्त कर रहे हो और जीवन भर करते ही रहोगे, बिना विद्यालय, बिना परीक्षा, जिसमें सफलता मिलनी ही मिलनी है। यही ज्ञान तुम्हारी पहचान बनेंगा। जो अनोखी होगी। सबसे अलग।


हुनर है तुममें एक अलग सूरज बनने का, जो उगता है पर कभी अस्त नहीं होता।


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सस्नेह, शिक्षिका के रूप में, हमेशा एक दोस्त, अर्चना।



बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

पारुल :लघुकथा

अक्सर सुबह-सुबह नन्हीं पारुल, अपनी बहन पिंकी के साथ आ जाती। पिंकी बर्तन धोती, झाड़ू-पोछा करती। पारुल मुझसे बतियाती। कभी कॉलोनी के किस्से तो कभी अपने भाई-बहनों की बातें। सात-आठ साल की उम्र और दुनियादारी की बातें, जैसे दादी-अम्मा हो। एक लगाव सा हो गया था उससे।

पिंकी को बेटी हुई तो उसने दो महीने की छुट्टी ले ली। अब पारुल भी नहीं आती थी। सुबह-सवेरे उसकी भोली बातें सुनने की आदत सी हो गई थी। अब सूना-सूना सा लगता था। एक सुबह पारुल अपनी माँ के साथ गेट पर खड़ी थी। मैंने जल्दी से गेट खोला और प्यार से पूछा, “पारुल, दीदी नहीं आती तो तुमने भी आना बंद कर दिया, क्यों !” वह मुस्कुरा कर अपनी माँ की ओर देखने लगी।

“बिटिया, जबलेक पिंकी न अइहे तबलेक पारुल के काम पे धई लेव।” गेट पर खड़े-खड़े ही पारुल की माँ बोली।

“पारुल को काम पर रख लूँ ! ये तो बहुत छोटी है !” मैंने पारुल की ओर देखते हुए कहा।

“अरे बिटिया, ई कुल काम कई लेत है, एतनी छोट नाही बा।”

“नहीं, मैं इतनी छोटी बच्ची से काम नहीं करवाउँगी !”

“बिटिया, पेटे के आग छोट बड़ नाई देखत। तू काम न करवईहो तो कहूँ और करे के परी, लड़की जात कहूँ कुछ ऊँच-नीच होई जाय तो...।” कहते हुए वह चली गई और पीछे-पीछे पारुल भी।

अपने रोजमर्रा के काम निपटाकर मैं ऑफिस चली गई। सारे दिन मन खिन्न सा रहा। रह-रहकर पारुल का चेहरा और उसकी माँ की बात दिमाग में घूमती रही। शाम को घर वापसी के लिए मैं बस में बैठी। खिड़की से सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं। चौराहे पर सिग्नल पर बस रुकी तो मेरी आँख खुल गई।

शोर से ध्यान पास के पार्क की ओर चला गया। उसके बाहर भीड़ जमा थी। मैंने गर्दन उचकाकर बाहर झाँका। दृश्‍य देखकर मेरा माथा घूम गया। सामने दो बाँसों के बीच बंधी रस्सी पर हाथ में डंडा लिए पारुल खड़ी थी। “पाss रुss लss !” मेरी चीख निकल गई। मैं हड़बड़ाकर बस के गेट पर आ गई। वहाँ से उसका चेहरा साफ दिख रहा था। पर वह पारुल नहीं कोई और बच्ची थी।

मेरा सारा शरीर पसीने से नहा गया था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। बस चल पड़ी थी। मैंने लंबी साँस ली। मैंने फैसला किया कि पारुल को काम पर रख लूँगी। भले ही मैं उससे काम न करवाऊँ। दो महीने की ही तो बात है।
मन कुछ शांत हुआ। लेकिन अब उस रस्सी पर चढ़ी बच्ची का चेहरा आँखों में नाचने लगा। 
जैसे वह पूछ रही हो, “पारुल तो सुरक्षित हो गई लेकिन मैं.....?”



शनिवार, 26 दिसंबर 2015

'गुड मॉर्निंग' : लघुकथा

कोई भी मौसम हो, भोर के ठीक 5:00 बजे नहीं कि रमानाथ जी के योगासन की चटाई पार्क में बिछ जाती। मजाल है जो कभी घड़ी की सुई एक सेंकेड भी आगे गई हो। फिर पूरे घंटे भर तक उनका योग कार्यक्रम चलता। उसके बाद वे पार्क के कोने में बनी बेंचों पर विराजमान हमउम्र साथियों के साथ पंद्रह मिनट हाहा-हुहू करते। और फिर खरामां-खरामां घर की ओर रवाना हो जाते थे।

कॉलोनी में दो रमानाथ थे और दोनों के उपनाम भी एक ही थे। इसीलिए इन महाशय को सब ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ कहकर पुकारने लगे। समय ने अपने कदम आगे बढ़ाए ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ सेवानिवृत हो गए। लगभग दो-तीन साल तक उनकी पाँच बजे की योगासन वाली प्रक्रिया निर्बाध चली, फिर धीरे-धीरे उनका पार्क में आना कम होता गया। और इधर तो वे साल भर से पार्क में दिखाई ही नहीं दिए।

आज सुबह-सुबह उनके घर से आवाज़ सुनाई दी, “माघ उतरने को है, और एक आप हैं कि अभी भी रजाई में पड़े हुए हैं।“ पत्नी ने ताना कसा।

“तो अब एक रिटायर्ड आदमी इस उम्र में और क्या करे, क्या रंगबिरंगी शर्ट पहन सड़कों पर सीटी बजाए?“ रमानाथ जी ने भी पलटवार किया।

“अरे, तो पहले की तरह कम से कम थोड़ी देर पार्क में ही चले जाया करो, शरीर को थोड़ी हरकत तो मिल जाएगी।“ पत्नी ने कहा।

“नहीं-नहीं...बहुत ठण्ड है !” रमानाथ जी ने रजाई में दुबकते हुए जवाब दिया।
“तो गर्मी में ही कौन-सा जा रहे थे।“ पत्नी ने उलाहना दिया।

हारकर रमानाथ जी मुर्दनी आवाज़ में बोले, “अच्छा...तुम कहती हो तो चले जाते हैं, लाओ छड़ी, टोपी, मफ़लर दो।’’ इस तरह आज रमानाथ जी स्वेटर के ऊपर लम्बा कोट डाले, हाथों में दस्ताने, सिर पर मंकी कैप, उसके ऊपर मफ़लर लपेटे, पैरों में ऊनी ज़ुराबें चढ़ाए, छड़ी ठुक-ठुकाते हुए पार्क के लिए रवाना हुए।

अच्छी धूप खिली थी। सर्दी भी कुछ ख़ास नहीं थी। रविवार होने से पार्क में चहल-पहल भी कुछ अधिक थी। रमानाथ जी एक बेंच पर जा बैठे। उनकी नजरें पार्क के चारो कोनों को टटोलती हुई सामने खेल रहे बच्चों पर टिक गईं।

थोड़ी देर बाद एक युवती जॉगिंग करते हुए आई और उनकी बगल वाली बेंच पर बैठ गई। रमानाथ जी ने कनखियों से उसे देखा। युवती ने अपने जूते-मोज़े उतारकर किनारे रख दिए और बेंच पर पाँव मोड़कर ध्यान की मुद्रा में बैठ गई। थोड़ी देर बाद रमानाथ जी की नज़र उस पर फिर पड़ी तो उन्होंने भी अपने जूते उतार दिए और पाँव मोड़कर बैठ गए।

लगभग दस मिनट ध्यान करने के बाद युवती ने अपनी आँखें खोलीं। अपने पैरों को सीधा कर पंजे हिलाते हुए उसने रमानाथ जी की ओर देखा। उन्होंने भी दस्तानें और ऊनी ज़ुराबें उतार दीं और पैरों को सीधाकर पंजों को हिलाने लगे। अब युवती अपना जैकेट उतारकर अपनी दोनों बाहें सामने करके कलाई घुमा रही थी। उसने रमानाथ जी को देखा और मुस्कुरा दी।

धूप तेज होने लगी थी। उन्होंने अपने मफ़लर को सिर से उतारकर गर्दन में लपेट लिया। उनकी नजर उस युवती की तरफ गई। वह उनकी ओर देखते हुए अब भी मुस्कुरा रही थी। यह देख रमानाथ जी भी थोड़ा मुस्कुरा दिए। उसने रमानाथ जी के सिर की ओर इशारा कर टोपी उतारने को कहा। रमानाथ जी पहले तो अचकचाए फिर उन्होंने टोपी उतार दी, लेकिन मफ़लर को सिर से कान तक लपेट लिया। युवती ने मुँह बनाते हुए मफ़लर भी उतारने के लिए इशारा किया। रमानाथ जी ने जैसे उसके इशारे को अनदेखा करते हुए अपनी गर्दन दूसरी ओर फेर ली। फिर न जाने क्या सोच उन्होंने मफ़लर उतारा और कनखियों से युवती की ओर देखा। युवती ने अपने अंगूठे और तर्जनी को मिलाते हुए गोला बनाकर इशारा किया और एक आँख दबाते हुए मुस्कुरा दी। रमानाथ जी पहले तो कुछ असहज हुए लेकिन फिर जोर से हो-हो कर हँस दिए।

युवती उठी, अपना जैकेट कंधे पर डाला और उनके निकट आकर बोली, “खुल्ली हवा और हँसी हेल्थ विच गुड होंदीये, होर आप तो इन्ने हेण्डसम हो, बुड्ढों जैसे कपड़े क्यों पेने ओ?” युवती ने उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और खिलखिलाती हुई पार्क से निकल गई।

रमानाथ जी उसे जाता देखते रहे, जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गई। फिर वे झटके से खड़े हुए, छड़ी एक ओर फेंकी, कोट उतारकर बेंच पर रखा और पार्क में टहलने लगे। धीरे-धीरे उनकी गति बढ़ने लगी।
तभी बच्चों का समवेत स्वर गूँजा, “गुड मॉर्निंग अंकल !” रमानाथ जी हाथ हिलाते हुए तेज़ी से उस ओर बढ़ गए।
अब पिछले कुछ दिनों से बच्चों द्वारा दिया गया उनका नया नाम ‘गुड मॉर्निंग अंकल’ भी पहले वाले नाम की तरह ही लोकप्रिय हो गया है।

चित्र गूगल से साभार