शुक्रवार, 10 जून 2016

सज़ा :लघुकथा

विद्यालय में वार्षिक परीक्षाएँ चल रहीं थीं। मैं स्टाफ़ रूम में उत्तर पुस्तिकायें जाँच रही थी। कुछ समय बाद पास के कक्ष से सहकर्मी सुमन की ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाज़ आयी। मै सुनने की कोशिश करने लगी किन्तु कुछ स्पष्ट नहीं हुआ। मैं स्टाफ़ रूम से बाहर आ गई। मैंने देखा कि सुमन एक बच्चे का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए प्रधानाचार्य के कार्यालय की ओर जा रही थी। वह बच्चा रोते हुए कुछ कह रहा था। मैने परीक्षा कक्ष में ड्यूटी कर रही एक अन्‍य अध्यापिका से पूछा, “क्या हुआ सीमा ?”

“अरे, वह बच्चा नोटबुक लेकर नक़ल कर रहा था।” मैं थोड़ा परेशान हो उठी। अचानक मेरे कदम प्रधानाचार्य के कार्यालय की ओर बढ़ने लगे। साँसों की रफ़्तार तेज़ होने लगी थी। पचास मीटर का फ़ासला पचास किलोमीटर लगने लगा था।

मस्तिष्क में, कक्षा छह की वार्षिक परीक्षा की घटना चलचित्र की भांति चलने लगी। विज्ञान की परीक्षा थी। मुझे एक चित्र के भागों के नाम नहीं याद हुए थे। मैंने नक़ल के इरादे से अपनी नोट बुक डेस्‍क में रख ली थी। लेकिन उसे देखने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे जो आता था, उसके आधार पर ही प्रश्‍नपत्र हल करती रही। लेकिन किसी लड़की ने नोटबुक रखते देख लिया था। उसने अध्यापिका से शिकायत कर दी। अध्यापिका ने मेरी उत्तर पुस्तिका छीन ली। मुझे सबके सामने बहुत अपमानित किया। मैं चुप थी। क्योंकि खुद को निर्दोष साबित करने का मेरे पास कोई प्रमाण नहीं था। उस अपमान ने मुझे बुरी तरह झिंझोड़ दिया था। उससे उबरने में मुझे खासा समय लगा था।

“क्या एक छोटी सी ग़लती की सज़ा ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी का आत्मविश्वास ही खो जाये। नहीं, अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगी !” मैं लगभग चीख़ उठी।

मैं बिना इजाज़त लिए प्रधानाचार्य के कक्ष के भीतर चली गई। मैंने देखा प्रधानाचार्य उस बच्चे को अपनी बांहों में लेकर बड़े प्यार से समझा रहे थे, “बेटा आपको जो भी, जैसा भी याद आये आप अपनी उत्तर पुस्तिका में लिख दीजिये। हमें वही उत्तर चाहिए जो आप लिखेंगे।''

बच्चे ने हामीं में सिर हिला दिया।

उसकी ही नहीं, मेरी पलकें भी अभी नम थीं, लेकिन हम दोनों के होठों पर मुस्कान खिल आई थी।




रविवार, 29 मई 2016

एक पाती विद्यार्थियों के नाम


प्यारे बच्चों,


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ये पत्र उन सभी बच्चों के नाम है जो मेरे विद्यार्थी हैं और रहे हैं। ये पत्र उन बच्चों के भी नाम है, जिन्होंने मुझसे पढ़ा तो नहीं किन्तु वे किसी न किसी विद्यालय के विद्यार्थी हैं।


बोर्ड के परीक्षा परिणाम घोषित किये जा रहे हैं। कुछ के घोषित हो गए हैं और कुछ के अभी होने बाक़ी हैं। सबसे पहले जो बच्चे परीक्षा में सम्मिलित हुए उन सभी को ढेर सारी शुभकामनाएँ।


शुभकामनाएँ इसलिए क्योंकि मेरा मानना है कि किसी भी परीक्षा में सम्मिलित होना भी अपने आप में एक तरह का सीखना है। कुछ भी अच्छा सीखना अच्छी बात होती है। और हर अच्छी बात के लिए शुभकामनाएँ तो दी ही जाती हैं ना।


परीक्षा का फ़ार्म भरने से लेकर परीक्षा कक्ष में बैठकर परीक्षा देने तक अनेकों बातें सीखने को मिलती हैं। तुमने महसूस किया होगा कि जितनी भी बातें परीक्षा देने के दौरान सीखीं उनमें से कोई भी बात, न किसी कक्षा में बताई गई और न ही किसी पुस्तक में पढ़ाई गई। वहाँ जो कुछ भी तुमने सीखा अपने अनुभवों से सीखा।


वास्तव में इन्हीं अनुभवों द्वारा सीखने को ही वास्तविक ज्ञान कहते हैं। मैं ये नहीं कह रही कि विद्यालयों मे दी जाने वाली शिक्षाओं से ज्ञान प्राप्त नहीं होता। वहाँ से भी ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन सम्पूर्ण नहीं। जो शिक्षा तुम विद्यालय में प्राप्त कर रहे हो वो औपचारिक शिक्षा है। वहाँ किसी विषय विशेष की ही शिक्षा प्राप्त की जा सकती है जिसका जीवन में योगदान मात्र बीस प्रतिशत (20%) बल्कि उससे भी कम ही है। बाक़ी की अस्सी प्रतिशत (80%) शिक्षा हम अपने रोज़ाना के अनुभवों से प्राप्त करते हैं।


याद रखो, यही अस्सी प्रतिशत वाली शिक्षा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो जीवन में सबसे अधिक काम आती है। जिसके लिए न किसी विद्यालय में जाना होता है, न कोई पुस्तक पढ़नी होती है और न ही इसका कोई परीक्षा परिणाम घोषित होता है।


तो बच्चों, जब वो 80% वाली शिक्षा, जिसका हमारे जीवन में सबसे अधिक महत्व है उसे पाकर ख़ुश होना चाहिए ना। बाक़ी की 20% प्रतिशत वाली शिक्षा के परीक्षा परिणाम चाहे जो भी आये, उसके लिए निराश क्यों होना। अंक कम हों या अधिक कुछ समय बाद याद भी नहीं रहते। वे केवल रिपोर्ट कार्ड में ही चिपके रह जाते हैं। इनका जीवन में कोई महत्व नहीं।


मैं स्वयं जो भी हूँ अपने अनुभव और प्रयास से हूँ न कि विद्यालयी शिक्षा से। तुम्हें बताऊं कक्षा 3 के बाद मेरे कभी अच्छे अंक नहीं आये। रिपोर्ट कार्ड लाल निशानों से भरा रहता था। 12 वीं और ग्रेजुएशन में एक-एक बार असफल भी रही। लेकिन इन सबके बावजूद जो भी हूँ तुमने मुझसे पढ़ते हुए देखा-सुना ही है।

बच्चों, याद रखो, महत्व उस शिक्षा का है जिसे तुम अपने अनुभव से प्राप्त कर रहे हो और जीवन भर करते ही रहोगे, बिना विद्यालय, बिना परीक्षा, जिसमें सफलता मिलनी ही मिलनी है। यही ज्ञान तुम्हारी पहचान बनेंगा। जो अनोखी होगी। सबसे अलग।


हुनर है तुममें एक अलग सूरज बनने का, जो उगता है पर कभी अस्त नहीं होता।


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सस्नेह, शिक्षिका के रूप में, हमेशा एक दोस्त, अर्चना।



बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

पारुल :लघुकथा

अक्सर सुबह-सुबह नन्हीं पारुल, अपनी बहन पिंकी के साथ आ जाती। पिंकी बर्तन धोती, झाड़ू-पोछा करती। पारुल मुझसे बतियाती। कभी कॉलोनी के किस्से तो कभी अपने भाई-बहनों की बातें। सात-आठ साल की उम्र और दुनियादारी की बातें, जैसे दादी-अम्मा हो। एक लगाव सा हो गया था उससे।

पिंकी को बेटी हुई तो उसने दो महीने की छुट्टी ले ली। अब पारुल भी नहीं आती थी। सुबह-सवेरे उसकी भोली बातें सुनने की आदत सी हो गई थी। अब सूना-सूना सा लगता था। एक सुबह पारुल अपनी माँ के साथ गेट पर खड़ी थी। मैंने जल्दी से गेट खोला और प्यार से पूछा, “पारुल, दीदी नहीं आती तो तुमने भी आना बंद कर दिया, क्यों !” वह मुस्कुरा कर अपनी माँ की ओर देखने लगी।

“बिटिया, जबलेक पिंकी न अइहे तबलेक पारुल के काम पे धई लेव।” गेट पर खड़े-खड़े ही पारुल की माँ बोली।

“पारुल को काम पर रख लूँ ! ये तो बहुत छोटी है !” मैंने पारुल की ओर देखते हुए कहा।

“अरे बिटिया, ई कुल काम कई लेत है, एतनी छोट नाही बा।”

“नहीं, मैं इतनी छोटी बच्ची से काम नहीं करवाउँगी !”

“बिटिया, पेटे के आग छोट बड़ नाई देखत। तू काम न करवईहो तो कहूँ और करे के परी, लड़की जात कहूँ कुछ ऊँच-नीच होई जाय तो...।” कहते हुए वह चली गई और पीछे-पीछे पारुल भी।

अपने रोजमर्रा के काम निपटाकर मैं ऑफिस चली गई। सारे दिन मन खिन्न सा रहा। रह-रहकर पारुल का चेहरा और उसकी माँ की बात दिमाग में घूमती रही। शाम को घर वापसी के लिए मैं बस में बैठी। खिड़की से सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं। चौराहे पर सिग्नल पर बस रुकी तो मेरी आँख खुल गई।

शोर से ध्यान पास के पार्क की ओर चला गया। उसके बाहर भीड़ जमा थी। मैंने गर्दन उचकाकर बाहर झाँका। दृश्‍य देखकर मेरा माथा घूम गया। सामने दो बाँसों के बीच बंधी रस्सी पर हाथ में डंडा लिए पारुल खड़ी थी। “पाss रुss लss !” मेरी चीख निकल गई। मैं हड़बड़ाकर बस के गेट पर आ गई। वहाँ से उसका चेहरा साफ दिख रहा था। पर वह पारुल नहीं कोई और बच्ची थी।

मेरा सारा शरीर पसीने से नहा गया था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। बस चल पड़ी थी। मैंने लंबी साँस ली। मैंने फैसला किया कि पारुल को काम पर रख लूँगी। भले ही मैं उससे काम न करवाऊँ। दो महीने की ही तो बात है।
मन कुछ शांत हुआ। लेकिन अब उस रस्सी पर चढ़ी बच्ची का चेहरा आँखों में नाचने लगा। 
जैसे वह पूछ रही हो, “पारुल तो सुरक्षित हो गई लेकिन मैं.....?”



शनिवार, 26 दिसंबर 2015

'गुड मॉर्निंग' : लघुकथा

कोई भी मौसम हो, भोर के ठीक 5:00 बजे नहीं कि रमानाथ जी के योगासन की चटाई पार्क में बिछ जाती। मजाल है जो कभी घड़ी की सुई एक सेंकेड भी आगे गई हो। फिर पूरे घंटे भर तक उनका योग कार्यक्रम चलता। उसके बाद वे पार्क के कोने में बनी बेंचों पर विराजमान हमउम्र साथियों के साथ पंद्रह मिनट हाहा-हुहू करते। और फिर खरामां-खरामां घर की ओर रवाना हो जाते थे।

कॉलोनी में दो रमानाथ थे और दोनों के उपनाम भी एक ही थे। इसीलिए इन महाशय को सब ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ कहकर पुकारने लगे। समय ने अपने कदम आगे बढ़ाए ‘पाँच वाले रमानाथ जी’ सेवानिवृत हो गए। लगभग दो-तीन साल तक उनकी पाँच बजे की योगासन वाली प्रक्रिया निर्बाध चली, फिर धीरे-धीरे उनका पार्क में आना कम होता गया। और इधर तो वे साल भर से पार्क में दिखाई ही नहीं दिए।

आज सुबह-सुबह उनके घर से आवाज़ सुनाई दी, “माघ उतरने को है, और एक आप हैं कि अभी भी रजाई में पड़े हुए हैं।“ पत्नी ने ताना कसा।

“तो अब एक रिटायर्ड आदमी इस उम्र में और क्या करे, क्या रंगबिरंगी शर्ट पहन सड़कों पर सीटी बजाए?“ रमानाथ जी ने भी पलटवार किया।

“अरे, तो पहले की तरह कम से कम थोड़ी देर पार्क में ही चले जाया करो, शरीर को थोड़ी हरकत तो मिल जाएगी।“ पत्नी ने कहा।

“नहीं-नहीं...बहुत ठण्ड है !” रमानाथ जी ने रजाई में दुबकते हुए जवाब दिया।
“तो गर्मी में ही कौन-सा जा रहे थे।“ पत्नी ने उलाहना दिया।

हारकर रमानाथ जी मुर्दनी आवाज़ में बोले, “अच्छा...तुम कहती हो तो चले जाते हैं, लाओ छड़ी, टोपी, मफ़लर दो।’’ इस तरह आज रमानाथ जी स्वेटर के ऊपर लम्बा कोट डाले, हाथों में दस्ताने, सिर पर मंकी कैप, उसके ऊपर मफ़लर लपेटे, पैरों में ऊनी ज़ुराबें चढ़ाए, छड़ी ठुक-ठुकाते हुए पार्क के लिए रवाना हुए।

अच्छी धूप खिली थी। सर्दी भी कुछ ख़ास नहीं थी। रविवार होने से पार्क में चहल-पहल भी कुछ अधिक थी। रमानाथ जी एक बेंच पर जा बैठे। उनकी नजरें पार्क के चारो कोनों को टटोलती हुई सामने खेल रहे बच्चों पर टिक गईं।

थोड़ी देर बाद एक युवती जॉगिंग करते हुए आई और उनकी बगल वाली बेंच पर बैठ गई। रमानाथ जी ने कनखियों से उसे देखा। युवती ने अपने जूते-मोज़े उतारकर किनारे रख दिए और बेंच पर पाँव मोड़कर ध्यान की मुद्रा में बैठ गई। थोड़ी देर बाद रमानाथ जी की नज़र उस पर फिर पड़ी तो उन्होंने भी अपने जूते उतार दिए और पाँव मोड़कर बैठ गए।

लगभग दस मिनट ध्यान करने के बाद युवती ने अपनी आँखें खोलीं। अपने पैरों को सीधा कर पंजे हिलाते हुए उसने रमानाथ जी की ओर देखा। उन्होंने भी दस्तानें और ऊनी ज़ुराबें उतार दीं और पैरों को सीधाकर पंजों को हिलाने लगे। अब युवती अपना जैकेट उतारकर अपनी दोनों बाहें सामने करके कलाई घुमा रही थी। उसने रमानाथ जी को देखा और मुस्कुरा दी।

धूप तेज होने लगी थी। उन्होंने अपने मफ़लर को सिर से उतारकर गर्दन में लपेट लिया। उनकी नजर उस युवती की तरफ गई। वह उनकी ओर देखते हुए अब भी मुस्कुरा रही थी। यह देख रमानाथ जी भी थोड़ा मुस्कुरा दिए। उसने रमानाथ जी के सिर की ओर इशारा कर टोपी उतारने को कहा। रमानाथ जी पहले तो अचकचाए फिर उन्होंने टोपी उतार दी, लेकिन मफ़लर को सिर से कान तक लपेट लिया। युवती ने मुँह बनाते हुए मफ़लर भी उतारने के लिए इशारा किया। रमानाथ जी ने जैसे उसके इशारे को अनदेखा करते हुए अपनी गर्दन दूसरी ओर फेर ली। फिर न जाने क्या सोच उन्होंने मफ़लर उतारा और कनखियों से युवती की ओर देखा। युवती ने अपने अंगूठे और तर्जनी को मिलाते हुए गोला बनाकर इशारा किया और एक आँख दबाते हुए मुस्कुरा दी। रमानाथ जी पहले तो कुछ असहज हुए लेकिन फिर जोर से हो-हो कर हँस दिए।

युवती उठी, अपना जैकेट कंधे पर डाला और उनके निकट आकर बोली, “खुल्ली हवा और हँसी हेल्थ विच गुड होंदीये, होर आप तो इन्ने हेण्डसम हो, बुड्ढों जैसे कपड़े क्यों पेने ओ?” युवती ने उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और खिलखिलाती हुई पार्क से निकल गई।

रमानाथ जी उसे जाता देखते रहे, जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गई। फिर वे झटके से खड़े हुए, छड़ी एक ओर फेंकी, कोट उतारकर बेंच पर रखा और पार्क में टहलने लगे। धीरे-धीरे उनकी गति बढ़ने लगी।
तभी बच्चों का समवेत स्वर गूँजा, “गुड मॉर्निंग अंकल !” रमानाथ जी हाथ हिलाते हुए तेज़ी से उस ओर बढ़ गए।
अब पिछले कुछ दिनों से बच्चों द्वारा दिया गया उनका नया नाम ‘गुड मॉर्निंग अंकल’ भी पहले वाले नाम की तरह ही लोकप्रिय हो गया है।

चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 13 दिसंबर 2015

चीयरअप : लघुकथा

हर शाम स्कूटर पर ऑफ़िस से घर लौटती अदिति के होठों पर कोई मधुर गीत होता। आँखें फ़्लाईओवर से नज़र आती दूर तक फैली बसाहट और आसमान के मिलन के अद्भुत नज़ारे के आनंद में डूबी होतीं। कभी कोई अनोखा दृश्य देख वह एक पल के लिए ठिठक जाती। फिर उससे मिलने वाली आनंदानुभूति अपने जेहन में भरकर जैसे दिन भर के तनाव से मुक्त हो जाती।

आज भी वह ऐसे ही आनंद के आगोश में थी कि एक साइकिल सवार उसे पीछे छोड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गया। अक्सर जब भी कोई स्कूटर या मोटरसाइकिल अदिति को पीछे छोड़ते हुए आगे निकलती है तो वह अपने स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर उसे पीछे छोड़ देती है। पर आज न जाने क्यों उसने स्कूटर आगे न बढ़ाकर उस साइकिल सवार के पीछे लगा दिया। साइकिल सवार ने जैकेट पहन रखी थी। जैकेट के हुड से उसका सिर ढका था। उसके चौड़े कंधे साइकिल पर पैडल मारने की जद्दोजहद में हलके से दाएँ-बाएँ झुककर अपना आकर्षण और बढ़ा रहे थे। कुछ देर बाद जब फ़्लाईओवर की सीधी चढ़ाई शुरू हुई तो अदिति स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर आगे निकल गई। साइकिल सवार स्कूटर के साइड मिरर में नज़र आ रहा था। अदिति स्कूटर की रफ्तार धीमी कर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगी।

उसने देखा साइकिल सवार साइकिल रोककर फ़्लाईओवर के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत से साइकिल के पीछे इशारा करते हुए कुछ कह रहा है। बूढ़ी औरत के साथ एक सात-आठ साल का बच्चा और एक बड़ा झोला भी था। कुछ क्षणों बाद उसने देखा बूढ़ी औरत साइकिल के पीछे बैठ गई। उसने झोले को साइकिल के हेंडल में फँसा दिया। बच्चे को आगे के डंडे पर बिठाया और खुद पैदल साइकिल खींचते हुए फ़्लाईओवर चढ़ने लगा। अदिति ने स्कूटर रोक दिया।

ऑफ़िस आते-जाते रास्ते में बस या ऑटोरिक्शा की प्रतीक्षा में खड़े लोगों को उनके गंतव्‍य तक छोड़ना तो अदिति की आदत में शुमार है। कई बार तो वह बस के इंतज़ार में खड़े स्कूल के बच्चों को उनके स्कूल तक छोड़ने चली जाती है। ऐसे में उसको ऑफ़िस के लिए देर भी हो जाया करती है। पर आज न जाने कैसे वह इस बूढ़ी औरत को देखने से चूक गई। असल में उसका सारा ध्यान साइकिल सवार पर था। शायद इसीलिए उसने उस बूढ़ी औरत को नहीं देखा। बहरहाल अब बड़ी बेताबी से वह साइकिल सवार और उस बूढ़ी औरत की प्रतीक्षा कर रही थी।

उसने पलटकर देखा। वह निकट आ गया था। अदिति साइकिल सवार को देखकर अवाक़ रह गई। वह उसकी कल्पना के विपरीत कोई साठ-पैंसठ साल का एक बुज़ुर्ग था। अदिति अपलक उसे देखे जा रही थी। साइकिल खींचने से उसका चेहरा लाल हो आया था। ढलते सूरज की किरणों में उसके माथे पर उभरी पसीने की बूँदें सुनहरे मोतियों सी चमक रहीं थीं। उसने अपना सिर बाईं ओर घुमाकर अदिति की ओर देखा। अदिति ने अपना हेलमेट उतार दिया और बरबस उसका दायाँ हाथ सलाम की मुद्रा में उठ गया। फिर वह अँगूठे से चीयरअप करती हुई मुस्करा दी। साइकिल सवार भी चीयरअप करता मुस्करा दिया।

अदिति उससे कुछ कहती इसके पहले ही वह सावधानी से साइकिल पर चढ़ा और पैडल मारते हुए फ़्लाईओवर की ढलान पर उतर गया। मदद करने का ख्‍़याल अदिति के मन में ही रह गया। वह रोमांचित लेकिन ठगी-सी उसे देखे जा रही थी। साइकिल सवार को छूकर आ रहे शीतल हवा के झोंके अदिति को एक अजीब-सा सुकून दे रहे थे।

('क्षितिज' 2018, अंक - 9 में प्रकाशित ) 

चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 29 नवंबर 2015

सज़ा : लघुकथा

घंटी बजे लगभग दस मिनट बीत चुके थे। मैडम सीमा के कक्षा में न पहुँचने पर कक्षा मॉनीटर ने स्टाफ़रूम में झाँक कर देखा तो वह अपने मोबाइल में व्‍यस्त थीं।

“मैम, चलिए, सब बहुत शोर कर रहे हैं।“ मैडम सीमा बिना कुछ जवाब दिए मोबाइल पर उंगलियाँ फेरे जा रहीं थीं।

“मैम.....” मैडम का कोई जवाब न पाकर वह फिर बोला।

“उफ़ ! इस स्कूल में तो ज़रा सा भी चैन नहीं।“ तन्द्रा भंग होने पर वह भुनभुनाते हुए कक्षा की ओर चल पड़ीं।

मैडम को कक्षा में प्रवेश करते देख बच्चे फटाफट अपने-अपने स्थान पर हो लिए। उन सबने एक सुर में उनका अभिवादन किया। उन्‍होंने अभिवादन के बदले में सबको खड़े रहने को कहा।

कक्षा अभी शुरू ही हुई थी कि स्कूल का चपरासी एक नोटिस लेकर आ गया। सभी बच्चों की नोटबुक प्रिंसीपल ऑफिस में मँगवाई गईं थीं। मैडम सीमा ने तुरंत सभी बच्चों को उनकी नोटबुक जमा करने का आदेश दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी नोटबुक मेज पर लाकर जमा कर दीं। मैडम नामों की सूची से नोटबुक को मिलाने लगीं।

आयुष की नोटबुक न पाकर उन्‍होंने पूछा, “आयुष ! तुम्हारी कॉपी कहाँ है ?”

“मैम, मेरी कॉपी मानस ले गया है।”

“अच्‍छा ! मानस तो कई दिनों से स्कूल नहीं आया, कब ले गया तुम्हारी कॉपी ?” मैडम सीमा ने सख़्त आवाज़ में पूछा।

“मैम, उस दिन जब मैंने सबसे पहले काम कर लिया था तो आपने कहा था कि मैं अपनी कॉपी मानस को काम पूरा करने के लिए दे दूँ।” आयुष ने सफ़ाई दी।

“नो, ये तुम्हारा काम पूरा न करने का बहाना है, बस।”

यह सुनकर आयुष की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, फिर भी डरते-डरते उसने याद दिलाया, “वो...वो...मैम, उस दिन जब मैं स्टाफ़रूम में आया था न, तब आपने देने को कहा था।”

“चुप ! एक तो कामचोरी, ऊपर से झूठ !” मैडम की बात सुनकर आयुष सहम गया।

मध्यान्ह अवकाश की घंटी बज गई। मैडम सीमा उसे भोजन न करने की सज़ा दे स्वयं स्टाफ़रूम में आ गईं। आयुष पूरे मध्यान्ह अवकाश भर कक्षा के एक कोने में खड़ा रहा।

अवकाश के बाद दूसरी कक्षा शुरू हो गई। आयुष बिना भोजन किए चुपचाप अपनी जगह बैठ गया।

मैडम सीमा अपनी अगली कक्षा के लिए निकल ही रही थीं कि साथी अध्‍यापिका ने उन्‍हें एक नोटबुक देते हुए कहा कि ये किसी बच्चे के अभिभावक ने भिजवाई है। नोटबुक देखकर वह सकते में आ गईं। उस पर आयुष का नाम लिखा था। वह नोटबुक लेकर आयुष की कक्षा की ओर भागीं।

कक्षा चल रही थी। उन्‍होंने देखा, आयुष आँखों में आँसू लिए अपनी सीट पर बैठा था। मैडम सीमा की आँखें भी भर आईं। वे उसको नोटबुक दिखाते हुए बोलीं, “आयुष तुम सच कह रहे थे कि तुमने अपनी कॉपी मानस को दी है, लेकिन मैम ने तुम्हारी बात नहीं सुनी, मैम बहुत गन्दी हैं न।“ यह कहते-कहते उन्‍होंने झुककर आयुष को गले लगा लिया।

आयुष ना में सिर हिलाते हुए सीमा से लिपट गया। उधर कक्षा ले रहीं दूसरी अध्‍यापिका यह सब देखकर हतप्रभ थीं, लेकिन बच्‍चे तालियाँ बजा रहे थे।
चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

विस्‍फोट : लघुकथा

आज काव्या मिलने आने वाली थी। मैं घर के बाहर बरामदे में विचारों के उधेड़-बुन में फंसी चहलकदमी करते हुए न जाने कब अतीत में चली गई।

कई दिनों से मैं देख रही थी कि समीर हम सब से कटा-कटा सा रहता है। बार-बार पूछने पर उसने एक दिन शरमाते हुए काव्या से अपने लगाव के बारे में बताया था। वह उससे विवाह करना चाहता था। यह खबर हमारे लिए आश्‍चर्य मिश्रित खुशी लेकर आई थी। क्योंकि अब तक तो विवाह के नाम से दूर भागता रहा था वह । रिश्‍ते आते थे, पर वो बिना बात किए ही मना कर देता था। लेकिन यकायक उसके इस विस्फोट ने जैसे सूखे चूने पर पानी डाल दिया था। हमें कोई आपत्ति नहीं थी। बस काव्या के बारे में जानकर हम सब असमंजस में आ गए थे। कहाँ हमारा ग्रामीण परिवेश का मध्यम वर्गीय परिवार और कहाँ वह दिल्ली जैसी महानगरीय संस्कृति के वातावरण में पली-बढ़ी, उच्च व्यावसायिक वर्गीय घराने की कन्या।

“क्या ऐसे परिवार की लड़की हमारे परिवार के साथ सामंजस्य बिठा पाएगी?“ मैंने समीर से चिंता जताते हुए पूछा था।

“दीदी हम बंगलौर जा रहे हैं।“ समीर ने दूसरा विस्‍फोट किया था।

“बंगलौर क्‍यों ?“ मैं अवाक थी।

“हम दोनों ने जॉब के लिए अप्लाई किया था, वहां से बुलावा आ गया है।“ यह सूचना खुशी वाली थी, पर थोड़ी उदास करने वाली भी।

“ओह, तो बात यहाँ तक पहुँच गई है?” मैंने ताना देते हुए पूछा तो वह बिना कुछ जवाब दिए बाहर चला गया था।

उस दिन हम सभी भाई-बहन गाँव जा रहे थे। समीर कार चला रहा था। बीच-बीच में काव्या का फ़ोन आ रहा था। हमने समीर से कहा कि वह काव्या से गाँव पहुँच कर बात करले, अभी कार चलाने पर ध्‍यान दे। किन्तु उसने बात अनसुनी कर दी। अब तो ऐसा लगने लगा था जैसे काव्या हम भाई-बहनों के बीच दूरी बढ़ाती जा रही थी। फिर भी समीर की ख़ुशी हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण थी।

हमने काव्या को घर बुलाने की योजना बनाई। औपचारिकता वश ही सही लेकिन इसके पीछे एक कारण यह भी था कि वह भी हमारे घर-परिवार, रहन-सहन को देख-भाल ले। हमारी माँ थीं नहीं और अभी पिता जी को इस बारे में बताना उचित नहीं लग रहा था, इसलिए जो करना था हम बहनों को ही करना था।

कार के हार्न ने मुझे वर्तमान में लौटा लिया। मैंने गेट से झाँक कर देखा तो समीर और काव्या कार से उतर रहे थे। काव्या ने साड़ी पहन रखी थी। बाल लम्बे और खुले हुए थे। चेहरे पर हल्का मेकअप था। मैंने बढ़कर गेट खोल दिया। सामने आकर वह थोड़ा झिझकी फिर मुस्कुराते हुए वह मेरे गले लग गई। उसने अपनी बाँहों में मुझे भींच लिया, फिर अलग होते हुए कहा, ‘आप लोगों से मिलने का बड़ा मन था।’

मैं उसे बैठक में ले गई। बाकी बहनों से भी वह उसी गर्मजोशी से गले मिली। काफ़ी देर तक हम बातें करते रहे। उस दौरान मैंने ये महसूस किया कि हमने काव्या को लेकर जो छवि बनाई थी वह सही नहीं थी। काव्‍या अपनी बातों और व्यवहार से बड़ी सहज लगी।

हम भोजन करने बैठे तो काव्या का लाया हुआ भोजन भी साथ में परोसा। उसकी बनाई सब्‍जी के साथ पहला कौर खाते ही सबके मुँह से एक साथ निकला, “अरे इसमें तो एकदम माँ के हाथों बनी सब्‍जी का स्‍वाद है।”

“ये तुमने बनाई है काव्या !” मैंने आश्चर्य से पूछा, तो उसने शरमाते हुए हौले से हामी भरी।

“हम्म, तो समीर बंगलौर में तुम्‍हारे मजे रहेंगे।” खाते हुए मैंने चुटकी ली।

“ऐसी हमारी कि़स्‍मत कहाँ! ” समीर आह भरते हुए बोला।

“क्‍यों, क्‍या हुआ? ” हम सब बहनें एक साथ बोलीं। हमारी आवाज में घबराहट भी थी।

“नहीं दीदी, घबराइए मत। असल में हमें आप लोगों का साथ और स्‍नेह भी चाहिए। इसलिए.... बंगलौर जाना कैन्सिल।” कहा तो यह काव्‍या ने था, पर समीर हम सबको तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्‍करा रहा था।

यह तीसरा विस्‍फोट था, पर इस बार ख़ालिस ख़ुशी का। फिर तो हर बीतते दिन के साथ काव्या हम सबके दिलों में उतरती चली गई। और हाँ इसमें अब पिता जी भी शामिल थे।




(चित्र गूगल से साभार )