रविवार, 28 जून 2009

पहली बारिश.....


बरखा के मौसम में जब
बादल घिर-घिर आता है
ठंडी हवाओं के झोंकों से
आँचल उड़-उड़ जाता है

नन्हीं चंचल बूंदों का जब
धरती पर रेला आता है
तन निर्मल धारों को पकड़
आसमान चढ़ जाता है

आसमान में रंगों का जब
सतरंगी मेला आता है
इन्द्रधनुष के झूलों में चढ़
मन ऊँचे पेंग लगाता है

बरखा की टिप-टिप जब
सुर मधुर गुंजाता है
हर मुख मस्ती में आकर
मेघ-मल्हार गुनगुनाता है


10 टिप्‍पणियां:

  1. waah ! bahut accha laga padkar...
    bahut accha likhte hain aap....
    aapne apne bhavon se alag hi rang bhar diya rachna main......

    pata hai aaj maine bhi is masti bhari barish par likha hai.....
    dekhiyega ummid hai aapko pasand aayegi.....
    man-darpan par.....

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  2. वाह,बहुत सुन्दर! वर्षा में बिल्कुल ऐसा ही होता है।
    घुघूती बासूती

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  3. अभी जब मै आपकी सुन्दर कविता पढ रहा हू यहा दिल्ली मे बादल आ गये है. शायद वर्षा होगी. कही यह किसी के आंचल उडने के कारण तो नही है?
    बहुत सुन्दर रचना

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  4. बरखा का सुन्दर काव्यात्मक स्वागत पसंद आया.

    बधाई स्वीकार करें.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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