
बरखा के मौसम में जब
बादल घिर-घिर आता है
ठंडी हवाओं के झोंकों से
आँचल उड़-उड़ जाता है
नन्हीं चंचल बूंदों का जब
धरती पर रेला आता है
तन निर्मल धारों को पकड़
आसमान चढ़ जाता है
आसमान में रंगों का जब
सतरंगी मेला आता है
इन्द्रधनुष के झूलों में चढ़
मन ऊँचे पेंग लगाता है
बरखा की टिप-टिप जब
सुर मधुर गुंजाता है
हर मुख मस्ती में आकर
मेघ-मल्हार गुनगुनाता है