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बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी !


 हिंदी ! तेरी अजब कहानी

तू हिंद महासागर 
फिर भी 
हम भरते दूसरों का पानी 

गुलामी की भाषा बोले जो 
सिर को  ऊँचा  करके चलते 
हिंदी भाषा के ज्ञानी जन 
क्यों 
आँखें अपनी नीची रखते
 देख विडम्बना ऐसी 
आए नयनों में पानी 

 हिंदी ! तेरी अजब कहानी 
तू हिंद महासागर 
फिर भी 
हम भरते दूसरों का पानी 

विद्या के आँगन में 
करके  तेरा नित अपमान 
और
पराई भाषा का 
करते सब गुणगान 
बीते साल आज़ादी के 
फिर भी 
तू बन ना सकी देश की रानी 

 हिंदी ! तेरी अजब कहानी 
तू हिंद महासागर 
फिर भी 
हम भरते दूसरों का पानी 


बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

जीवन के रंग


आते जाते कितने मौसम
रंग बदलते रहते हरदम
कभी गर्मी के तीखे तेवर
कभी सर्दी की धूप मद्धम
कभी बरखा की झिर-झिर बूँदें
छेड़ रही हों जैसे सरगम

आते जाते कितने मौसम
रंग बदलते रहते हरदम

कभी कठिनाई की आंधी आए 
कभी आशाओं की किरणें चम-चम
कभी दुःख के बादल छाए
कभी खुशियों की बरखा छम-छम
धूप-छाँव, बदली, बरखा
सुख-दुःख, आंसू, खुशियाँ
जाने कितने बदले मौसम
जीवन भी कुछ ऐसा ही है
रूप बदलते इसके हरदम

आते जाते कितने मौसम
रंग बदलते रहते हरदम


(चित्र  गूगल   सर्च  से साभार )

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

प्रथम उड़ान






एक गौरैया नन्ही सी
नीड़ से निकली पहली बार
नील गगन को छूने की
चाह ह्रदय में लेकर आज
फुदक रही है डाली-डाली
पंख फैलाए पहली बार

एक गौरैया नन्ही सी
नीड़ से निकली पहली बार

 बलशाली खग नभ में उड़ते 
 तेज चले पवन उनचास
खोल रही दुर्बल-कोमल पर
ह्रदय में लिए भय और आस
देखे गगन विशाल विस्तार

एक गौरैया नन्ही सी
नीड़ से निकली पहली बार

शीर्ष चढ़ी ऊँचे द्रुम के
नभ पर उड़ान भरने आज
कभी गिरते और सँभलते
लगन लिए और दृढ़ विश्वास
उड़ गई नील अम्बर में आज
पंख फैलाए पहली बार

एक गौरैया नन्ही सी
नीड़ से निकली पहली बार



(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 23 जून 2010

सृजन रुका नहीं करता है...



चाहे जितने झंझा आये
पर्वत डिगा नहीं करता है
जीवन  की कठिन परीक्षा  से
कर्मठ  हटा नहीं करता है

 एक कलम जो जाए टूट 

सृजन रुका नहीं करता है
कुछ पन्नों के फट  जाने से

लेख मिटा नहीं करता है 

दुःख के जब भी बदल छाए 
तब-तब  सुख की वर्षा लाये
काँटों की संगत पाकर भी 
गुलाब मुस्काया ही  करता है 

 तीखी गाली सुनकर  भी
सज्जन बुरा नहीं करता है 
कितने ही विषधर लिपटे हों
चन्दन मरा नहीं करता है 
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 4 जुलाई 2009

सावन के सुर मधुर सुन.....

अभी सावन आनें में चार दिन बाकी हैं, परन्तु जब वर्षा ऋतु आती है तो सावन के झूलों की याद बरबस हो आती है, सारा आलम मस्ती में गुनगुनानें लगता है.....................................





आया
मस्त मतवाला सावन
फुहारों की रिमझिम
बूंदों की गुनगुन
बरखा के सुर सुनाता मनभावन
आया मस्त मतवाला सावन

झर-झर झरती बूंदों की लड़ियाँ
पुलकित होती फूलों की पंखुडियाँ
उमड़-घुमड़ मेघों की गर्जन
वन-वन गुंजित मयूरों का क्रंदन

भर गए ताल-तलैये उपवन
आया मस्त मतवाला सावन

पड़ती फुहार झूलों पर जब-जब
सजे मेघ-मल्हार होठों पर तब-तब
झूमें तरुओं की शाखें चंचल
छनके पत्तों की पायल छन-छन

करते ता-ता धिन-धिन तरु गन
आया मस्त मतवाला सावन

आसमान के इन्द्रधनुषी रंगों का चोला
धारा ने अपने हरियाले आँचल को खोला
बिखरी बेल-बूटों की मतवाली लताएँ
निखरी हर पत्तों की हरियाली आभाएँ

गदराए हर सिंगार चंपा के उपवन
आया मस्त मतवाला सावन

पड़ती जब वारि की धारें कोमल तन
कण-कण की पुलकावलि करे निर्मल मन
दादुर टर-टर झींगुर तुन- तुन
बरखा की लय में गाए सुमधुर धुन

आया मस्त मतवाला सावन


रविवार, 28 जून 2009

पहली बारिश.....


बरखा के मौसम में जब
बादल घिर-घिर आता है
ठंडी हवाओं के झोंकों से
आँचल उड़-उड़ जाता है

नन्हीं चंचल बूंदों का जब
धरती पर रेला आता है
तन निर्मल धारों को पकड़
आसमान चढ़ जाता है

आसमान में रंगों का जब
सतरंगी मेला आता है
इन्द्रधनुष के झूलों में चढ़
मन ऊँचे पेंग लगाता है

बरखा की टिप-टिप जब
सुर मधुर गुंजाता है
हर मुख मस्ती में आकर
मेघ-मल्हार गुनगुनाता है


शनिवार, 30 मई 2009

तुलना


खिला फूल मदार का एक

मंदिर में हुई गुलाब से भेंट

बोला मदार गुलाब से नेक

होता तुमसे है अभिषेक

राजा हो या देवता अनेक

माली भी तुमको रखता है सहेज

तुमसे करें प्रदर्शन अपना प्रेम

प्रेमी युगल हों या दोस्त विशेष

महके चमन तुमसे हर एक

गुलाब तुम हो अति विशेष

नहीं ठिकाना मेरा एक

देते मुझको उखाड़ के फ़ेंक

भटकता रहता हूँ पथ पे अनेक

लिए निराशा मन में समेट

हुई मेरी प्रेम से भेंट

ली गुलाब ने फिर अंगड़ाई

बोला मदार से मेरे भाई

नहीं है जीवन कोई व्यर्थ

जिसका हो कोई अर्थ

प्रकृति ने की जो रचना अपनी

सबकी है विशेषता अपनी

तुम अपनी पहचान बनाओ

जीवन में कुछ नाम कमाओ

चढ़ते तुम हो उनके शीश

जो हैं सभी ईशों के ईश

तुमसे करते हैं उनका श्रंगार

फूल हो तुम भी विशेष मदार

करो तुम किसी से तुलना

ढूंढो तुम भी वजूद अपना

जीवन में जिनके सुख होता है

काँटों पे उनको भी चलना होता है

मार्ग चिकने फिसलन लाते हैं

पथरीले मंजिल को पाते हैं

दो तुम अपने को दोष

भरो जीवन में उमंग और जोश

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

छाँव


विशाल पीपल की छाँव

देती है सबको ठाँव

खड़ा रहता है धूप में

सदा अटल रूप में

सदा रहती है जीवन की लहर

कोमल पत्तियों में ठहर

रहती है शाखों पे उमंग

हवाओं से पाकर तरंग

देती है जीवन की आशा

दूर करके सबकी निराशा

पाते हैं नीचे इसके

ज्ञान ध्यान अंतर्मन

रविवार, 19 अप्रैल 2009

अकेलापन....


आकाश ने कहा एक दिन

धरती पे उगे नन्हे पौधे से

गर होता मैं भी धरती पे

तो होता करीब अपनों के

यहाँ रहता हूँ अकेले

तुम खुश किस्मत हो

पौधे ने कहा आकाश से

ग़म करो अपने अकेलेपन पे

जो होतें हैं दूर अपनों से

देते हैं छाया सबको

वो नहीं अकेले इस जहाँ में

होता है सारा जहाँ उनका अपना

रविवार, 17 फ़रवरी 2008

पुकार

रे मानव ! उठ जाग निद्रा से
देख कराह रही ये धरा तेरी
पुकार रही ये माँ तेरी
उठ जा अब तो ओ मेरे लाल-नंदन

घायल करते लूटते इसका यौवन
चुन रहे पत्थरों में इसके
सुंदर, विशाल और कोमल तन
उसके हरियाले वसन का करते
चीर-हरण
कुछ दुःशासन -दुर्योधन
जो करते नाश इस धरनी का चैन-अमन
बन जा तू कृष्ण चला अब चक्र सुदर्शन

यदि अब न जागा तू तो जायेंगे चले
ये तेरी खुशहाली के दिन
फ़िर ना ले सकेगा
क्षण भर सुवास और दम



रविवार, 20 जनवरी 2008

लक्ष्य



मैंने देखा सुबह-सुबह


अपनी नन्ही सी बगिया में

नन्हें से पौधे पर

एक नन्हा सा फूल मुस्कुराता

समां रखा था अपने अन्दर

अनेक रंग, खुशियाँ और मुस्कान

नन्हें जीवन-काल में भी

गम न था मिट जाने का

वह नन्हा सा कोमल

सिखा रहा था हमें

रखना लक्ष्य जीवन का

बिखेरना मुस्कान सदा

हाय रे! हिन्दी.... अपने देश में हमारी राष्ट्र-भाषा का जो हाल देखा तो मेरा अंतर्मन रो पड़ा अपनी उसी भावना को मैं यहाँ व्यक्त कर रही हूँ




हाय रे! हिंदी तू अपनों में ही पराई हुई......

तेरे देश में तेरे ही अपने तुझे बोलने पर शर्माते हैं

तुझे बोलने पर तेरे अपनों पर जुर्माना लगता है

तेरे नौनिहाल तुझे बोलने पर अपराधी बनते हैं

तुझे बोलने वाले जीविका के लिए भटकते
हैं

क्यों किया तुझे पराया अपनों ने

तू महासागर है हिंद
का

फिर भीहम दूसरों का पानी क्यों भरते हैं

हाय रे! हिंदी तू ........