रविवार, 13 दिसंबर 2015

चीयरअप : लघुकथा

हर शाम स्कूटर पर ऑफ़िस से घर लौटती अदिति के होठों पर कोई मधुर गीत होता। आँखें फ़्लाईओवर से नज़र आती दूर तक फैली बसाहट और आसमान के मिलन के अद्भुत नज़ारे के आनंद में डूबी होतीं। कभी कोई अनोखा दृश्य देख वह एक पल के लिए ठिठक जाती। फिर उससे मिलने वाली आनंदानुभूति अपने जेहन में भरकर जैसे दिन भर के तनाव से मुक्त हो जाती।

आज भी वह ऐसे ही आनंद के आगोश में थी कि एक साइकिल सवार उसे पीछे छोड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गया। अक्सर जब भी कोई स्कूटर या मोटरसाइकिल अदिति को पीछे छोड़ते हुए आगे निकलती है तो वह अपने स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर उसे पीछे छोड़ देती है। पर आज न जाने क्यों उसने स्कूटर आगे न बढ़ाकर उस साइकिल सवार के पीछे लगा दिया। साइकिल सवार ने जैकेट पहन रखी थी। जैकेट के हुड से उसका सिर ढका था। उसके चौड़े कंधे साइकिल पर पैडल मारने की जद्दोजहद में हलके से दाएँ-बाएँ झुककर अपना आकर्षण और बढ़ा रहे थे। कुछ देर बाद जब फ़्लाईओवर की सीधी चढ़ाई शुरू हुई तो अदिति स्कूटर की रफ्तार बढ़ाकर आगे निकल गई। साइकिल सवार स्कूटर के साइड मिरर में नज़र आ रहा था। अदिति स्कूटर की रफ्तार धीमी कर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगी।

उसने देखा साइकिल सवार साइकिल रोककर फ़्लाईओवर के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत से साइकिल के पीछे इशारा करते हुए कुछ कह रहा है। बूढ़ी औरत के साथ एक सात-आठ साल का बच्चा और एक बड़ा झोला भी था। कुछ क्षणों बाद उसने देखा बूढ़ी औरत साइकिल के पीछे बैठ गई। उसने झोले को साइकिल के हेंडल में फँसा दिया। बच्चे को आगे के डंडे पर बिठाया और खुद पैदल साइकिल खींचते हुए फ़्लाईओवर चढ़ने लगा। अदिति ने स्कूटर रोक दिया।

ऑफ़िस आते-जाते रास्ते में बस या ऑटोरिक्शा की प्रतीक्षा में खड़े लोगों को उनके गंतव्‍य तक छोड़ना तो अदिति की आदत में शुमार है। कई बार तो वह बस के इंतज़ार में खड़े स्कूल के बच्चों को उनके स्कूल तक छोड़ने चली जाती है। ऐसे में उसको ऑफ़िस के लिए देर भी हो जाया करती है। पर आज न जाने कैसे वह इस बूढ़ी औरत को देखने से चूक गई। असल में उसका सारा ध्यान साइकिल सवार पर था। शायद इसीलिए उसने उस बूढ़ी औरत को नहीं देखा। बहरहाल अब बड़ी बेताबी से वह साइकिल सवार और उस बूढ़ी औरत की प्रतीक्षा कर रही थी।

उसने पलटकर देखा। वह निकट आ गया था। अदिति साइकिल सवार को देखकर अवाक़ रह गई। वह उसकी कल्पना के विपरीत कोई साठ-पैंसठ साल का एक बुज़ुर्ग था। अदिति अपलक उसे देखे जा रही थी। साइकिल खींचने से उसका चेहरा लाल हो आया था। ढलते सूरज की किरणों में उसके माथे पर उभरी पसीने की बूँदें सुनहरे मोतियों सी चमक रहीं थीं। उसने अपना सिर बाईं ओर घुमाकर अदिति की ओर देखा। अदिति ने अपना हेलमेट उतार दिया और बरबस उसका दायाँ हाथ सलाम की मुद्रा में उठ गया। फिर वह अँगूठे से चीयरअप करती हुई मुस्करा दी। साइकिल सवार भी चीयरअप करता मुस्करा दिया।

अदिति उससे कुछ कहती इसके पहले ही वह सावधानी से साइकिल पर चढ़ा और पैडल मारते हुए फ़्लाईओवर की ढलान पर उतर गया। मदद करने का ख्‍़याल अदिति के मन में ही रह गया। वह रोमांचित लेकिन ठगी-सी उसे देखे जा रही थी। साइकिल सवार को छूकर आ रहे शीतल हवा के झोंके अदिति को एक अजीब-सा सुकून दे रहे थे।

('क्षितिज' 2018, अंक - 9 में प्रकाशित ) 

चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 29 नवंबर 2015

सज़ा : लघुकथा

घंटी बजे लगभग दस मिनट बीत चुके थे। मैडम सीमा के कक्षा में न पहुँचने पर कक्षा मॉनीटर ने स्टाफ़रूम में झाँक कर देखा तो वह अपने मोबाइल में व्‍यस्त थीं।

“मैम, चलिए, सब बहुत शोर कर रहे हैं।“ मैडम सीमा बिना कुछ जवाब दिए मोबाइल पर उंगलियाँ फेरे जा रहीं थीं।

“मैम.....” मैडम का कोई जवाब न पाकर वह फिर बोला।

“उफ़ ! इस स्कूल में तो ज़रा सा भी चैन नहीं।“ तन्द्रा भंग होने पर वह भुनभुनाते हुए कक्षा की ओर चल पड़ीं।

मैडम को कक्षा में प्रवेश करते देख बच्चे फटाफट अपने-अपने स्थान पर हो लिए। उन सबने एक सुर में उनका अभिवादन किया। उन्‍होंने अभिवादन के बदले में सबको खड़े रहने को कहा।

कक्षा अभी शुरू ही हुई थी कि स्कूल का चपरासी एक नोटिस लेकर आ गया। सभी बच्चों की नोटबुक प्रिंसीपल ऑफिस में मँगवाई गईं थीं। मैडम सीमा ने तुरंत सभी बच्चों को उनकी नोटबुक जमा करने का आदेश दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी नोटबुक मेज पर लाकर जमा कर दीं। मैडम नामों की सूची से नोटबुक को मिलाने लगीं।

आयुष की नोटबुक न पाकर उन्‍होंने पूछा, “आयुष ! तुम्हारी कॉपी कहाँ है ?”

“मैम, मेरी कॉपी मानस ले गया है।”

“अच्‍छा ! मानस तो कई दिनों से स्कूल नहीं आया, कब ले गया तुम्हारी कॉपी ?” मैडम सीमा ने सख़्त आवाज़ में पूछा।

“मैम, उस दिन जब मैंने सबसे पहले काम कर लिया था तो आपने कहा था कि मैं अपनी कॉपी मानस को काम पूरा करने के लिए दे दूँ।” आयुष ने सफ़ाई दी।

“नो, ये तुम्हारा काम पूरा न करने का बहाना है, बस।”

यह सुनकर आयुष की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, फिर भी डरते-डरते उसने याद दिलाया, “वो...वो...मैम, उस दिन जब मैं स्टाफ़रूम में आया था न, तब आपने देने को कहा था।”

“चुप ! एक तो कामचोरी, ऊपर से झूठ !” मैडम की बात सुनकर आयुष सहम गया।

मध्यान्ह अवकाश की घंटी बज गई। मैडम सीमा उसे भोजन न करने की सज़ा दे स्वयं स्टाफ़रूम में आ गईं। आयुष पूरे मध्यान्ह अवकाश भर कक्षा के एक कोने में खड़ा रहा।

अवकाश के बाद दूसरी कक्षा शुरू हो गई। आयुष बिना भोजन किए चुपचाप अपनी जगह बैठ गया।

मैडम सीमा अपनी अगली कक्षा के लिए निकल ही रही थीं कि साथी अध्‍यापिका ने उन्‍हें एक नोटबुक देते हुए कहा कि ये किसी बच्चे के अभिभावक ने भिजवाई है। नोटबुक देखकर वह सकते में आ गईं। उस पर आयुष का नाम लिखा था। वह नोटबुक लेकर आयुष की कक्षा की ओर भागीं।

कक्षा चल रही थी। उन्‍होंने देखा, आयुष आँखों में आँसू लिए अपनी सीट पर बैठा था। मैडम सीमा की आँखें भी भर आईं। वे उसको नोटबुक दिखाते हुए बोलीं, “आयुष तुम सच कह रहे थे कि तुमने अपनी कॉपी मानस को दी है, लेकिन मैम ने तुम्हारी बात नहीं सुनी, मैम बहुत गन्दी हैं न।“ यह कहते-कहते उन्‍होंने झुककर आयुष को गले लगा लिया।

आयुष ना में सिर हिलाते हुए सीमा से लिपट गया। उधर कक्षा ले रहीं दूसरी अध्‍यापिका यह सब देखकर हतप्रभ थीं, लेकिन बच्‍चे तालियाँ बजा रहे थे।
चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

विस्‍फोट : लघुकथा

आज काव्या मिलने आने वाली थी। मैं घर के बाहर बरामदे में विचारों के उधेड़-बुन में फंसी चहलकदमी करते हुए न जाने कब अतीत में चली गई।

कई दिनों से मैं देख रही थी कि समीर हम सब से कटा-कटा सा रहता है। बार-बार पूछने पर उसने एक दिन शरमाते हुए काव्या से अपने लगाव के बारे में बताया था। वह उससे विवाह करना चाहता था। यह खबर हमारे लिए आश्‍चर्य मिश्रित खुशी लेकर आई थी। क्योंकि अब तक तो विवाह के नाम से दूर भागता रहा था वह । रिश्‍ते आते थे, पर वो बिना बात किए ही मना कर देता था। लेकिन यकायक उसके इस विस्फोट ने जैसे सूखे चूने पर पानी डाल दिया था। हमें कोई आपत्ति नहीं थी। बस काव्या के बारे में जानकर हम सब असमंजस में आ गए थे। कहाँ हमारा ग्रामीण परिवेश का मध्यम वर्गीय परिवार और कहाँ वह दिल्ली जैसी महानगरीय संस्कृति के वातावरण में पली-बढ़ी, उच्च व्यावसायिक वर्गीय घराने की कन्या।

“क्या ऐसे परिवार की लड़की हमारे परिवार के साथ सामंजस्य बिठा पाएगी?“ मैंने समीर से चिंता जताते हुए पूछा था।

“दीदी हम बंगलौर जा रहे हैं।“ समीर ने दूसरा विस्‍फोट किया था।

“बंगलौर क्‍यों ?“ मैं अवाक थी।

“हम दोनों ने जॉब के लिए अप्लाई किया था, वहां से बुलावा आ गया है।“ यह सूचना खुशी वाली थी, पर थोड़ी उदास करने वाली भी।

“ओह, तो बात यहाँ तक पहुँच गई है?” मैंने ताना देते हुए पूछा तो वह बिना कुछ जवाब दिए बाहर चला गया था।

उस दिन हम सभी भाई-बहन गाँव जा रहे थे। समीर कार चला रहा था। बीच-बीच में काव्या का फ़ोन आ रहा था। हमने समीर से कहा कि वह काव्या से गाँव पहुँच कर बात करले, अभी कार चलाने पर ध्‍यान दे। किन्तु उसने बात अनसुनी कर दी। अब तो ऐसा लगने लगा था जैसे काव्या हम भाई-बहनों के बीच दूरी बढ़ाती जा रही थी। फिर भी समीर की ख़ुशी हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण थी।

हमने काव्या को घर बुलाने की योजना बनाई। औपचारिकता वश ही सही लेकिन इसके पीछे एक कारण यह भी था कि वह भी हमारे घर-परिवार, रहन-सहन को देख-भाल ले। हमारी माँ थीं नहीं और अभी पिता जी को इस बारे में बताना उचित नहीं लग रहा था, इसलिए जो करना था हम बहनों को ही करना था।

कार के हार्न ने मुझे वर्तमान में लौटा लिया। मैंने गेट से झाँक कर देखा तो समीर और काव्या कार से उतर रहे थे। काव्या ने साड़ी पहन रखी थी। बाल लम्बे और खुले हुए थे। चेहरे पर हल्का मेकअप था। मैंने बढ़कर गेट खोल दिया। सामने आकर वह थोड़ा झिझकी फिर मुस्कुराते हुए वह मेरे गले लग गई। उसने अपनी बाँहों में मुझे भींच लिया, फिर अलग होते हुए कहा, ‘आप लोगों से मिलने का बड़ा मन था।’

मैं उसे बैठक में ले गई। बाकी बहनों से भी वह उसी गर्मजोशी से गले मिली। काफ़ी देर तक हम बातें करते रहे। उस दौरान मैंने ये महसूस किया कि हमने काव्या को लेकर जो छवि बनाई थी वह सही नहीं थी। काव्‍या अपनी बातों और व्यवहार से बड़ी सहज लगी।

हम भोजन करने बैठे तो काव्या का लाया हुआ भोजन भी साथ में परोसा। उसकी बनाई सब्‍जी के साथ पहला कौर खाते ही सबके मुँह से एक साथ निकला, “अरे इसमें तो एकदम माँ के हाथों बनी सब्‍जी का स्‍वाद है।”

“ये तुमने बनाई है काव्या !” मैंने आश्चर्य से पूछा, तो उसने शरमाते हुए हौले से हामी भरी।

“हम्म, तो समीर बंगलौर में तुम्‍हारे मजे रहेंगे।” खाते हुए मैंने चुटकी ली।

“ऐसी हमारी कि़स्‍मत कहाँ! ” समीर आह भरते हुए बोला।

“क्‍यों, क्‍या हुआ? ” हम सब बहनें एक साथ बोलीं। हमारी आवाज में घबराहट भी थी।

“नहीं दीदी, घबराइए मत। असल में हमें आप लोगों का साथ और स्‍नेह भी चाहिए। इसलिए.... बंगलौर जाना कैन्सिल।” कहा तो यह काव्‍या ने था, पर समीर हम सबको तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्‍करा रहा था।

यह तीसरा विस्‍फोट था, पर इस बार ख़ालिस ख़ुशी का। फिर तो हर बीतते दिन के साथ काव्या हम सबके दिलों में उतरती चली गई। और हाँ इसमें अब पिता जी भी शामिल थे।




(चित्र गूगल से साभार )

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

दीये : लघुकथा

करीम फुटपाथ के किनारे अपने दीये सजाए, ग्राहकों की आस में हर आने-जाने वालों को टुकर-टुकर देखे जा रहा था। कोई ग्राहक उसकी ओर आता दिखता तो उसकी आँखों में थोड़ी चमक आ जाती थी लेकिन अगले ही पल वह गायब भी हो जाती। ग्राहक चीनी बल्बों, झालरों से सजी गुमटियों की ओर बढ़ जाते थे। एक गुमटी उसके साथी रघु के बेटे सूरज की भी थी। रघु भी उसके साथ मिट्टी के दीये बनाता था।

‘यदि ये दीये, सचमुच न बिके तो?’ मन ही मन सोचते हुए करीम को सूरज की कही बात याद आ गई। वह अतीत में खो गया।
**
“चचा, अब ई बिजिनस पुरान होइ गवा, तबही हम दुई साल पहिलहीं चैनीज झालर के बिजिनस कर लिए रहेन।’’

“मती मारी गई है तुमरी ? ’’ करीम चाक ठीक करते हुए बोला।

“चचा, तुम तो फिर भी झण्डी, ताजिया, कंदील बनावो, उ बिजिनस में कम से कम पइसा तो है, ई माटी के काम में सरीर माटी होई जाएगी लेकिन पइसा...।’’ सूरज ने ठेंगा दिखाते हुए कहा।

“बचवा, अब हम तो ई पुरखन के काम न छोड़ब। पइसा न सही हमरे दीयन से देवारी मा लोगन के घर रोसनी तो होत है।’’ यह कहते हुए करीम पोखर से मिट्टी लाने के लिए चल पड़ा।

पोखर से लोडर ट्रकों में मिट्टी भर रहे थे। ठेकेदार उनको निर्देश दे रहा था। करीम कुछ देर तक देखता रहा, फिर हिम्मत करके ठेकेदार के पास जा पहुँचा।

“बाऊ !” करीम थोड़ा झिझकते हुए बोला ।

“क्या है !” ठेकेदार ने बिना उसकी ओर देखे लापरवाही से पूछा।

“बाऊ, हमका थोड़ी माटी चाहत रहा।” करीम ने याचना की।

“मिट्टी नहीं है यहाँ ।” ठेकेदार पान मसाला मुँह में डालते हुए बोला।

“बाऊ, दिवारी आवे वाली है, थोड़ी माटी मिल जात तो...” उसकी बात पूरी होने से पहले ही ठेकेदार बिफर पड़ा।

“तुमको पता है कि मिट्टी कितनी महँगी हो गई है? मिट्टी चाहिए, हुंह ।”

“बाऊ, हमसे इ पोखर के मालिक गमला के बदले में माटी देत रहेन।”

“इस पोखर के मालिक? ये पोखर तो सरकारी है।” ठेकेदार जोर से हँसा।

करीम को कुछ समझ नहीं आया, वह थोड़ा सिटपिटाया, फिर बोला, “आपहू लय लेना गमला और दीया, उ सामने हमार झोपड़ा है।”

“हमें नहीं चाहिए दीया-फिया, भागो यहाँ से।” ठेकेदार ने झिड़की दी।

“बाऊ, एक ठेलिया माटी कत्ते की पड़ेगी?” थोड़ी देर बाद करीम ने एक बार फिर हिम्मत जुटाते हुए पूछा।

ठेकेदार ने दाँतों के बीच से पीक निकाली और मसाला चबाते हुए उसको ऊपर से नीचे तक देखा, फिर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए बोला, “हज़ार की।”

करीम के होश उड़ गए। उसकी गाँठ में कुल पाँच सौ रुपये थे। लकड़ीवाले का कर्जा पहले ही चढ़ा था और अभी इन दीयों को पकाने के लिए भी लकड़ियाँ चाहिए थीं। क्या करे, क्या न करे थोड़ी देर इसी उहापोह में पड़ा रहा, गाँठ से रुपये निकालते हुए वह ठेकेदार के आगे गिड़गिड़ाया, “बाऊ, कुल जमा पूँजी पाँच सौ है हमरे पास, एतने की माटी दय दो हमका।”

ठेकेदार ने किच्च से पीक थूकी, करीम से रूपये लेकर मिट्टी की ओर इशारा किया। “चलो जल्दी से लादो, और सुनो, दर्जन भर गमले तैयार करके रखना।” ठेकेदार ने चेताया।

“ठीक बा बाऊ ।” करीम का चेहरा खिल उठा, उसको ऐसा लगा जैसे दौलत मिल गई हो। वह जल्दी-जल्दी ढेर से मिट्टी उठाकर ठेलिया में डालने लगा।
**
“मम्मा, दीये नहीं लोगी?” इस आवाज़ से करीम की तन्द्रा टूटी। उसने देखा एक छोटी सी बच्ची हाथों में दिए पकड़े बैठी है।

“बेटा, हमने चाइनीज़ झालर ले ली है।”

“लेकिन मम्मा, दीवाली में तो दीये जलाते हैं न ?” उसने हाथ में पकड़े दीयों को हसरत से देखते हुए पूछा।

“हाँ बेटा, लेकिन दीयों के तेल से दीवारें खराब हो जाती हैं, चलो छोड़ो इन्हें।” माँ ने बच्ची के हाथ से दीए छीनकर रख दिये और उसको चलने के लिए खींचा।

“नहीं मम्मा, मुझे तो दीये ही चाहिए।” बच्ची रूआँसी हो उठी थी और जमकर वहीं बैठ गई।

“चलो बाबा, दे दो बीस दीये।“ माँ हारकर बोली। करीम ने बीस दीयों के साथ एक बड़ा लाल दीया अलग से देते हुए कहा, “ई हमरी तरफ़ से बिटिया को देवारी का उपहार... ।” बच्ची दीया लेकर चहकने लगी।

“पापा, मुझे भी दीये चाहिए, मेरी मैम ने कहा था कि दीवाली में दीये जलाए जाते हैं।” तभी पास खड़े एक और बच्चे की आवाज़ आई।

फिर तो धीरे-धीरे करीम के दीयों के लिए लोगों की आमद होती गई। दीये अब करीम की आँखों में भी जल उठे थे।

(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

‘छवि’ :लघुकथा

सोनाली ने कंपार्टमेंट के अंदर प्रवेश किया। चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए वह खिड़की के पास वाली अपनी सीट पर जा बैठी। उसी सीट पर दो और महिलाएँ बैठी थीं। उनकी उम्र साठ-पैंसठ के आसपास रही होगी। वे पैर ऊपर मोड़े बैठी बातें कर रही थीं। उनमें से एक रह-रहकर अपने दोनों घुटनों को दबा रही थी। उनकी बातचीत और वेशभूषा आदि से लग रहा था कि शायद वे किसी तीर्थ यात्रा पर जा रही हैं। एक गहरी साँस लेते हुए उसने पानी की बोतल को मुँह से लगाया एक-दो घूँट गटकने के बाद खिड़की से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने लगी । थोड़ी देर बाद वे दोनों हाथ में एक पुस्तिका लेकर कोई मंत्र आदि बुदबुदाने लगीं।

सोनाली ने बुरा सा मुँह बनाया और मन ही मन सोचने लगी, “उफ़ ! अब रात भर इनकी बड़बड़ झेलनी होगी।” उसने ऑंखें बंदकर खिड़की पर सिर टिका दिया। बाहर की ठंडी हवा और थकान से सोनाली की झपकी लग गई। अचानक खटके से उसकी नींद खुली तो देखा सामने की सीट वाले यात्री सोने की तैयारी कर रहे हैं। उसको जागा हुआ देख उसकी सीट पर बाजू में बैठी एक महिला उसकी ओर मुख़ातिब हुई, “बेटा, ऊपर वाली बर्थ मेरी है, मेरे घुटने में गठिया है, यदि आपको कोई दिक्क़त न हो तो ये नीचे वाली अपनी बर्थ मुझे दे दो।“

सोनाली मन ही मन झुंझलाई। फिर उनकी अवस्था देख बिना कोई जवाब दिए वह मान गई। ‘इन सठियाई औरतों को कुछ काम-धाम तो होता नहीं, जि़ंदगी भर पति की कमाई पर ऐश किया होगा और अब तीर्थयात्रा के बहाने सैर-सपाटा, हुंह ! घुटने में तकलीफ है तो घर में बैठकर पोता-पोती संभालें।’ सोनाली मन ही मन बड़बड़ाई। वह चढ़कर ऊपर की बर्थ पर चली गई। दोनों महिलाएँ भी सोने की तैयारी करने लगीं।

तभी उसे याद आया कि उसका लेपटॉप बैग तो नीचे ही रह गया है।

“माँ जी, मेरा बैग नीचे रह गया है ज़रा पकड़ाना।” वह नीचे झाँकते हुए बोली। उस महिला ने जैसे ही उसका बैग उठाया, वह थोड़ा तेज़ आवाज़ में बोली, “अरे, उसमें लैपटॉप है, कोई पोथी-पत्रा नहीं, ज़रा संभाल कर उठाइये।” महिला ने मुस्कुराते हुए उसका बैग पकड़ा दिया।

सुबह हो गई थी। दोनों महिलाएँ नीचे वाली सीट पर बैठी बतिया रही थीं। सोनाली भी नीचे उतर आई। बैग से तौलिया आदि लेकर मुंह धोने चली गई। वापस आकर बैग से आइना निकालकर मेकप करने लगी। गठिया वाली महिला उसे देखकर मुस्कुराते हुए बोली, “शुक्रिया, बेटा।”

बदले में न चाहते हुए भी वह मुस्कुरा दी। वह महिला बोली, “बेटा, आप कहाँ जा रही हो?”

“यूनिवर्सिटी में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हूँ, एक सेमीनार में जा रही हूँ।” सोनाली व्यंगात्मक अंदाज़ में ठसक भरी आवाज़ में बोली। जैसे उन महिलाओं को जताना चाह रही हो कि वह उनकी तरह फालतू में सैर नहीं कर रही है। वह महिला फिर मुस्कुरा दी।

“आप लोग तो शायद किसी तीर्थयात्रा पर जा रही हैं न ?” सोनाली से रहा नहीं गया। उसने आखिर पूछ ही लिया। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखने लगीं।

फिर गठिये वाली महिला बोली, “हाँ बेटा, ऐसा ही समझ लो।”

सोनाली उसे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगी, जैसे कह रही हो, ’समझ लो का क्‍या मतलब!’ तभी दूसरी महिला ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, “दरअसल मैं अपनी पोती के दीक्षांत समारोह में जा रही हूँ, और ये मेरी सखी उसी समारोह में मुख्य अतिथि हैं। ये वहाँ की भूतपूर्व कुलपति हैं।”

सोनाली ने चौंककर कुछ इस तरह उनको देखा जैसे पहली बार देख रही हो।

शनिवार, 26 सितंबर 2015

'बौरा' :लघुकथा

बौरा, हां इसी नाम से तो पुकारते थे सब उसे वह एक कंधे पर पुरानी शाल डाले और दूसरे कंधे पर झोला लटकाए ऑटो स्टैंड के किनारे बने चबूतरे पर हमेशा बैठा दिखता था। वहां बैठे-बैठे वह हर आने-जाने वाले का मुस्कुराकर अंग्रेजी में अभिवादन करता। वह कौन है ? क्या करता है ? कहां रहता है ? इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था। न ही कोई जानता था। लेकिन जब वह नहीं दिखता तो लोगों की नजरें उसे खोजती थीं।

दोपहर में जब सवारियों का आना-जाना कम हो जाता तो बौरा, ऑटो वालों और आसपास की गुमटी वालों के मनोरंजन और समय बिताने का साधन बन जाता। मौसम चाहे जो भी हो, लेकिन उसके कंधे से शाल कभी नहीं हटती थी। अक्सर दोपहर में जब वह बैठे-बैठे ऊंघने लगता तो कोई ऑटो वाला धीरे से आकर उसकी शाल खींचकर भाग जाता और बौरा उसको लेने के लिए बदहवास, परेशान सा उसके पीछे-पीछे भागने लगता। उस शाल को वापस पाने के लिए वह उन सबकी हर ऊल-जलूल फरमाइश पूरी करता। वे उससे जैसा करने को कहते वह वैसा ही करता। उसकी यह स्थिति देख लोग तालियां पीट, हंस-हंसकर लोट-पोट हो जाते। अंत में शाल पा लेने पर वह फिर से उसी चबूतरे पर विराजमान हो ऐसे मुस्कराने लगता जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आज सुबह से बौरा पता नहीं कहां चला गया था। दोपहर भी बीतने लगी थी, लेकिन आज लोगों की नज़रें उसको नहीं खोज रहीं थीं। आज उस चबूतरे पर कहीं से एक औरत आकर लेट गई थी। उसके तन पर लिपटे मैले कपड़े में कपड़ा कम छोटे-बड़े झरोखे ज्यादा दिखाई दे रहे थे। ये झरोखे आज सड़क पर हर आने-जाने वालों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वहां से गुजरते लोगों की नजरें उन झरोखों में अटक-अटक जा रही थीं। कुछ नजरें ऐसी भी थीं जो चुपके से उधर जातीं और फिर अनदेखा कर ऐसे आगे बढ़ जातीं जैसे कि कुछ देखा ही न हो। कुछ हिकारत भरीं कोसतीं, बड़बड़ातीं हुई आगे बढ़ जातीं। लेकिन कई नजरें तो चबूतरे के चारों ओर परिक्रमा लगाती हुईं उसे हर कोण से देख लेने के भरसक प्रयास में लगी थीं। जैसे दुनिया का आठवां अजूबा यहीं अवतरित हो गया हो।

तभी अचानक न जाने कहां से बौरा प्रकट हुआ। जब वह चबूतरे की ओर बढ़ने लगा तो पीछे से सीटी बजने और तालियां पीटकर हंसने की आवाजें आने लगीं। लेकिन वह चबूतरे के पास दो पल के लिए ठिठका और फिर आगे बढ़ गया।

उस औरत के तन पर लिपटे कपड़ेनुमा झरोंखों को बौरा ने अपनी शाल के पट से बंद कर दिया था। आज पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कुराहट के बजाय गंभीरता दिख रही थी और आसपास के तमाम हंसने वाले चेहरे जैसे खुद पर शर्मिन्‍दा थे।
  


(चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 21 सितंबर 2015

उड़न परी : लघुकथा

“ममा, मैं सलवार-कुर्ता नहीं पहनूँगी, मुझे गर्मी लगती है इसमें।” दस साल की आहना ने ठुनककर कहा।

“बेटा ज़िद्द नहीं करते, जल्दी से पहन लो, रमा आंटी के यहाँ पार्टी में चलना है। अगर हम देर से जायेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा।” शिखा ने बेटी को प्यार से समझाया।

“नहीं, मुझे नहीं जाना पार्टी-शार्टी में, मेरी सब फ्रेंड्स फ़्राक, स्कर्ट पहनती हैं, आप मुझे सिर्फ सलवार-कुर्ता पहनने को कहती हो । वे सब पार्क में खेलती हैं, आप मुझे वहाँ भी नहीं जाने देती हो, क्यों?” आज आहना के सब्र का बाँध जैसे टूट पड़ा था।

“क्योंकि तुम सलवार-कुर्ते में इतनी प्यारी लगती हो कि पूछो मत, रमा आंटी ने भी कल मुझसे यही कहा।” बेटी को बहलाते हुए शिखा बोली।

“एकदम झूठ !” आहना ने माँ की बात को समझते हुए, अपनी नाराज़गी को छुपाते हुए कहा।

“एकदम सच्ची।” अपने गले को चुटकी से पकड़ते हुए शिखा ने कहा। फिर दोनों खिलखिला पड़ीं।

लेकिन शिखा के चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसके अंदर भीषण संग्राम छिड़ा हुआ है। शादी के तीसरे साल पति की अचानक मृत्यु और फिर छः साल की आहना के साथ दूर के रिश्तेदार के उस दुर्व्यवहार ने उसे झिंझोड़ डाला था। जैसे-जैसे आहना बड़ी हो रही थी उसके मन का भय दिन-ब-दिन उसे और जकड़ता जा रहा था। वह उसे हर तरह से दुनिया की नजरों से दूर, ढक-मूँदकर रखना चाहती थी। यही सब सोचकर वह आहना के खेलने-कूदने, पहनने-ओढ़ने पर पाबंदियाँ लगाती जा रही थी। अक्सर उसके साथ काम करने वाली सहेलियाँ भी उस पर पिछड़ी, दकियानूसी होने का आरोप लगातीं, किन्तु वह सब हँसी में उड़ा देती थी। हालाँकि कभी-कभी तो उसे स्वयं लगता कि वह अपने हाथों से अपनी मासूम बच्ची का गला घोंट रही है।

अचानक शिखा की तन्द्रा टूटी। वे पार्टी में पहुँच गए थे। वहाँ बड़ी रौनक थी। खुले वातावरण में मधुर संगीत और बेला की सुगंध, मन, मस्तिष्क दोनों को ताज़गी प्रदान कर रहे थे। रमा ने आहना और शिखा का स्वागत किया। अपनी बेटी वैष्णवी से मिलवाया। आधुनिक लिबास में वैष्णवी एक परी जैसी लग रही थी। उसे देख शिखा जैसे मन्त्रमुग्ध सी हो गई। वह वैष्णवी के रूप में आहना की कल्पना करने लगी और फिर अचानक ही उस भयावह हादसे की याद से सिहर उठी।

तभी मंच पर पार्टी आरम्भ होने की घोषणा के साथ रमा और वैष्णवी से केक काटने का अनुरोध किया गया। दोनों ने मिलकर केक काटा, सारा लॉन तालियों से गूँज उठा।

रमा ने माइक पर कहा, “देवियों और सज्जनों, मैं आप सभी का अभिवादन करती हूँ। मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मेरी बेटी वैष्णवी ने आई. पी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। वह अपने जीवन में इसी तरह सफल होती रहे, आप उसे आशीर्वाद प्रदान करें।”

तभी आगे बढ़कर वैष्णवी ने माँ के हाथ से माइक ले लिया और बोली, “लेकिन मैं आज जिस मुकाम पर हूँ, उस तक पहुँचाने के लिए मेरी माँ ने बहुत कष्ट सहे। बाधाओं और समाज की तमाम वर्जनाओं से मुकाबला करते हुए मेरी हर ख्वाहिश पूरी की। आज मैं आप सबको बताना चाहती हूँ कि जब मैं आठ बरस की थी तब एक ऐसे हादसे का शिकार हुई जिसे हमारा समाज किसी लड़की के जीवन को समाप्त करने के लिए पर्याप्त मानता है। लेकिन मेरी माँ ने मुझे उस अन्धकार से निकाला, कैसे, यह मैं अब भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।....माफ करना माँ, मैंने आपकी डायरी पढ़ ली है...... ।’’ कहते हुए उसका गला रुँध गया।

पार्टी में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया, और अगले ही क्षण तालियाँ गड़गड़ा उठीं। वैष्णवी अपनी माँ से लिपट गई। वहां मौजूद लगभग सभी की आँखें भीग गईं। और शिखा तो जैसे सुन्न ही पड़ गई। लेकिन अगले ही पल जैसे उसने कोई प्रण कर लिया था। वह आहना को गले लगाते हुए बोली, “कल हम अपनी आहना के लिए ढेर सारी फ़्राक और स्कर्ट्स लेने चलेंगे।”

“सच्ची ममा !” आहना का चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा। वह दुपट्टे को हाथ में फैलाकर ऐसे दौड़ने लगी जैसे वह उड़ान भरने जा रही हो।

(चित्र गूगल से साभार )