गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

दीये : लघुकथा

करीम फुटपाथ के किनारे अपने दीये सजाए, ग्राहकों की आस में हर आने-जाने वालों को टुकर-टुकर देखे जा रहा था। कोई ग्राहक उसकी ओर आता दिखता तो उसकी आँखों में थोड़ी चमक आ जाती थी लेकिन अगले ही पल वह गायब भी हो जाती। ग्राहक चीनी बल्बों, झालरों से सजी गुमटियों की ओर बढ़ जाते थे। एक गुमटी उसके साथी रघु के बेटे सूरज की भी थी। रघु भी उसके साथ मिट्टी के दीये बनाता था।

‘यदि ये दीये, सचमुच न बिके तो?’ मन ही मन सोचते हुए करीम को सूरज की कही बात याद आ गई। वह अतीत में खो गया।
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“चचा, अब ई बिजिनस पुरान होइ गवा, तबही हम दुई साल पहिलहीं चैनीज झालर के बिजिनस कर लिए रहेन।’’

“मती मारी गई है तुमरी ? ’’ करीम चाक ठीक करते हुए बोला।

“चचा, तुम तो फिर भी झण्डी, ताजिया, कंदील बनावो, उ बिजिनस में कम से कम पइसा तो है, ई माटी के काम में सरीर माटी होई जाएगी लेकिन पइसा...।’’ सूरज ने ठेंगा दिखाते हुए कहा।

“बचवा, अब हम तो ई पुरखन के काम न छोड़ब। पइसा न सही हमरे दीयन से देवारी मा लोगन के घर रोसनी तो होत है।’’ यह कहते हुए करीम पोखर से मिट्टी लाने के लिए चल पड़ा।

पोखर से लोडर ट्रकों में मिट्टी भर रहे थे। ठेकेदार उनको निर्देश दे रहा था। करीम कुछ देर तक देखता रहा, फिर हिम्मत करके ठेकेदार के पास जा पहुँचा।

“बाऊ !” करीम थोड़ा झिझकते हुए बोला ।

“क्या है !” ठेकेदार ने बिना उसकी ओर देखे लापरवाही से पूछा।

“बाऊ, हमका थोड़ी माटी चाहत रहा।” करीम ने याचना की।

“मिट्टी नहीं है यहाँ ।” ठेकेदार पान मसाला मुँह में डालते हुए बोला।

“बाऊ, दिवारी आवे वाली है, थोड़ी माटी मिल जात तो...” उसकी बात पूरी होने से पहले ही ठेकेदार बिफर पड़ा।

“तुमको पता है कि मिट्टी कितनी महँगी हो गई है? मिट्टी चाहिए, हुंह ।”

“बाऊ, हमसे इ पोखर के मालिक गमला के बदले में माटी देत रहेन।”

“इस पोखर के मालिक? ये पोखर तो सरकारी है।” ठेकेदार जोर से हँसा।

करीम को कुछ समझ नहीं आया, वह थोड़ा सिटपिटाया, फिर बोला, “आपहू लय लेना गमला और दीया, उ सामने हमार झोपड़ा है।”

“हमें नहीं चाहिए दीया-फिया, भागो यहाँ से।” ठेकेदार ने झिड़की दी।

“बाऊ, एक ठेलिया माटी कत्ते की पड़ेगी?” थोड़ी देर बाद करीम ने एक बार फिर हिम्मत जुटाते हुए पूछा।

ठेकेदार ने दाँतों के बीच से पीक निकाली और मसाला चबाते हुए उसको ऊपर से नीचे तक देखा, फिर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए बोला, “हज़ार की।”

करीम के होश उड़ गए। उसकी गाँठ में कुल पाँच सौ रुपये थे। लकड़ीवाले का कर्जा पहले ही चढ़ा था और अभी इन दीयों को पकाने के लिए भी लकड़ियाँ चाहिए थीं। क्या करे, क्या न करे थोड़ी देर इसी उहापोह में पड़ा रहा, गाँठ से रुपये निकालते हुए वह ठेकेदार के आगे गिड़गिड़ाया, “बाऊ, कुल जमा पूँजी पाँच सौ है हमरे पास, एतने की माटी दय दो हमका।”

ठेकेदार ने किच्च से पीक थूकी, करीम से रूपये लेकर मिट्टी की ओर इशारा किया। “चलो जल्दी से लादो, और सुनो, दर्जन भर गमले तैयार करके रखना।” ठेकेदार ने चेताया।

“ठीक बा बाऊ ।” करीम का चेहरा खिल उठा, उसको ऐसा लगा जैसे दौलत मिल गई हो। वह जल्दी-जल्दी ढेर से मिट्टी उठाकर ठेलिया में डालने लगा।
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“मम्मा, दीये नहीं लोगी?” इस आवाज़ से करीम की तन्द्रा टूटी। उसने देखा एक छोटी सी बच्ची हाथों में दिए पकड़े बैठी है।

“बेटा, हमने चाइनीज़ झालर ले ली है।”

“लेकिन मम्मा, दीवाली में तो दीये जलाते हैं न ?” उसने हाथ में पकड़े दीयों को हसरत से देखते हुए पूछा।

“हाँ बेटा, लेकिन दीयों के तेल से दीवारें खराब हो जाती हैं, चलो छोड़ो इन्हें।” माँ ने बच्ची के हाथ से दीए छीनकर रख दिये और उसको चलने के लिए खींचा।

“नहीं मम्मा, मुझे तो दीये ही चाहिए।” बच्ची रूआँसी हो उठी थी और जमकर वहीं बैठ गई।

“चलो बाबा, दे दो बीस दीये।“ माँ हारकर बोली। करीम ने बीस दीयों के साथ एक बड़ा लाल दीया अलग से देते हुए कहा, “ई हमरी तरफ़ से बिटिया को देवारी का उपहार... ।” बच्ची दीया लेकर चहकने लगी।

“पापा, मुझे भी दीये चाहिए, मेरी मैम ने कहा था कि दीवाली में दीये जलाए जाते हैं।” तभी पास खड़े एक और बच्चे की आवाज़ आई।

फिर तो धीरे-धीरे करीम के दीयों के लिए लोगों की आमद होती गई। दीये अब करीम की आँखों में भी जल उठे थे।

(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

‘छवि’ :लघुकथा

सोनाली ने कंपार्टमेंट के अंदर प्रवेश किया। चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए वह खिड़की के पास वाली अपनी सीट पर जा बैठी। उसी सीट पर दो और महिलाएँ बैठी थीं। उनकी उम्र साठ-पैंसठ के आसपास रही होगी। वे पैर ऊपर मोड़े बैठी बातें कर रही थीं। उनमें से एक रह-रहकर अपने दोनों घुटनों को दबा रही थी। उनकी बातचीत और वेशभूषा आदि से लग रहा था कि शायद वे किसी तीर्थ यात्रा पर जा रही हैं। एक गहरी साँस लेते हुए उसने पानी की बोतल को मुँह से लगाया एक-दो घूँट गटकने के बाद खिड़की से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने लगी । थोड़ी देर बाद वे दोनों हाथ में एक पुस्तिका लेकर कोई मंत्र आदि बुदबुदाने लगीं।

सोनाली ने बुरा सा मुँह बनाया और मन ही मन सोचने लगी, “उफ़ ! अब रात भर इनकी बड़बड़ झेलनी होगी।” उसने ऑंखें बंदकर खिड़की पर सिर टिका दिया। बाहर की ठंडी हवा और थकान से सोनाली की झपकी लग गई। अचानक खटके से उसकी नींद खुली तो देखा सामने की सीट वाले यात्री सोने की तैयारी कर रहे हैं। उसको जागा हुआ देख उसकी सीट पर बाजू में बैठी एक महिला उसकी ओर मुख़ातिब हुई, “बेटा, ऊपर वाली बर्थ मेरी है, मेरे घुटने में गठिया है, यदि आपको कोई दिक्क़त न हो तो ये नीचे वाली अपनी बर्थ मुझे दे दो।“

सोनाली मन ही मन झुंझलाई। फिर उनकी अवस्था देख बिना कोई जवाब दिए वह मान गई। ‘इन सठियाई औरतों को कुछ काम-धाम तो होता नहीं, जि़ंदगी भर पति की कमाई पर ऐश किया होगा और अब तीर्थयात्रा के बहाने सैर-सपाटा, हुंह ! घुटने में तकलीफ है तो घर में बैठकर पोता-पोती संभालें।’ सोनाली मन ही मन बड़बड़ाई। वह चढ़कर ऊपर की बर्थ पर चली गई। दोनों महिलाएँ भी सोने की तैयारी करने लगीं।

तभी उसे याद आया कि उसका लेपटॉप बैग तो नीचे ही रह गया है।

“माँ जी, मेरा बैग नीचे रह गया है ज़रा पकड़ाना।” वह नीचे झाँकते हुए बोली। उस महिला ने जैसे ही उसका बैग उठाया, वह थोड़ा तेज़ आवाज़ में बोली, “अरे, उसमें लैपटॉप है, कोई पोथी-पत्रा नहीं, ज़रा संभाल कर उठाइये।” महिला ने मुस्कुराते हुए उसका बैग पकड़ा दिया।

सुबह हो गई थी। दोनों महिलाएँ नीचे वाली सीट पर बैठी बतिया रही थीं। सोनाली भी नीचे उतर आई। बैग से तौलिया आदि लेकर मुंह धोने चली गई। वापस आकर बैग से आइना निकालकर मेकप करने लगी। गठिया वाली महिला उसे देखकर मुस्कुराते हुए बोली, “शुक्रिया, बेटा।”

बदले में न चाहते हुए भी वह मुस्कुरा दी। वह महिला बोली, “बेटा, आप कहाँ जा रही हो?”

“यूनिवर्सिटी में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हूँ, एक सेमीनार में जा रही हूँ।” सोनाली व्यंगात्मक अंदाज़ में ठसक भरी आवाज़ में बोली। जैसे उन महिलाओं को जताना चाह रही हो कि वह उनकी तरह फालतू में सैर नहीं कर रही है। वह महिला फिर मुस्कुरा दी।

“आप लोग तो शायद किसी तीर्थयात्रा पर जा रही हैं न ?” सोनाली से रहा नहीं गया। उसने आखिर पूछ ही लिया। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखने लगीं।

फिर गठिये वाली महिला बोली, “हाँ बेटा, ऐसा ही समझ लो।”

सोनाली उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगी, जैसे कह रही हो, ’समझ लो का क्‍या मतलब!’ तभी दूसरी महिला ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, “दरअसल मैं अपनी पोती के दीक्षांत समारोह में जा रही हूँ, और ये मेरी सखी उसी समारोह में मुख्य अतिथि हैं। ये वहाँ की भूतपूर्व कुलपति हैं।”

सोनाली ने चौंककर कुछ इस तरह उनको देखा जैसे पहली बार देख रही हो।

शनिवार, 26 सितंबर 2015

'बौरा' :लघुकथा

बौरा, हां इसी नाम से तो पुकारते थे सब उसे वह एक कंधे पर पुरानी शाल डाले और दूसरे कंधे पर झोला लटकाए ऑटो स्टैंड के किनारे बने चबूतरे पर हमेशा बैठा दिखता था। वहां बैठे-बैठे वह हर आने-जाने वाले का मुस्कुराकर अंग्रेजी में अभिवादन करता। वह कौन है ? क्या करता है ? कहां रहता है ? इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था। न ही कोई जानता था। लेकिन जब वह नहीं दिखता तो लोगों की नजरें उसे खोजती थीं।

दोपहर में जब सवारियों का आना-जाना कम हो जाता तो बौरा, ऑटो वालों और आसपास की गुमटी वालों के मनोरंजन और समय बिताने का साधन बन जाता। मौसम चाहे जो भी हो, लेकिन उसके कंधे से शाल कभी नहीं हटती थी। अक्सर दोपहर में जब वह बैठे-बैठे ऊंघने लगता तो कोई ऑटो वाला धीरे से आकर उसकी शाल खींचकर भाग जाता और बौरा उसको लेने के लिए बदहवास, परेशान सा उसके पीछे-पीछे भागने लगता। उस शाल को वापस पाने के लिए वह उन सबकी हर ऊल-जलूल फरमाइश पूरी करता। वे उससे जैसा करने को कहते वह वैसा ही करता। उसकी यह स्थिति देख लोग तालियां पीट, हंस-हंसकर लोट-पोट हो जाते। अंत में शाल पा लेने पर वह फिर से उसी चबूतरे पर विराजमान हो ऐसे मुस्कराने लगता जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आज सुबह से बौरा पता नहीं कहां चला गया था। दोपहर भी बीतने लगी थी, लेकिन आज लोगों की नज़रें उसको नहीं खोज रहीं थीं। आज उस चबूतरे पर कहीं से एक औरत आकर लेट गई थी। उसके तन पर लिपटे मैले कपड़े में कपड़ा कम छोटे-बड़े झरोखे ज्यादा दिखाई दे रहे थे। ये झरोखे आज सड़क पर हर आने-जाने वालों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वहां से गुजरते लोगों की नजरें उन झरोखों में अटक-अटक जा रही थीं। कुछ नजरें ऐसी भी थीं जो चुपके से उधर जातीं और फिर अनदेखा कर ऐसे आगे बढ़ जातीं जैसे कि कुछ देखा ही न हो। कुछ हिकारत भरीं कोसतीं, बड़बड़ातीं हुई आगे बढ़ जातीं। लेकिन कई नजरें तो चबूतरे के चारों ओर परिक्रमा लगाती हुईं उसे हर कोण से देख लेने के भरसक प्रयास में लगी थीं। जैसे दुनिया का आठवां अजूबा यहीं अवतरित हो गया हो।

तभी अचानक न जाने कहां से बौरा प्रकट हुआ। जब वह चबूतरे की ओर बढ़ने लगा तो पीछे से सीटी बजने और तालियां पीटकर हंसने की आवाजें आने लगीं। लेकिन वह चबूतरे के पास दो पल के लिए ठिठका और फिर आगे बढ़ गया।

उस औरत के तन पर लिपटे कपड़ेनुमा झरोंखों को बौरा ने अपनी शाल के पट से बंद कर दिया था। आज पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कुराहट के बजाय गंभीरता दिख रही थी और आसपास के तमाम हंसने वाले चेहरे जैसे खुद पर शर्मिन्‍दा थे।
  


(चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 21 सितंबर 2015

उड़न परी : लघुकथा

“ममा, मैं सलवार-कुर्ता नहीं पहनूँगी, मुझे गर्मी लगती है इसमें।” दस साल की आहना ने ठुनककर कहा।

“बेटा ज़िद्द नहीं करते, जल्दी से पहन लो, रमा आंटी के यहाँ पार्टी में चलना है। अगर हम देर से जायेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा।” शिखा ने बेटी को प्यार से समझाया।

“नहीं, मुझे नहीं जाना पार्टी-शार्टी में, मेरी सब फ्रेंड्स फ़्राक, स्कर्ट पहनती हैं, आप मुझे सिर्फ सलवार-कुर्ता पहनने को कहती हो । वे सब पार्क में खेलती हैं, आप मुझे वहाँ भी नहीं जाने देती हो, क्यों?” आज आहना के सब्र का बाँध जैसे टूट पड़ा था।

“क्योंकि तुम सलवार-कुर्ते में इतनी प्यारी लगती हो कि पूछो मत, रमा आंटी ने भी कल मुझसे यही कहा।” बेटी को बहलाते हुए शिखा बोली।

“एकदम झूठ !” आहना ने माँ की बात को समझते हुए, अपनी नाराज़गी को छुपाते हुए कहा।

“एकदम सच्ची।” अपने गले को चुटकी से पकड़ते हुए शिखा ने कहा। फिर दोनों खिलखिला पड़ीं।

लेकिन शिखा के चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसके अंदर भीषण संग्राम छिड़ा हुआ है। शादी के तीसरे साल पति की अचानक मृत्यु और फिर छः साल की आहना के साथ दूर के रिश्तेदार के उस दुर्व्यवहार ने उसे झिंझोड़ डाला था। जैसे-जैसे आहना बड़ी हो रही थी उसके मन का भय दिन-ब-दिन उसे और जकड़ता जा रहा था। वह उसे हर तरह से दुनिया की नजरों से दूर, ढक-मूँदकर रखना चाहती थी। यही सब सोचकर वह आहना के खेलने-कूदने, पहनने-ओढ़ने पर पाबंदियाँ लगाती जा रही थी। अक्सर उसके साथ काम करने वाली सहेलियाँ भी उस पर पिछड़ी, दकियानूसी होने का आरोप लगातीं, किन्तु वह सब हँसी में उड़ा देती थी। हालाँकि कभी-कभी तो उसे स्वयं लगता कि वह अपने हाथों से अपनी मासूम बच्ची का गला घोंट रही है।

अचानक शिखा की तन्द्रा टूटी। वे पार्टी में पहुँच गए थे। वहाँ बड़ी रौनक थी। खुले वातावरण में मधुर संगीत और बेला की सुगंध, मन, मस्तिष्क दोनों को ताज़गी प्रदान कर रहे थे। रमा ने आहना और शिखा का स्वागत किया। अपनी बेटी वैष्णवी से मिलवाया। आधुनिक लिबास में वैष्णवी एक परी जैसी लग रही थी। उसे देख शिखा जैसे मन्त्रमुग्ध सी हो गई। वह वैष्णवी के रूप में आहना की कल्पना करने लगी और फिर अचानक ही उस भयावह हादसे की याद से सिहर उठी।

तभी मंच पर पार्टी आरम्भ होने की घोषणा के साथ रमा और वैष्णवी से केक काटने का अनुरोध किया गया। दोनों ने मिलकर केक काटा, सारा लॉन तालियों से गूँज उठा।

रमा ने माइक पर कहा, “देवियों और सज्जनों, मैं आप सभी का अभिवादन करती हूँ। मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मेरी बेटी वैष्णवी ने आई. पी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। वह अपने जीवन में इसी तरह सफल होती रहे, आप उसे आशीर्वाद प्रदान करें।”

तभी आगे बढ़कर वैष्णवी ने माँ के हाथ से माइक ले लिया और बोली, “लेकिन मैं आज जिस मुकाम पर हूँ, उस तक पहुँचाने के लिए मेरी माँ ने बहुत कष्ट सहे। बाधाओं और समाज की तमाम वर्जनाओं से मुकाबला करते हुए मेरी हर ख्वाहिश पूरी की। आज मैं आप सबको बताना चाहती हूँ कि जब मैं आठ बरस की थी तब एक ऐसे हादसे का शिकार हुई जिसे हमारा समाज किसी लड़की के जीवन को समाप्त करने के लिए पर्याप्त मानता है। लेकिन मेरी माँ ने मुझे उस अन्धकार से निकाला, कैसे, यह मैं अब भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।....माफ करना माँ, मैंने आपकी डायरी पढ़ ली है...... ।’’ कहते हुए उसका गला रुँध गया।

पार्टी में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया, और अगले ही क्षण तालियाँ गड़गड़ा उठीं। वैष्णवी अपनी माँ से लिपट गई। वहां मौजूद लगभग सभी की आँखें भीग गईं। और शिखा तो जैसे सुन्न ही पड़ गई। लेकिन अगले ही पल जैसे उसने कोई प्रण कर लिया था। वह आहना को गले लगाते हुए बोली, “कल हम अपनी आहना के लिए ढेर सारी फ़्राक और स्कर्ट्स लेने चलेंगे।”

“सच्ची ममा !” आहना का चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा। वह दुपट्टे को हाथ में फैलाकर ऐसे दौड़ने लगी जैसे वह उड़ान भरने जा रही हो।

(चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 31 अगस्त 2015

फुहारें : लघुकथा

मैं सुबह जल्दी-जल्दी स्नान कर राखी बंधवाने के लिए बैठक में आ कर छोटी बहन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा । हमेशा राखी बाँधने के बाद उपहार के लिए उसका आँखों को नाच-नचा कर तकरार करना मुझे बड़ा भाता था, इसीलिए मैं हमेशा उपहार छिपा देता था। आज भी उसके मनपसंद उपहार को मेज के नीचे छिपा दिया। जब काफ़ी देर हो गई और वह राखी लेकर नहीं आई तो मैंने उसे आवाज़ दी –


“छोटी !”

“भैया, छोटी तो मझले भैया के यहाँ गई है, राखी बांधने ।” छोटा भाई तैयार होते हुए बोला। टाई बांधते हुए छोटे की कलाई पर बंधी राखी देख मुझे थोड़ी मायूसी हुई।

“ओह, हमेशा सबसे पहले मुझे राखी बांधती थी ना इसलिए मैने सोचा कि उसे आवाज़ दे दूँ।” मैंने अपने को संयत करते हुए कहा।

“बेटा, छोटे और मझले को ऑफिस जाना है न ।” माँ समझाते हुए बोली।

माँ के ये शब्द सुनकर मुझे थोड़ा आघात सा लगा। मुझे याद आया कि हां सही बात है मुझे कौन सा ऑफिस जाना है। बेरोजगारी का ख्याल आ गया। मैं अपनी सूनी कलाई को देख होठों पर फीकी सी मुस्कान लाते हुए मन ही मन बुदबुदाया –

"कुछ दिन पहले तक मुझे भी ऑफिस जाने की जल्दी रहती थी।"

मैं वापस बैठक में आकर मेज के नीचे छिपाए उपहार को उठाने के लिए झुका ही था कि तभी -

“भैया !” पीछे से छोटी की पुकार ने मुझे चौंका दिया ।

छोटी सामने खड़ी खिलखिला रही थी। मैं हक्का-बक्का मामला समझने की कोशिश करने लगा। वह अपनी गोल-गोल आँखों को नचाते हुए बोली –

“भैया, हमेशा मैं सबसे पहले आपको राखी बांधती थी न, इस बार मैंने सोचा क्यों न उल्टा किया जाए। पहले छोटे भैया, फिर मंझले और फिर मेरे प्यारे बड़े भैया।’’

उसी समय माँ, मझले और छोटे भी बैठक में आ गए। छोटा बोला -

“भैया इस छोटी की बच्ची के ड्रामे ने इस बार हम सब को भी चक्कर में डाल दिया। यह मानी ही नहीं।’’

‘’लाओ अब जल्दी से अपनी कलाई आगे करो।’’ छोटी ने अपनी आंखे नचाते हुए कहा।

बैठक में गूंज रहे ठहाकों के बीच मैंने अपनी संकीर्ण सोच को जैसे-तैसे छिपाते हुए छोटी की नाक पकड़ कर जोर से हिला दिया।

रविवार, 23 अगस्त 2015

‘हम-परवाज़’ : लघुकथा

आज दोनों पहली बार रेस्ट्रॉ में मिल रहे थे । खाना ख़त्म करने के बाद लड़के ने इधर-उधर देखा फिर लड़की से कुछ कहा और उठकर कहीं चला गया । थोड़ी देर बाद वह कोल्ड ड्रिंक लेकर आया । देते समय थोड़ी सी कोल्ड ड्रिंक लड़की के कपड़ों पर छलक गई । लड़के ने फ़ौरन अपना रुमाल निकाल कर उसकी ओर बढ़ाया । लड़की ने कपड़ों पर छलकी कोल्ड ड्रिंक साफ़ की । थोड़ी देर बाद दोनों उठकर रेस्ट्रॉ के बाहर आ गए । थोड़ी दूर चलने के बाद लड़की ने लड़के से कुछ कहा फिर उसे वहीँ रोककर वापस रेस्ट्रॉ के अन्दर चली गई। शायद वह कुछ भूल गई थी। लड़का थोड़ी देर बाहर खड़ा रहा, फिर वह भी रेस्ट्रॉ के अंदर जाने लगा तभी लड़की वापस आ गई ।

"क्या हुआ ? वापस क्यों चली गई थी तुम ?" लड़के ने एकबार उसकी तरफ, एकबार रेस्ट्रॉ के दरवाज़े की तरफ देखते हुए पूछा ।

लड़की ने बिना कुछ कहे अपने पर्स से एक सिम निकालकर लड़के के हाथ में थमा दिया और जरा गुस्‍से में बोली, “यह क्‍यों दिया तुमने मुझे? ”

“ये तुम्हारे पास कैसे....” शब्द जैसे लड़के के कंठ में अटक के रह गए ।

“जब तुमने मुझे रुमाल दिया था तो यह उसमें था।” लड़की के होठों पर शरारत भरी मुस्कराहट तैर रही थी।

लड़का अभी संभल भी नहीं पाया था कि लड़की ने अपने पर्स से एक मोबाईल भी निकाल कर लड़के के हाथ में थमा दिया। लड़का मोबाईल देख कर हक्का-बक्का रह गया ।

"यह वही मोबाईल है न, जिसको तुमने रेस्ट्रॉ के बिल के पैसे कम पड़ने पर, बदले में दिया था?" लड़की ने रोष भरे अंदाज़ में पूछा ।

"वो, वो तो..." अब तक लड़का एकदम पानी-पानी हो चुका था।

“क्या हमारे प्यार का पंछी एक पंख से उड़ेगा ?” लड़की की आँखों में बेइन्तहा प्यार उमड़ आया था।

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

'गुनगुना एहसास’ : लघुकथा

एक तो रात का समय ऊपर से जनवरी की हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड। साईकिल चलाते हुए हैंडिल पर मेरी उंगलियाँ जमकर काठ हुई जा रहीं थीं। रास्ते में चाय की गुमटी देखकर मैंने सोचा थोड़ी गर्माहट ले ली जाय, सो चाय का ऑर्डर दे वहाँ रखी बेंच पर बैठ गया।

एकाएक मेरी नजर सामने, सड़क के पार, एक मैले-कुचैले मरियल-से कुत्ते पर पड़ी। मैंने उसे ग़ौर से देखा। यह वही कुत्ता था जिसे हमारे मोहल्ले के एक संभ्रांत परिवार ने कुछ माह पहले मंगवाया था। आरम्भ में तो उसे बड़े लाड़-प्यार से रखा गया, लेकिन माह भर बीतते-बीतते डंडे से उसकी धुनाई होने लगी और फिर एक दिन उसे यह कह कर घर से बाहर कर दिया गया कि वह देशी नस्ल का है।

सामने ही, एक व्यक्ति ठेले के चारों ओर बोरे लटका कर अपना आशियाना बनाने की कोशिश कर रहा था । पास में ईंटों से बने चूल्हे पर रखी देगची में कुछ पकाने को रखा हुआ था। वह कुत्ता बदहवास-सा बार-बार उस देगची की ओर जाता और वह व्यक्ति हर बार डंडे को ज़मीन पर पटक कर उसे भगा देता था।

पक जाने के बाद वह व्यक्ति देगची से खिचड़ी निकालकर खाने लगा। कुछ ही दूरी पर डरा-सहमा कुत्ता अपना मुंह ज़मीन पर टिकाए, पूंछ हिलाता हुआ कूं-कूं करता याचक दृष्टि से उसे देखे जा रहा था। खाते-खाते उस व्यक्ति ने अख़बार के एक टुकड़े पर थोड़ी खिचड़ी रखकर उसकी ओर सरका दी । कुत्ता दबे पाँव पूँछ हिलाता हुआ उसके निकट सरक आया और अख़बार पर पड़ी खिचड़ी खाने लगा।

“साहब, चाय।” चाय वाले की आवाज आई।

उसके हाथ से चाय के गिलास को लेकर मैं अपनी दोनों हथेलियों के बीच जकड़कर बैठ गया। गले में उतारने से पहले जरूरी था कि चाय की गर्मी से उँगलियों को सीधा कर लिया जाए। तीन मिनट का गिलास इसलिए पाँच से भी ज्यादा मिनट में खाली हुआ। गिलास को गुमटी पर रख मैंने चाय के पैसे चुकाए और बेंच से खड़ा हो गया।

चलते-चलते मैंने अनायास ही आख़िरी बार अपनी निग़ाह सामने ठेले की ओर डाली। वह व्यक्ति ठेले की ओट में बिछे बोरे पर एक पुरानी चीकट-सी रज़ाई में गठरी बन चुका था। कुत्ता उसके पैरों के पास रज़ाई से बाहर रह गए बोरे पर सिमटा पड़ा था। तभी उस व्यक्ति ने पैर से रज़ाई का कोना कुत्ते की पीठ पर डाल दिया, कुत्ता गोलमोल होकर उसमें दुबक गया।

चित्र गूगल से साभार